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Sunday, August 23, 2026

प्रवासी पंछी

 





फैला के पंख 

उड़ चला विदेश 

छोड़ के नीड़


प्रवासी पंछी 

अनजान देश में 

ढूँढे बसेरा 


छूटे माँ बाप 

छूटा कुल कुनबा 

गाँव शहर 


पंछी से तुम 

जा बसे परदेश

रोक न पाए  


कैसे बुलाएं 

कौन जतन करें 

कैसे बताएं 


जोहती बाट

आजा मेरे दुलारे 

हो रही रात 


हुआ अँधेरा 

डूब गया सूरज 

घबराए माँ


आकुल हो वो 

नीड़ से शाख तक 

डोलती फिरे 


नहीं आया वो 

हुआ मन विदीर्ण 

रो पड़ीं आँखें 


हो गया सूना 

एक माँ का जीवन 

घर आँगन 


प्रार्थना माँ की 

रही अनसुनी सी 

माँ घबराई 


हुई उदास 

नियति की छलना 

रास न आई !



साधना वैद 

 


चित्र - गूगल से साभार 



3 comments :

  1. मार्मिक रचना

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    1. हार्दिक धन्यवाद अनीता जी !

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  2. हार्दिक धन्यवाद रवीन्द्र जी ! बहुत-बहुत आभार आपका ! सादर वन्दे !

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