
मँहगाई की मौत हमें तुम मत मरने दो ,
अपना वेतन हमें नियंत्रित खुद करने दो !
नहीं चाहिये हमको ऐसी शिक्षा दीक्षा ,
जहाँ कागज़ी स्कूलों में बच्चे पढ़ते ,
जहाँ न शिक्षक शाला के पथ पर पग धरते ,
जहाँ न बच्चे कक्षा की सीढ़ी पर चढ़ते !
हमें हमारी मेहनत का पैसा जीने दो
अपना वेतन हमें नियंत्रित खुद करने दो !
नहीं चाहिये हमें मेट्रो, ए. सी. गाड़ी
हमें लुभाती है रिक्शे की आम सवारी ,
इनके जीने का साधन मत छीनो इनसे
इन पर भी हैं जीवन की विपदाएं भारी !
चंद निवालों का हक तो इनको मिलने दो ,
अपना वेतन हमें नियंत्रित खुद करने दो !
कब तक बहलाओगे झूठे वादों से तुम
कितना ताण्डव कथित ‘विकास’ मचायेगा ,
जो कुछ मुख से छीन निवाला पाया है
सब विदेश के खातों में रच जायेगा !
नए करों का बोझा मत हम पर लदने दो
अपना वेतन हमें नियंत्रित खुद करने दो !
जिस सुविधा का लाभ हमें मिलना ही ना हो
उसका बोझा हम पर क्यों लादा जाता है ,
जिस विकास का मीठा फल पाता है कोई
उसके लिए गरीब को क्यों जोता जाता है !
चन्द्र कला सी रूखी रोटी मत घटने दो ,
अपना वेतन हमें नियंत्रित खुद करने दो !
हमको नित चलना है संघर्षों के पथ पे
जाना है मंज़िल तक निज पैरों के रथ पे
जलना है नित सूरज की भीषण अगनी में
करना है संग्राम नियति से हर इक हक़ पे !
हमको अपने सुख दुःख का फल खुद चखने दो
अपना वेतन हमें नियंत्रित खुद करने दो !
साधना वैद