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Friday, November 6, 2026

एक कातर प्रार्थना


 



वृद्ध हूँ, रुग्ण हूँ, कृशकाय हूँ,
श्रांत हूँ, क्लांत हूँ, असहाय हूँ
किसी तरह बल जुटा कर
द्वार पर दीपक एक जला दिया है माँ,
जो आना चाहो तो
देखभाल कर ही पग धरना
भय है कहीं तुम
ठोकर न खा जाओ
या घर की मलिनता से खिन्न हो
उलटे पैरों ही
वापिस न लौट जाओ !
दया करो करुणामई
मन की भक्ति में कोई कमी नहीं
निर्मल अश्रुओं की धार
तो कभी थमी नहीं
कैसे पूजन करूँ
कैसे चरण पखारूँ माँ
निर्बल हूँ, नि:संग हूँ, निरुपाय हूँ,
विवश हूँ, विक्षुब्ध हूँ, मृतपाय हूँ !

चित्र - गूगल से साभार 

साधना वैद

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