जलते रहे
ज़िंदगी की धूप में
पाँव के छालों की
परवाह किये बगैर
बिना रुके बिना थमे
दिन रात बस चलते रहे
चलते ही रहे ।
न मिला हमें ठौर कहीं
न ही कहीं मिली छाँह
और हम अभिशप्त से
समय की झंझा में
डाल से टूटे पत्ते की तरह
बेबस और बेआस बस
उड़ते रहे
उड़ते ही रहे ।
हालात की दुश्वारियों ने
इस तरह कर दिया लाचार
कि हम आज गर्दिशों के
उफनते सैलाब में
तिनके की तरह
बहते रहे
बहते ही रहे
सुनाई किसीको भूले से
कभी जो दास्ताने गम
ऊब कर वो उठ गया
और हम कहते रहे
कहते रहे
कहते ही रहे ।
चित्र - गूगल से साभार
साधना वैद

हार्दिक धन्यवाद रवीन्द्र जी ! दिल से आभार ! सप्रेम वन्दे !
ReplyDeleteसुन्दर
ReplyDeleteहार्दिक धन्यवाद हरीश जी !
Deleteबहुत ख़ूब साधना जी!
ReplyDeleteहार्दिक धन्यवाद जितेन्द्र जी !
Deleteबेबसी का बखूबी चित्रण किया है आपने साधना जी, हर आम आदमी की यही कहानी है
ReplyDeleteहार्दिक धन्यवाद अनीता जी ! आभार आपका !
Deleteबहुत अच्छा
ReplyDeleteहार्दिक धन्यवाद प्रियंका जी !
Deleteबहुत बढ़िया
ReplyDeleteहार्दिक धन्यवाद ओंकार जी ! आभार आपका !
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