देखते हो मुझे
कैसे कुदरत का कहर टूटा मुझ पर
और कैसे आँधी तूफ़ान ने
बर्बाद कर दिया मुझे !
कुदरत तो कुदरत थी
उस पर किसका वश था
लेकिन जड़ से उखड़े मेरे जिस्म पर
संसार के सबसे जहीन
इस ‘बुद्धिजीवी’ इंसान ने भी
ज़रा तरस नहीं खाया
और काट-काट कर
मेरी हर डाल,
नोच-नोच कर मेरा हर फूल,
मेरा हर पत्ता इस नाशुक्रे इंसान ने
बिलकुल निरावृत कर दिया मुझे !
लेकिन मेरी जिजीविषा देखो
देखो मेरे हृदय की उदारता को !
किस तरह मेरा कटा नुचा भग्न शरीर
अपनी खंडित साँसों के साथ भी
तुम्हें जीवन दान देने के लिए
अपनी पूरी ताकत से लड़ रहा है
मेरा रोम-रोम अंकुरित हो रहा है
तुम्हें शीतल छाँह देने के लिए,
फल-फूल, खुशबू देने के लिए,
तुम्हारे थके हुए फेंफडों को
प्राण वायु देने के लिए !
यही फर्क है एक पेड़ में और इंसान में
पेड़ सिर्फ देना ही देना जानते हैं
प्रतिदान में कुछ नहीं माँगते
और इंसान ?
वह सिर्फ लेना ही लेना जानता है
अपने जीवन दाता हरे-भरे वृक्ष को
को चीर फाड़ कर
ख़त्म कर देने में भी
उसे कोई एतराज़ नहीं होता !
साधना वैद


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