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Saturday, June 11, 2016

सुरभित प्रेम




दिग दिगंत
सुरभित प्रेम से
दिव्य है भाव
सागर से गहरा
आकाश से व्यापक !


प्रीत की ज्योत
सदा बाले रखना
उर अंतर
तृप्त रहेगा मन
आलोकित जीवन !


रही निहार
खिड़की पर खड़ी
बूंदों की लड़ी
कब आयेगी पिया
तेरे आने की घड़ी !


प्रेम के रंग
भावों की पिचकारी
रंग दे पिया
अपने ही रंग में
मेरी चूनर कोरी !


दिव्य प्रकाश
प्रेम मय जगत
धरा प्रफुल्ल
करे अभिनंदन
नवोदित रवि का !


रास की रात
मंत्रमुग्ध राधिका
विमुग्ध कान्हा
हर्षित ग्वाल बाल
आल्हादित यमुना !



साधना वैद  

चित्र --- गूगल से साभार