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Thursday, September 10, 2020

प्रश्न और रिश्ते

 



यह प्रश्नों का संसार भी 
कितना निराला है !
विश्व के हर कोने में
कोने में बसे हर घर में
घर में रहने वाले 
हर इंसान के मन में
उमड़ते घुमड़ते रहते हैं
ना जाने कितने प्रश्न,
बस प्रश्न ही प्रश्न !

अचरज होता है
ये छोटे-छोटे प्रश्न भी 
कितनी पाबंदी से
रिश्तों को परिभाषित कर जाते हैं
और मन के हर भाव को
कितनी दक्षता से बतला जाते हैं
कहीं रिश्तों को प्रगाढ़ बनाते हैं
तो कहीं पुर्जा-पुर्ज़ा बिखेर कर
उनकी बलि चढ़ा देते हैं !

प्रश्नों की भाषा
स्वरों के आरोह अवरोह
उछाले गए प्रश्नों की शैली और अंदाज़
वाणी की मृदुता या तीव्रता
रिश्तों के स्वास्थ्य को बनाने
या बिगाड़ने में बड़ी अहम्
भूमिका निभाते हैं !

किसने पूछा, किससे पूछा,
क्यों पूछा, कब पूछा,
किस तरह पूछा, क्या पूछा
सब कुछ बहुत मायने रखता है  
ज़रा सा भी प्रश्नों का मिजाज़ बदला
कि रिश्तों के समीकरण बदलने में
देर नहीं लगती !

छोटा सा प्रश्न कितने भावों को
सरलता से उछाल देता है
जिज्ञासा, कौतुहल, लगन, ललक,
प्यार, हितचिंता, अकुलाहट, घबराहट
चेतावनी, अनुशासन, सीख, फटकार,
व्यंग, विद्रूप, उपहास, कटाक्ष,  
चिढ़, खीझ, झुंझलाहट, आक्रोश,
संदेह, शक, शंका, अविश्वास,
धमकी, चुनौती, आघात, प्रत्याघात
सारे मनोभाव कितनी आसानी से
छोटे से प्रश्न में
समाहित हो जाते हैं और
इनसे नि:सृत होते अमृत या गरल
शहद या कड़वे आसव
कभी रिश्तों की नींव को
सींच जाते हैं तो कभी
जला जाते हैं,
कही रिश्तों के सुदृढ़ महल बना जाते हैं
तो कहीं मजबूत किले ढहा कर
खंडहर में तब्दील कर जाते हैं !

तो मान्यवर अगर जीवन में
रिश्तों की कोई अहमियत है तो
प्रश्नों के इस तिलिस्म को समझना
बहुत ज़रूरी है !


चित्र - गूगल से साभार 

साधना वैद  
 

12 comments :

  1. सादर नमस्कार,
    आपकी प्रविष्टि् की चर्चा शुक्रवार ( 11-09-2020) को "मैं तुम्हारी मौन करुणा का सहारा चाहता हूँ " (चर्चा अंक-3821) पर भी होगी। आप भी सादर आमंत्रित है.

    "मीना भारद्वाज"

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    1. आपका हृदय से बहुत बहुत धन्यवाद एवं आभार मीना जी ! सप्रेम वन्दे !

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  2. Replies
    1. हार्दिक धन्यवाद एवं बहुत बहुत आभार आपका शास्त्री जी ! सादर वन्दे !

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  3. सुंदर प्रस्तुति

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    1. हार्दिक धन्यवाद केडिया जी ! बहुत बहुत आभार आपका !

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  4. वैसे देखें तो प्रश्नों ने या कहिए जिज्ञासा ने ही मनुष्य को आज यहां तक पहुंचाया है

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    1. बात आपकी बिल्कुल दुरुस्त है गगन जी ! ज्ञान के सन्दर्भ में प्रश्न इंसान को कहाँ से कहाँ तक पहुँचा सकते हैं इसकी तो कोई सीमा ही नहीं है ! यहाँ सवाल रिश्तों के सन्दर्भ में उछाले गए प्रश्नों का है ! हार्दिक आभार आपका !

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  5. 'प्रश्न' को तो आपने पूरी तरह से यहाँ परिभाषीत कर दिया है। प्रश्नों से रिश्तें सबसे अधिक डरते हैे।
    वाकई बेहतरीन रचना है ये आपकी।

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    1. हार्दिक धन्यवाद प्रकाश जी ! बहुत बहुत आभार आपका !

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  6. प्रश्न को सही ढंग से अर्थ दिया है |

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    1. हार्दिक धन्यवाद जीजी ! बहुत बहुत आभार आपका !

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