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Saturday, July 18, 2026

धूप

 




जलते रहे

ज़िंदगी की धूप में

पाँव के छालों की

परवाह किये बगैर

बिना रुके बिना थमे

दिन रात बस चलते रहे

चलते ही रहे ।

न मिला हमें ठौर कहीं

न ही कहीं मिली छाँह

और हम अभिशप्त से

समय की झंझा में 

डाल से टूटे पत्ते की तरह

बेबस और बेआस बस

उड़ते रहे

उड़ते ही रहे ।

हालात की दुश्वारियों ने

इस तरह कर दिया लाचार

कि हम आज गर्दिशों के

उफनते सैलाब में

तिनके की तरह

बहते रहे

बहते ही रहे

सुनाई किसीको भूले से

कभी जो दास्ताने गम

ऊब कर वो उठ गया

और हम कहते रहे

कहते रहे

कहते ही रहे ।

 


चित्र - गूगल से साभार 



साधना वैद


11 comments :

  1. हार्दिक धन्यवाद रवीन्द्र जी ! दिल से आभार ! सप्रेम वन्दे !

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    1. हार्दिक धन्यवाद हरीश जी !

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  3. Replies
    1. हार्दिक धन्यवाद जितेन्द्र जी !

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  4. बेबसी का बखूबी चित्रण किया है आपने साधना जी, हर आम आदमी की यही कहानी है

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    1. हार्दिक धन्यवाद अनीता जी ! आभार आपका !

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  5. Replies
    1. हार्दिक धन्यवाद प्रियंका जी !

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  6. बहुत बढ़िया

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    1. हार्दिक धन्यवाद ओंकार जी ! आभार आपका !

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