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Friday, August 5, 2016

नेह दीप



एक नेह दीप 
जिसे उर अंतर के 
उज्ज्वल प्रेम की बाती 
और अनन्य विश्वास के घृत से
निश्छल निष्ठा और
सम्पूर्ण समर्पण के साथ
वर्षों पहले बड़े प्यार से
हम दोनों ने बाला था  
और जिसे तुम वक्त की
चुनौतियों से हार कर
यूँ ही छोड़ आये थे
एक नितांत निर्जन वीराने में
बुझ जाने के लिये !
उसी दीप को
अनेकों आँधियों तूफानों से
हाथों की ओट दे मैंने
अपने मन मंदिर में
अभी तक प्रज्वलित रखा है
ना कभी उसकी बाती को 
चुकने दिया
ना ही कभी उसकी लौ को 
मद्धम पड़ने दिया !
भूले से जो तुम्हारे कदम
इस राह पर पड़ गये थे
तो मेरे हृदय गवाक्ष से
अंदर झाँक कर तुमने इस
प्रखर प्रज्वलित दीप को
देख तो लिया था ना ?
लेकिन इस नेह दीप का
बुझना अब तय है
क्योंकि उज्ज्वल प्रेम की
यह बाती अब चुकने लगी है
और विश्वास का घृत तो
उसी दिन से घट चला था
जिस दिन तुम इसे हमारे
पवित्र प्रेम के समाधि स्थल पर
उपेक्षित छोड़ आये थे !
तुम्हें फिर दोबारा
मेरे हृदय गवाक्ष में झाँकने का
अवसर मिले न मिले
लेकिन आज इसकी लौ
पहले भी कहीं अधिक  
प्रखर और सुन्दर है
ठीक वैसे ही जैसे किसी
मरणासन्न व्यक्ति की चेतना
उसकी मृत्यु से कुछ क्षण पूर्व 
और अधिक चैतन्य और
अधिक जीवंत हो जाती है !



साधना वैद