आज बड़ा दिन था
! सुबह से सड़कों पर बड़ी चहल-पहल थी ! पास के चर्च से बड़े ही सुन्दर हिम्स की आवाज़
सुनाई दे रही थी ! लगातार लोगों के समूह प्रार्थना करने के लिए चर्च में जा रहे थे
! रात को ठीक 12 बजे यीशु के आगमन के साथ ही चर्च के घंटे बज उठे थे ! पुनिया ने पुल
के नीचे अपनी छोटी सी खोली को बड़े उत्साह के साथ यथासंभव सजाया था ! उसने सुना था
क्रिसमस के दिन सेंटा क्लॉज़ आते हैं और बच्चों के लिए ढेर सारे तोहफे भी लाते हैं
! सुबह से अपने तकिये के नीचे, गद्दी के नीचे वह बार-बार
टटोल कर देख चुकी थी ! अभी तक कोई उपहार उसे नहीं मिला था ! सड़क पर तमाम बच्चों को
बड़े सारे उपहारों के पैकिट लिए वह अपने माता-पिता के साथ जाते हुए देख रही थी ! दिन
के 12 बज चुके थे ! उसका चेहरा कुम्हला गया था ! आँखों में आँसू भर आए थे ! सोच
रही थी क्या सेंटा भी उपहार बड़े घर के बच्चों के लिए ही लाते हैं ! उस जैसे ग़रीब
बच्चों के लिए नहीं ? सुबह से कुछ खाया भी नहीं था ! अस्फुट स्वरों से उसके मुख से
दुआ निकल रही थी, "और कुछ भले ही न लाओ न लाओ प्यारे सेंटा बस एक रोटी ही ला दो ताकि
तुम्हारी राह देखने के लिए आँखें तो खुल सकें !"
अपना घर
जतन से सजाया
सेंटा न आया
साधना वैद
मार्मिक रचना
ReplyDeleteहार्दिक धन्यवाद ओंकार जी ! आभार आपका !
Deleteयह पढ़कर मन भारी हो गया। आपने क्रिसमस की चमक के बीच भूख और उम्मीद की जो तस्वीर रखी है, वह सीधे दिल पर लगती है। पुनिया का सवाल किसी एक बच्चे का नहीं लगता, वह हमारे समाज से पूछा गया सवाल बन जाता है। हम रोशनी, गीत और उपहारों में खुश हो जाते हैं, पर पुल के नीचे बैठे बच्चों को अक्सर भूल जाते हैं।
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Deleteआपकी संवेदनशील प्रतिक्रिया के लिए हृदय से धन्यवाद एडमिन भाई ! रचना आपको अच्छी लगी मेरा श्रम सार्थक हुआ !
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