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Saturday, August 13, 2016

मिली आज़ादी



मंहगी पड़ी
बड़ा मोल चुका के
मिली आज़ादी !

टुकड़े हुए
बँट गया वतन
रोया भारत !

आज़ादी आई
ढेर सा अवसाद
साथ में लाई !

भागे अँग्रेज़
उग्र था आंदोलन
विदेशी जो थे !

कैसे निपटें 
देशी कुशासन से
त्रस्त जनता !

युद्ध आसान
बाहर के बैरी से
हारें खुद से !

देख रवैया
शर्मिन्दा भारत माँ
कर्णधारों का !

वृद्ध हो चुकी
है आज भी हताश
माँ स्वाधीनता !

कैसे मनाएं
स्वतन्त्रता दिवस
क्षुब्ध मन से !

दंगे फसाद
घोर अराजकता
कसैला स्वाद !

लोभी नेतृत्व
सुस्त सी सरकार
दुखी जनता !

कोई तो पल
दे दो सुशासन का
खुश हो प्रजा ! 


साधना वैद