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Thursday, March 10, 2016

शहीद को सलाम



(१)
मान बढ़ा कर देश का, लौटा वीर जवान
सोया है ताबूत में, करके जाँ कुर्बान !

(२)
जान गँवाई वीर ने, जमा शत्रु पर धाक
मातम छाया देश में, हुआ कलेजा चाक !

(३)
सीने में हैं गोलियाँ, क्षत विक्षत है देह
जान लुटा कर देश पे, आया अपने गेह !

(४)
बाँध कफ़न सिर पर चले, सैनिक वीर जवान 
मातृभूमि के वास्ते, करने को बलिदान !

(५)
उंतिस वर्णी फूल औ' सात रंग के हार
भारत माँ के हृदय पर, शोभित यह गल हार ! 

(६)
बाइस भाषा में लिखें, 'भारत मेरी शान'
कोटिक कंठों से करें, माता का गुणगान !

जय हिंद


साधना वैद

Monday, March 7, 2016

महिलाओं के साथ भेदभाव क्यों ....?

        अन्तर्राष्ट्रीय  महिला दिवस पर विशेष प्रस्तुति !


    बड़े दुःख के साथ आज आप सबके साथ अपनी पीड़ा बाँटना चाहती हूँ ! औरों का तो पता नहीं लेकिन मुझे आज अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस पर ज़रा भी गर्व की अनुभूति नहीं हो रही है ! विश्व में महिलाओं ने प्रगति के रास्ते पर न जाने कितने परचम लहराए हैं, सफलता के न जाने कितने कीर्तिमान स्थापित किये हैं और यश सिद्धि के न जाने कितने सोपान चढ़ कर वे सर्वोच्च शिखर पर जा पहुँची हैं लेकिन हमारे देश में महिलाओं के साथ आज भी जिस तरह से भेदभाव किया जाता है, उनके साथ जिस तरह से दोमुहाँ व्यवहार किया जाता है उससे घोर वितृष्णा का अहसास होता है !


    हमारे अपने देश में महिलायें इन दिनों पंडितों और तथाकथित धर्माचार्यों के कट्टरवाद की शिकार हो रही हैं उसे देख कर मुझे बहुत पीड़ा होती है ! कुछ दिन पूर्व शिगनापुर में शनिदेव के मंदिर में महिलाओं के प्रवेश निषेध का समाचार सुना था तो आश्चर्य मिश्रित दुःख हुआ ! अब नासिक के पास त्र्यम्बकेश्वर महादेव के मंदिर में भी महिलाओं के प्रवेश निषेध का किस्सा सामने आ रहा है ! ऐसे प्रसंगों के परिप्रेक्ष्य में अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस पर जब महिलाओं के उत्थान और महात्म्य की खोखली बातें बढ़ चढ़ कर की जाती हैं तो सचमुच बहुत क्षोभ होता है ! हम किस झूठी दुनिया में जी रहे हैं ! भगवान की पूजा अर्चना के लिये भी महिला और पुरुष में भेद किया जाता है ! क्या यह किसी क़ानून की किताब में लिखा है कि किसी मंदिर विशेष में महिलाओं का प्रवेश वर्जित है ? अगर नहीं लिखा है तो किस अधिकार से वहाँ के पंडित पुजारी उन्हें पूजा करने से रोक सकते हैं ? और अगर सदियों से चली आ रही परम्परा और प्रथा की बात की जाती है तो ऐसी गलत प्रथाओं और परम्पराओं का टूटना ही बेहतर है जो महिलाओं को उनके बुनियादी अधिकारों से वंचित रहने के लिये विवश करें !

    क्या भगवान का स्टेटस भी शहर और स्थान के अनुरूप बदल जाता है ? जब अन्य शहरों में महिलायें शनिदेव की या शिवजी की पूजा मंदिर के अंदर जाकर कर सकती हैं और वहाँ के पंडित पुजारियों को उनके पूजा करने से कोई आपत्ति नहीं होती तो शिगनापुर के शनिदेव के मंदिर और नासिक के पास त्र्यम्बकेश्वर महादेव के मंदिर के पुजारियों को क्यों आपत्ति होती है ? क्या अन्य शहरों के मंदिरों में स्थापित शनिदेव और महादेव शिगनापुर और नासिक के भगवान से दोयम दर्जे के हैं ? क़ानून की किताबों में जब इस तरह का कोई निषेध नहीं है तो इन स्थानों का प्रशासन और पुलिस आंदोलनकारियों को दबाने के स्थान पर इन कट्टरवादी पंडितों और धर्माचार्यों पर लगाम क्यों नहीं कसते ? या ये भी पंडित पुजारियों के हाथों की कठपुतली बने हुए हैं ?


    अन्तर्राष्ट्रीय महिला दिवस पर अपने देश में महिलाओं को इस तरह के पक्षपात और भेदभाव का सामना करना पड़ रहा है इससे बड़ी शर्म की और क्या बात हो सकती है ! ज़रूरत है कि पुरुष प्रधान हमारे इस समाज में इस तरह की रुग्ण मानसिकता से पुरुष स्वयं को मुक्त करें और महिलाओं पर व्यर्थ की निरर्थक वर्जनाएं लाद कर उनका मानसिक शोषण करने से बाज आयें ! आज के दिन यदि महिलाओं के मान की रक्षा कर उन्हें इस विवाद से मुक्त कर मंदिर में प्रवेश की अनुमति दे दी जाती है तो प्रगति की राह पर यह उनकी सबसे महत्वपूर्ण जीत होगी और सच्चे अर्थों में इस महिला दिवस पर वे आत्मविश्वास और स्वाभिमान से भर उठेंगी ! उन्हें अपने पर भरोसा हो सकेगा कि अपने दम पर वे भी समाज में कोई सकारात्मक बदलाव लाने में सक्षम हैं ! और तब ही महिला दिवस मनाने में सच्चा आनंद आयेगा !



साधना वैद    

Sunday, March 6, 2016

मिजाज़पुर्सी



अस्पताल के बिस्तर पर अर्धमूर्छित अवस्था में पड़ी माँ को मैं किसी तरह संतरे का जूस फीडर से पिलाने की कोशिश कर रही थी कि दरवाज़े पर किसीने दस्तक दी ! फीडर मेज़ पर रख दरवाजा खोला तो मेरे कॉलेज की सहयोगी सरिता एकदम मेरे गले से लिपट गयी !

“ये क्या हो गया आंटी को सुधा ! मुझे तो कल ही पता चला !” रुंधे स्वर में बोलती आँखों में आँसू भरे मेज़ पर सेव का पैकेट रखते हुए सरिता माँ के पास ही कुर्सी खींच बैठ गयी !

“क्या बताएं सरिता ! आजकल के ये बेलगाम लड़के इतनी रैश ड्राइविंग करते हैं कि औरों की सेफ्टी की तो उन्हें चिंता ही नहीं रहती !” मैं माँ के सिर के नीचे तकिया ठीक से लगा कर पीछे मुड़ी कि सरिता के मोबाइल पर बीप बज उठी !

“बिलकुल सही कह रही हो तुम लेकिन कहाँ हुआ एक्सीडेंट ? डॉक्टर क्या कहते हैं ? कितने दिन में ठीक हो जायेंगी आंटी ?” सरिता की आँखें अपने मोबाइल पर गढ़ गयी थीं ! इतने दिनों के बाद कोई मेरा दर्द बाँटने आया था ! सरिता को देख मेरा मन भर आया ! दूसरे पलंग पर फैले कपड़ों और घर से लाये हुए सामान को समेटते हुए मैं उसे बताने लगी !

“पिछले सोमवार को माँ शाम को मंदिर से लौट रही थीं तभी तेज़ रफ़्तार से आती बाइक से वो टकरा कर गिर गयीं ! उनकी कूल्हे की हड्डी में फ्रैक्चर हो गया ! सिर में भी गहरी चोट है ! अभी तक तो उन्हें ठीक से होश भी नहीं आया है ! पता नहीं कितने दिन और अस्पताल में रहना होगा ! बहुत मँहगा इलाज चल रहा है ! रोज़ दो हज़ार रुपयों के इंजेक्शंस लग रहे हैं ! समझ नहीं आ रहा है कि कैसे इन्तज़ाम होगा !’’ सहानुभूति की अपेक्षा में मैं सरिता की ओर मुड़ी ही थी एक ज़ोरदार ठहाके की आवाज़ सुनाई दी ! “अरे वाह ! सुन तो सही कितना मज़ेदार जोक है !’’ सरिता लोटपोट हुई जा रही थी और मैं हतप्रभ सी उसे देखे जा रही थी !




साधना वैद 

Thursday, March 3, 2016

स्वर्णिम प्रकाश से तुम


 स्वर्णिम प्रकाश से तुम

 
                                                      
                                                                           पिघलती सी मैं

                                                                     
                                                                  सलीब पर टँगी रूह

                                                                   
                                                                      यकीन है




साधना वैद

Monday, February 29, 2016

आ गया बसंत है


मंगल गाओ 
ऋतुराज पधारे 
द्वार सजाओ ! 

फूलों के बाण
 सकुचाई सी प्रिया 
मुग्ध मदन !

दूर मंज़िल 
उदास मधुमास 
तुम न पास ! 

जता देते हैं 
भ्रमर के सुगीत 
बसंत आया ! 

प्रेम दिवस 
चिरंतन प्रेम को 
बौना बनाए ! 

रंगों का खेल 
खेल रही प्रकृति 
फूलों के संग ! 

आम का बौर 
सुरभित पवन 
कूके कोकिला ! 

अल्पना सजी 
घर आँगन द्वारे 
साँझ सकारे ! 

पुकारे धरा 
आ गया बसंत है 
गाये गगन 
आ गया बसंत है 
आ गया बसंत है !



साधना वैद





Friday, February 26, 2016

घर फूँक तमाशा




     देश में कहीं कुछ हो जाये हमारे मुस्तैद उपद्रवकारी हमेशा बड़े जोश खरोश के साथ हिंसा फैलाने में, तोड़ फोड़ करने में और जन सम्पत्ति को नुक्सान पहुँचाने में सबसे आगे नज़र आते हैं । अब तो इन लोगों ने अपना दायरा और भी बढ़ा लिया है । वियना में कोई दुर्घटना घटे या ऑस्ट्रेलिया में, अमेरिका में कोई हादसा हो या इंग्लैंड में, हमारे ये ‘जाँबाज़’ अपने देश की रेलगाड़ियाँ या बसें जलाने में ज़रा सी भी देर नहीं लगाते । विरोध प्रकट करने का यह कौन सा तरीका है समझ में नहीं आता । यह तो हद दर्ज़े का पागलपन है ।
     आजकल यह रिवाज़ सा चल पड़ा है कि सड़क पर कोई दुर्घटना हो गयी तो तुरंत रास्ता जाम कर दो । जितने भी वाहन आस पास से गुज़र रहे हों उनको आग के हवाले कर दो फिर चाहे उनका दुर्घटना से कोई लेना देना हो या ना हो और घंटों के लिये धरना प्रदर्शन कर यातायात को बाधित कर दो । किसी अस्पताल में किसी के परिजन की उपचार के दौरान मौत हो गयी तो डॉक्टर के नर्सिंग होम में सारी कीमती मशीनों को चकनाचूर कर दो और डॉक्टर और उसके स्टाफ की जम कर धुनाई कर दो । जनता का यह व्यवहार कुछ विचित्र लगता है । हद तो तब हो जाती है जब अपना आक्रोश प्रदर्शित करने के लिये ये लोग आम जनता की सहूलियत और ज़रूरतों को पूरा करने के लिये वर्षों के प्रयासों और जद्दोजहद के बाद जैसे तैसे जुटायी गयी बुनियादी सेवाओं को अपनी वहशत का निशाना बनाते हैं ।
आम जनता के मन में यह भ्रांति गहराई तक जड़ें जमाये हुए है कि सारी रेलगाड़ियाँ, बसें या सरकारी इमारतें ‘सरकार’ की हैं जो कोई दूसरे पक्ष का व्यक्ति है और उसके सामान की तोड़ फोड़ करके वे अपना बदला निकाल सकते हैं । हम सभी यह जानते हैं कि हमारा देश अभी पूरी तरह से सुविधा सम्पन्न नहीं हुआ है । अभी भी किसी क्षेत्र की किसी ज़रूरत को पूरा करने के लिये सरकार को एड़ी चोटी का ज़ोर लगाना पड़ता है और उस सुविधा का उपभोग करने से पहले आम जनता को भारी मात्रा में टैक्स देकर धन जुटाने में अपना योगदान करना पड़ता है तब कहीं जाकर दो शहरों को जोड़ने के लिये किसी बस या किसी रेल की व्यवस्था हो पाती है या किसी शहर में बच्चों के लिये स्कूल या मरीज़ों के लिये किसी अस्पताल का निर्माण हो पाता है । लेकिन चन्द वहशी लोगों को उसे फूँक डालने में ज़रा सा भी समय नहीं लगता । अपने जुनून की वजह से वे अन्य तमाम नागरिकों की आवश्यक्ताओं की वस्तुओं को कैसे और किस हक से नुक्सान पहुँचा सकते हैं ? जो लोग इस तरह की असामाजिक गतिविधियों में लिप्त रहते हैं क्या वे कभी रेल से या बस से सफर नहीं करते ? अपने परिवार के बच्चों को स्कूलों में पढ़ने के लिये नहीं भेजते या फिर बीमार पड़ जाने पर उन्हें अस्पतालों की सेवाओं की दरकार नहीं होती ? फिर बुनियादी ज़रूरतों की इन सुविधाओं को क्षति पहुँचा कर वे किस तरह से एक ज़िम्मेदार नागरिक होने का दायित्व निभा रहे होते हैं ?

    लोगों तक यह संदेश पहुँचना बहुत ज़रूरी है कि जिस सरकारी सम्पत्ति को वे नुक्सान पहुँचाते हैं वह जनता की सम्पत्ति है और उसके निर्माण के लिये उनकी खुद की भी गाढ़े पसीने की कमाई कर के रूप में जब सरकार के पास पहुँचती है तब ये सुविधायें अस्तित्व में आती हैं । इन के नष्ट हो जाने से पुन: इनकी ज़रूरत का शून्य बन जाता है और उसकी पूर्ति के लिये पुन: अतिरिक्त कर भार और उसके परिणामस्वरूप बढ़ने वाली मँहगाई का दुष्चक्र आरम्भ हो जाता है जिसका खामियाज़ा चन्द लोगों की ग़लतियों की वजह से सभी को भुगतना पड़ता है । यह नादानी कुछ इसी तरह की है कि घर में किसी बच्चे की नयी कमीज़ की छोटी सी माँग पूरी नहीं हुई तो वह अपने कपड़ों की पूरी अलमारी को ही आग के हवाले कर दे ।
इस समस्या के समाधान के लिये ज़रूरी है कि जन प्रतिनिधि अपने क्षेत्र के नागरिकों को केवल धरना प्रदर्शन का प्रशिक्षण ही ना दें वरन उनके कर्तव्यों के लिये भी उन्हें जागरूक और सचेत करें । नेता गण खुद भी धरना प्रदर्शन और हिंसा की राजनीति से परहेज़ करें और आम जनता के सामने संयमित और अनुशासित आचरण कर अच्छे उदाहरण प्रस्तुत करें ताकि जनता के बीच उद्देश्यपूर्ण संदेश प्रसारित हो । रेडियो और टी.वी. चैनल्स पर नागरिकों को इस दिशा में जागरूक करने के लिये समय समय पर संदेश प्रसारित किये जायें और मौके पर तोड़ फोड़ की असामाजिक गतिविधि में लिप्त पकड़े गये लोगों को कठोर दण्ड दिया जाये उन्हें सिर्फ चेतावनी देकर छोड़ा ना जाये । जब तक कड़े कदम नहीं उठाये जायेंगे हम इसी तरह पंगु बने हुए इन उपद्रवकारियों के हाथों का खिलौना बने रहेंगे ।

साधना वैद

Tuesday, February 23, 2016

बातों की पोटली






(१)
काम क्रोध मद लोभ सब, हैं जी के जंजाल
इनके चंगुल जो फँसा, पड़ा काल के गाल !

(२)
परमारथ की राह का, मन्त्र मानिये एक
दुर्व्यसनों का त्याग कर, रखें इरादे नेक ! 

(३)
माया ममता मोह से, रहें सदा जो दूर  
निकट रहें प्रभु के सदा, सुख पायें भरपूर !

(४)
रिश्ते ये अनमोल हैं, मत कीजे अपमान 
तोल मोल कर बोलिये, देकर सबको मान !

(५)
जिसका अंतस प्रेम औ' करुणा का आगार 
मानवता हित है वही, एक बड़ा उपहार !

(६)
प्रभुजी मुझको दीजिये, बस इतना वरदान 
नैन भरें पर पीर से, पर दुख कसकें प्राण !

(७)
हँसते-हँसते पी लिये, हमने ग़म हर बार 
ऐसे ही तर जायेंगे, भवसागर के पार ! 

साधना वैद