
नभ में कितने तारे रोज़ निकलते हैं
उपवन में कितनी कलियाँ नित खिलती हैं
किसका सौरभ जीवन को महकायेगा ,
किसकी सुषमा अंतर सुन्दर कर देगी
किसका पारस परस प्राण भर जायेगा !
नदिया में नित कितनी लहरें उठती हैं
मन की पीड़ा कौन बहा ले जायेगी ,
सदियों से प्यासे इस मेरे तन मन को
अपने अमृत से प्लावित कर जायेगी !
दूर गगन में कितने पंछी उड़ते हैं
कौन लौट कर वापिस घर को आयेगा ,
किसके पंखों की धीमी आहट सुन कर
बूढ़ी माँ का हृदय धीर पा जायेगा !
कितने संशय मन में घर कर जाते हैं
कितने प्रश्नों से अंतर अकुलाता है ,
है वह आखिर एक कौन सा पल ऐसा
जिसमें मन का हर उत्तर मिल जाता है !
साधना वैद


