असफल वैवाहिक रिश्तों के पीछे अनेक कारण हैं । उन
अनेक कारणों में सबसे बड़ा और सबसे महत्वपूर्ण कारण है आज के युवाओं की निरंकुश रूप
से बढ़ती हुई स्वच्छंदता की प्रवृत्ति और उनकी दिन प्रति दिन विकृत होती जाती
मानसिकता ! स्त्री का आर्थिक रूप से स्वतंत्र होना, पिछली पीढी के मुकाबले अधिक शिक्षित और आत्म विश्वासी होना, अपने निर्णय स्वयं लेने के लिए संकल्पित होना, एक समय था जब इन सभी गुणों
का विकास स्त्री स्वातंत्र्य और नारी सशक्तिकरण के सन्दर्भ में बड़े गर्व से देखे
जाते थे ! विवाह के समय लड़की के माता-पिता ही लड़की को समझा कर भेजते थे, “ससुराल
में किसीसे दब कर रहने की ज़रुरत नहीं है ! कोई परेशानी हो तो हमें बताना ! तुम
किसीकी नौकरानी बन कर नहीं जा रही हो ! अपनी शर्तों पर रहना वहाँ !” लेकिन कालांतर
में ये ही गुण और यही समझाइश उन्हीं के दाम्पत्य जीवन की सुरक्षा के सन्दर्भ में
खतरे की सबसे बड़ी घंटी बन चुकी है ! हर चीज़ जब तक नियंत्रण में होती है अच्छी लगती
है ! लेकिन यह भी सत्य है कि अति सर्वत्र वर्जयेत ! आज की युवा पीढी में समानता का
ऐसा घमासान छिड़ा हुआ है कि इसकी बहुत बड़ी कीमत उनके बच्चों को, उनके वृद्ध होते माता-पिता
को चुकानी पड़ रही है इस बात का उन्हें कोई ख़याल ही नहीं है ! संयुक्त परिवार तो
टूट ही चुके हैं ! पति-पत्नी दोनों काम करने वाले हैं इसलिए बच्चों की परवरिश आया, या अनपढ़ नौकरों के हाथों हो रही है ! अक्सर निर्दयी नौकरों
के दुर्व्यवहार से त्रस्त उपेक्षित बच्चे मन में आक्रोश का ज्वालामुखी लिए पलते
हैं ! ऐसे मामलों में दोषारोपण का ठीकरा पति-पत्नी एक दूसरे के सर पर ही फोड़ते हैं
क्योंकि हर बात के लिए दोनों के पास समान अधिकार हैं तो ज़िम्मेदारी भी समान है !
इन्हीं और ऐसे ही अनेक कारणों से रोज़ घरों में अनबन और झगड़े होते हैं ! स्त्रियाँ रिश्ते के आरम्भ से ही बागी तेवर ठान लेती हैं । जब रिश्ते
में बँधने वाले दंपत्ति के मन में एक दूसरे के लिए सम्मान की भावना ही न हो,
रिश्ते को निभाने का इरादा ही न हो और थोड़ी भी सहनशक्ति न
हो तो रिश्तों को टूटने में ज़रा भी देर नहीं लगती ।
आज की पीढ़ी सिर्फ आत्मकेंद्रित है । घर परिवार
की प्रतिष्ठा, माता-पिता की मर्ज़ी, समाज की मर्यादा ये सारी बातें उन लोगों के लिए बेमानी हैं । ये ज़िम्मेदारियों
से भागते हैं । ये अपना परिवार भी बनाना नहीं चाहते । सास-ससुर की सेवा करना तो
बहुत दूर की बात है वे अपने बच्चों की देखभाल भी करना नहीं चाहते । सुनते हैं कि
अब तो बच्चों की देखभाल के लिए किराए के माता-पिता भी मिलने लगे हैं जो बच्चों को
समय से स्कूल भेजते हैं, उनका ध्यान रखते हैं, उन्हें कहानियाँ और लोरी
सुनाते हैं ! अपने परिवार की अब ज़रुरत ही कहाँ रह गई है ! हर चीज़ खरीदी जा सकती है
पास में पैसा होना चाहिए ! इसीलिये अब लोगों का फोकस अधिक से अधिक धन कमाने में
केन्द्रित हो गया है और शायद इसीलिए विवाह जैसी संस्था की जड़ें ढीली होने लगी हैं
! तलाक के मामलों में पहले से कई गुना वृद्धि हुई है । पहले स्त्री सहनशील होती थी,
रिश्तों को प्राणप्रण के साथ निभाने का प्रयास करती थी आज
की स्त्री स्वच्छंद हो चुकी है वह अपनी शर्तों पर जीवन जीना चाहती है । विवाहेतर
संबंधों के प्रति उसके मन में कोई अपराधबोध नहीं है इसीलिए वह खुल कर इन्हें
स्वीकार भी करती है और अपने पति से पीछा छुड़ाने के लिये किसी भी हद तक जा सकती है
। फिलहाल ऐसे कई केसेज़ सामने आए हैं जिनमें पत्नी ने अपने प्रेमी के साथ मिल कर
पति की हत्या तक करवा दी । पाश्चात्य जीवन शैली ने भी स्त्रियों की सोच को
प्रदूषित किया है । परिवार में संस्कारों और नैतिक मूल्यों का ह्रास,
अनुशासनहीनता, निरंकुश जीवन शैली और बिना किसी दायित्व के मौज मस्ती की ज़िंदगी
बिताने की चाहत, बेइंतहा आज़ादी इस विघटन का सबसे बड़ा कारण हैं ।
लिव इन रिलेशनशिप की प्रवृत्ति को बढ़ावा मिला है क्योंकि यह सुविधाजनक है ! जब तक
अच्छा लगे साथ में रह लिए जब मन भर गया तो साथी भी बदल लिया नई पोशाक की तरह ! न शादी
हुई, न बहू बने, न कोई ज़िम्मेदारी निभाई लेकिन विवाह का पूरा
सुख उठा लिया ! लड़के भी खुश न शादी की, न पत्नी लाए, अलग हुए तो कोई गुज़ारा भत्ता
देने की झंझट भी नहीं, न ही ज़मीन जायदाद पर किसीका कोई हक़ बना ! सारा सार इसी बात
में है कि मौज मज़ा भरपूर होना चाहिए और किसी के भी प्रति ज़िम्मेदारी ज़रा सी भी कोई
नहीं ! जैसी विकृत मानसिकता होगी समाज का भी वैसा ही रूप उभर कर सामने आयेगा !
समाज के निर्माता भी तो वे ही हैं जो उसके रूप और आकार का अभिन्न अंग हैं !
साधना वैद
आपकी लिखी रचना "पांच लिंकों के आनन्द में मंगलवार 01 अप्रैल 2025 को लिंक की जाएगी .... http://halchalwith5links.blogspot.in पर आप भी आइएगा ... धन्यवाद!
ReplyDeleteहार्दिक धन्यवाद दिग्विजय जी ! सादर वन्दे !
Deleteआपकी लिखी रचना ब्लॉग "पांच लिंकों का आनन्द" बुधवार 2 अप्रैल 2025 को साझा की गयी है......... पाँच लिंकों का आनन्द पर आप भी आइएगा....धन्यवाद!
ReplyDeleteहार्दिक धन्यवाद पम्मी जी ! सप्रेम वन्दे !
Deleteबेहद कटु सत्य है यह, आज की पीढ़ी न जाने किस रास्ते पर चल पड़ी है, पर यह समय भी अधिक देर तक नहीं रहेगा, बदलाव आयेगा ही, यही कामना है कि अच्छे के लिये आये
ReplyDeleteहार्दिक धन्यवाद अनीता जी ! आपका दिल से आभार !
Deleteकड़वा सच
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