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Monday, October 1, 2018

ज़माना बदल गया है



हाथ में किसी विवाह समारोह का बड़ा सा निमंत्रण पत्र लिए दीपक ने कमरे में प्रवेश किया ! शांता ने उत्सुकता से पूछा, “कहाँ से आया कार्ड बचुआ किस की शादी का है ?”
“अम्माँ, भोपाल से आया है ! क्षितिज भैया की बड़ी बेटी प्रवीणा की शादी है इसी महीने की पंद्रह तारीख की ! जाना तो पड़ेगा ही ! उनके घर की पहली शादी है ! वो भी मामाजी के बाद की ! तुम चलोगी अम्मा ? सीमा तो नहीं जा सकेगी ! बच्चों के सालाना इम्तहान सिर पर हैं ! तुम चली चलोगी तो मामीजी भी खुश हो जायेंगी !”
शांता की आँखों में उल्लास दमक उठा ! लेकिन अपने इकलौते बड़े भाई के दुखद अवसान की स्मृतियों ने उनकी आँखें भी छलका दीं ! उम्र के किसी भी मुकाम पर पहुँच जायें मायके के नाम भर से ही हर भारतीय स्त्री के मन में जलतरंग सी बज उठती है ! फिर भी ऊपरी मन से कहा, “अरे मैं कैसे जाउँगी इतनी दूर बचुआ ! घुटनों और कमर के दर्द के मारे अब ना तो चला फिरा जाता है ना उठा बैठा जाता है ! बहू भी साथ न जायेगी तो कौन ख़याल रखेगा मेरा ! मैं यहीं रह जाउँगी बच्चों के पास तुम बहू को लेकर चले जाना !” कह तो दिया शांता ने पर मन में यही खुटका लगा था कि कहीं दीपक मान न जाए ! इस बहाने सबसे मिलना भी हो जाएगा ! अबके हाथ से निकल गया तो फिर ऐसा अवसर मिले न मिले !
दीपक ने दृढ़ता से सर हिला कर कहा, “नहीं अम्मा सीमा तो बिलकुल नहीं जा सकेगी ! बच्चों के पास सिर्फ रहने की ही ज़रुरत थोड़े ही होती है बच्चों को तो पढ़ाती भी सीमा ही है ! वो चली जायेगी तो बच्चों के पर्चे बिगड़ जायेंगे ! तुमको परेशानी हो रही है तो रहने दो मैं अकेला ही चला जाउँगा ! सोच रहा था कि जैसे क्षितिज भैया की शादी में तुमने संध्या के लिए विकास जी का रिश्ता ढूँढ लिया था इस बार अपनी अंशिका के लिए भी कोई होनहार लड़का मिल जाता तो बड़ी चिन्ता मिट जाती !”
शांता ने जल्दी से पैंतरा बदला, “अरे बुढ़ापा है तो ऐसा थोड़े ही है कि रिश्ते नाते सब ताक पर धर दिए जायें ! जाना तो पड़ेगा ही ! तुम टिकिट बुक करवा लो बचुआ ! मैं चलूँगी तुम्हारे साथ !“
*** *** ***
भोपाल स्टेशन के प्लेटफार्म पर जैसे ही गाड़ी पहुँची लम्बी यात्रा की सारी थकान भुला कर शांता की आँखें उल्लास से चमकने लगीं ! खिड़की से गर्दन निकाल बाहर खड़े तमाम आदमियों की भीड़ में वो क्षितिज का चेहरा खोज रहीं थीं ! उन्हें पक्का विश्वास था अपनी बुआ को लिवाने वो ज़रूर आयेगा !
“बचुआ, तनिक इंतज़ार कर ले ना ! इत्ती भीड़ में ढूँढने में देर लगी होगी ! क्षितिज आयेगा ज़रूर !”
“अरे नहीं अम्माँ, चलते हैं ना ऑटो करके ! लड़की का ब्याह है ! नहीं मिला होगा टाइम ! कहाँ खड़े रहेंगे प्लेटफार्म पर ! चलो आओ ऑटो कर लेंगे तो जल्दी पहुँच जायेंगे !” दीपक ने कुली के सर पर सामान लदवाया और ऑटो वाले को होटल का पता बताया जहाँ से शादी होनी थी !
होटल पहुँचने पर अगवानी के लिए जब कोई घर का सदस्य दिखाई ना दिया तो शांता ने शंकित हो दीपक से पूछा, “यही होटल है न बचुआ ? तुमने कार्ड में ठीक से नाम देखा लिया था ना ? यहाँ तो कोई है ही नहीं ! ना भाभी, ना क्षितिज, ना कोई नाते रिश्तेदार !”
“यही होटल है अम्माँ ! सब काम में लगे होंगे ! तुम बैठो आराम से ! हम पता लगाते हैं !”
दीपक रिसेप्शन पर जाकर मैनेजर से बात करने लगा ! मैनेजर ने जब उसका और शांता का पहचान पत्र माँगा तो शांता का मूड बिलकुल खराब हो गया ! ये कैसी जगह आ गए ! ये तो नहीं कि कुछ चाय पानी को पूछते उलटे घर के बड़े बूढों से पहचान पत्र और माँगा जा रहा है ! कहूँगी क्षितिज से कैसे लोगों को काम पर लगाया है ! ज़रा भी तौर तरीका नहीं जानते खातिरदारी का ! अभी तक भैया के घर के किसी भी सदस्य की शक्ल देखने को नहीं मिली थी उन्हें ! विश्वास ही नहीं हो रहा था कि दीपक सही होटल में आया है ! तभी दीपक उनके पास आया, “चलो अम्मा चौथी मंज़िल पे चलना है !” होटल स्टाफ के कर्मचारी ने सामान लिफ्ट में लगा दिया ! साफ़ सुथरे सजे सजाये कमरे में पहुँच कर भी शांता अनमनी सी थीं ! लम्बी यात्रा की थकान तो थी ही सर में भी हल्का सा दर्द था ! उन्हें चाय की तलब लगी थी लेकिन यहाँ तो कोई चाय पानी को पूछने वाला भी न था !
दीपक ने कहा, “अम्मा बिस्तर पर लेट कर कमर सीधी कर लो अपनी ! मैं ज़रा बाहर देख कर आता हूँ ! कौन कहाँ ठहरा है !” दीपक के जाने के बाद शांता ने कमरे में चारों ओर नज़र दौड़ाई ! टेबिल पर बिसलेरी की बोतल और दो खाली गिलास ढके हुए रखे थे ! एक ट्रे में चाय की केतली और दूध चाय चीनी के कई किस्म के सेशे रखे थे ! चाय पीना है तो खुद ही बना लो और पी लो ! अपने आप गिलास में पानी डालते हुए उनके नेत्र भर आये ! वहीं कुर्सी पर बैठ गयीं वे ! शांता के मन में स्मृतियों का ज्वार भाटा करवटें ले रहा था !
*** *** ***
यही कोई तीस पैंतीस साल पुरानी बात होगी ! इसी क्षितिज की शादी में कितने चाव से आई थीं वे अपने पूरे परिवार के साथ ! उनकी खुशी और उत्साह जैसे बात-बात पे छलका पड़ता था ! खरामा-खरामा चलते हुए ताँगा जब आम के पत्तों और पतंगी कागज़ की झंडियों से सजे बालकिशन जी के छोटे से घर के आगे रुका तो घर भर में जैसे खुशी का सागर लहराने लगा ! पहली मंज़िल की बालकनी से हर्षमिश्रित आवाज़ें आने लगीं !
“माँ, शांता बुआ आ गयीं !” आल्हादित बच्चे धड़ धड़ दो दो सीढ़ियाँ फलाँगते बुआ से मिलने टाँगे के पास आ खड़े हुए ! घर के दरवाज़े पर महिलाओं का जमघट लग गया ! शांता के पैर खुशी के मारे ज़मीन पर नहीं पड़ रहे थे ! मिठाई का डिब्बा, पर्स, रेल की लम्बी यात्रा के दौरान तमाम छोटी मोटी ज़रुरतों के सामान से भरा हैण्ड बैग सबको सम्हालती वह टाँगे से उतरीं तो हर्षातिरेक से आँखें छलक उठीं ! अपने भतीजे क्षितिज की शादी में सम्मिलित होने के लिए देहरादून से आई थीं वे ! सामान की ज़िम्मेदारी बेटे और पति पर छोड़ वे बेटी संध्या का हाथ थाम दरवाज़े की ओर चल दीं ! किसीने मिठाई का डिब्बा, किसीने पर्स, किसीने हैण्ड बैग हाथों से ले शांता को हल्का कर दिया और भाभी ने पलक झपकते ही उन्हें अपनी बाहों में भर लिया !
“बड़ी देर लगा दी जिज्जी ! आँखें पथरा गईं रस्ता देखते-देखते ! अरे मुनिया ! शरबत ला जल्दी से ! गला सूख रहा होगा जिज्जी का !”
“अब रौनक हुई है घर में !” यह गद्गद स्वर बाल किशन जी का था जो बहनोई को बाहों में थामे दरवाज़े से अन्दर आ रहे थे !
“अब आयेगा मज़ा गीतों में ! ढोलक सम्हालने वाली जो आ गईं !”
“अरे जमाई बाबू को भी शरबत भिजवाया कि नहीं किसीने ?”
“वेदान्त, जिज्जी का सामान हमारे ही कमरे में रखवा देना !”
इस बीच शांता घर में जुटे तमाम रिश्तेदारों से मिलने मिलाने में व्यस्त हो गयी थीं ! हाथ में शरबत का गिलास थामे वे किसीके गले लगतीं, किसीके सर पर प्यार से हाथ फेरतीं, किसीके गाल चूमतीं तो अपने पैरों पर झुकी किसी नई नवेली बहू को आशीर्वाद देतीं ! तभी बड़ी सी ट्रे में कई कप चाय और लड्डू, मठरी, सेव, शकर पारे का पेटेंट नाश्ता आ गया !
“अरे भाभी हाथ मुँह तो धो लेते ! इतनी दूर से सफ़र करके आये हैं !” शांता ने कप हाथों में पकड़ते हुए गदगद भाव से कहा !
“हाथ मुँह धो के फिर से पी लेना जिज्जी ! अभी इस कप से थकान तो उतार लो ज़रा !”
और फिर गपशप का हँसी ठिठोली का जो सिलसिला शुरू हुआ उसका न आदि था न अंत !
*** *** ***
खाली कमरे में बोतल के पानी से घूँट भरते शांता की रुलाई फूटी पड़ रही थी ! तभी दीपक ने कमरे में प्रवेश किया, “यहाँ तो सबके दरवाज़े बंद हैं अम्माँ ! एकाध कमरे में पूछा भी तो वो शादी वाले घर के मेहमान नहीं थे ! नीचे मैनेजर ने बताया कि क्षितिज भैया ने पंद्रह कमरे बुक कराये हैं वो किस कमरे में है यह तो उसे भी नहीं पता ! शाम को छ: बजे से नीचे दरबार हॉल में कार्यक्रम है संगीत और सगाई का ! तभी सबसे मिलना होगा ! तब तक आराम करो ! चाय पियोगी ? मैं बनाता हूँ ! कुछ खाना हो तो निकाल लो अपने साथ जो लाईं थीं देहरादून से ! यहाँ तो लंच का समय ख़त्म हो गया ! बिस्किट मठरी तो होंगे पास में ? नहीं तो बाहर से ले आता हूँ कुछ !”
”नहीं बचुआ, कुछ नहीं चाहिए ! तू चाय बना ले बस ! सर में दर्द हो रहा है ! थोड़ी देर सो लूँगी तो आराम मिल जाएगा !” कुछ उपेक्षित अपमानित सा महसूस कर रहीं थीं शांता ! इलेक्ट्रिक केतली में बनी अंग्रेज़ी स्टाइल की बेस्वाद चाय के सहारे उन्होंने सिरदर्द की एक गोली किसी तरह गले के नीचे उतारी ! कहीं उनके मन का अवसाद दीपक ना भाँप ले वे जल्दी से चादर सिर तक लपेट बिस्तर पर मुँह फेर कर लेट गयीं !
शांता का मन उदास हो गया ! अपनी प्यारी भाभी को गले लगाने की साध मन में ही रह गयी ! भैया की मौत को तीन साल बीत गए थे ! तब से अब आने का मौक़ा मिला था उन्हें ! सोचा था खूब सुख दुःख की बातें करेंगी उनके साथ लेकिन यहाँ तो उनके दर्शन ही नहीं हुए थे अभी ! कैसी शादी है यह कोई हाल चाल पूछने को भी नहीं आया ! उन्हें मलाल हो रहा था क्यों आ गईं वे ! यहाँ शायद ना किसीको उनका इंतज़ार था ना ज़रुरत !
शांता को थोड़ी देर झपकी आ गयी तो अवसाद का साया भी कुछ छँँट सा गया ! सोकर उठीं तो आँखों में फिर से चमक आ गयी ! मन की गति समझ नहीं आती ! घंटे भर पहले की खीझ न जाने कहाँ बिला गयी ! सबसे मिलने की उत्कंठा फिर से मन में हिलोरें लेने लगी ! वो सूटकेस से कपड़े निकाल तैयार होने लगीं ! आज तो संगीत का कार्यक्रम है ! सीमा को ताकीद करके अपने गीतों की कॉपी उन्होंने याद से सूटकेस में रखवा ली थी ! ना जाने कितने बरसों से उसमें बन्ना बन्नी, जच्चा सोहर, देवी के गीत, भजन इत्यादि उतारती रहती थीं वे ! पहले तो बड़ी डिमांड में रहा करती थी उनकी यह कॉपी शादियों में ! शांता के मन में खुशी और जोश की तरंगें उठने लगीं ! अब संगीत में अपनी खूब धाक जमा लेंगी वो आजकल की इन बहू बेटियों के सामने ! इन टिकटेलों के गानों में उनसे कोई मुकाबला नहीं कर सकता ! तैयार होते-होते वे सीता के मंगल की लाइनें दोहराती रहीं !
शाम छ: बजे से पहले ही शांता दीपक के साथ दरबार हॉल में पहुँच गयीं ! उन्हें देखते ही क्षितिज उनके स्वागत के लिए बढ़ कर आया ! उसने तपाक से शांता के पैर छुए दीपक को गले लगाया ! शांता का क्षोभ पल भर में तिरोहित हो गया ! उनकी नज़रें अपनी भाभी को ढूँढ रही थीं, “भाभी नहीं दिखाई दे रहीं बचवा ! कहाँ हैं ? सामान की उठा धराई में ही लगी होंगी ! आदत छूटती कहाँ है आसानी से !” शांता ने हँस कर कहा !
“अरे नहीं बुआ ! अब उनसे कहाँ कुछ हो पाता है ! गठिया के दर्द के मारे उठना बैठना मुश्किल है ! आती होंगी अभी ! शाश्वत उन्हें लिवाने ही गया है ऊपर !”
“और कौन-कौन आ गया मेहमानों में ! दिखाई नहीं दे रहा कोई !”
“काफी लोग आ गए हैं बुआ ! सिद्धांत तो कनाडा में है ! वो और उसका परिवार तो आ नहीं सके इतनी दूर से ! वेदान्त आया है जबलपुर से ! कई लोग घूमने चले गए हैं ! कोई बड़े ताल में बोटिंग करने गए हैं तो कोई भीम बैठका चले गए हैं ! कुछ शॉपिंग करने निकल गए हैं ! आते होंगे सब !”
तभी अपनी दादी को कंधे का सहारा देकर क्षितिज का बेटा शाश्वत हॉल में लेकर आया ! भाभी की दुर्बल काया देख शांता का कलेजा मुँह को आ गया, “ये क्या हाल बना लिया भाभी अपना !” भाभी के गले लग रो पड़ींं वे ! भाभी के नेत्रों से भी गंगा जमुना उमड़ पड़ी ! शाश्वत को चाय लाने के निर्देश देने बाद क्षितिज दीपक से बातें करने लगा !
“अरे, आप यहाँ बैठे हैं वहाँ पंडित जी आपको बुला रहे हैं वो चाँदी मढ़ी सुपारी का पैकेट सामान में नहीं मिल रहा है ! कहीं घर पर ही तो नहीं रह गया ? अगर ऐसा है तो आपको ही जाना पड़ेेगा !” क्षितिज की पत्नी वन्दना व्यग्र भाव से बिना इधर उधर देखे क्षितिज को पुकारती चली आ रही थी !
“वन्दना, शांता बुआ आई हैं देहरादून से उनसे तो मिलो पहले !” कुछ असहज होकर क्षितिज ने वन्दना को टोका !
“सॉरी बुआजी मैंने आपको देखा नहीं !” जल्दी से शांता की ओर मुड़ घुटनों तक हाथ बढ़ा वन्दना ने प्रणाम की रस्म अदा की और क्षितिज का हाथ पकड़ उसे स्टेज की तरफ ले गयी जहाँ सगाई की रस्म होनी थी !
मेहमानों का जुटना शुरू हो गया था ! हॉल के एक कोने में खाने पीने की व्यवस्था थी ! होटल के वर्दीधारी वेटर्स ट्रे में तरह-तरह के पकवान अतिथियों को सर्व कर रहे थे ! चाय, कॉफ़ी, शरबत, लस्सी, छाछ सबका इंतज़ाम था ! शांता की निगाहें बड़ी सूक्षमता से निरीक्षण कर रहीं थीं हॉल का ! गीत संगीत की व्यवस्था उन्हें कहीं दिखाई नहीं दे रही थी ! ना कहीं ढोलक रखी थी ना हारमोनियम !
वर वधु दोनों ने एक दूसरे को अँगूठी पहना दी ! सारा हॉल तालियों की गड़गड़ाहट से गूँज उठा ! डी जे के फ्लोर पर तेज़ आवाज़ में फ़िल्मी गानों का शोर सुनाई देने लगा ! घराती और बारातियों के हुजूम से तमाम नौजवान युवक युवतियाँ फ्लोर पर थिरकने लगे ! शांता ने भाभी से पूछा, “भाभी संगीत का प्रोग्राम कहाँ रखा है ! देर नहीं हुई जा रही ! जल्दी शुरू करवाओ ना !”
“जिज्जी, चल तो रहा है संगीत ! आजकल यही संगीत होता है ! सब इस डी जे पर ही उछल कूद लेते हैं ! खाने पीने के बाद बड़े बुज़ुर्ग अपने कमरों में चले जाते हैं ! लोकल मेहमान अपने घर चले जाते हैं ! बस कुछ बच्चे और नौजवान लड़के लड़कियाँ रह जाते हैं जो देर रात तक नाचते रहते हैं ! संगीत का यही सरूप हो गया है अब शादियों में !” शांता को झटका सा लगा ! बड़े मन से वे सीता का मंगल, जानकी मंगल और बड़ी सुरुचिपूर्ण बन्नियाँ याद करके आई थीं ! उन्हें याद आ रहा था कि जब वे सीता का मंगल और जानकी मंगल गाती थीं तो उनका भी गला भर आता था और सारी महिलाओं की आँखों से आँसू बहने लगते थे ! उनके जैसा हारमोनियम कोई नहीं बजा पाता था ! जब खूब बन्ना बन्नी गा लिये जाते थे तो एक-एक कर सारी महिलाओं और लड़कियों को उनकी पसंद के गीतों पर नचाया जाता था ! और खूब न्यौछावारें होती थीं जो एक थैली में जमा कर ली जाती थीं बाद में काम वालों में बाँटने के लिए ! अब तो घर वालों में से किसीके गाने की ज़रुरत ही नहीं थी ! सबकी जगह डी जे ने ले ली थी ! कान फोडू संगीत पर औरत मर्द बच्चे सब एक साथ थिरक रहे थे ! न देवी न देवता ना बन्ना न बन्नी ! बोलो तारा रा रा रा और बलम पिचकारी जैसे गाने बज रहे थे और नाचने वाले झूम-झूम कर ग्रुप में नाच रहे थे ! बड़े बुज़ुर्ग खाने का आनंद ले रहे थे ! शांता का मन खट्टा हो गया ! दीपक ने शांता के लिए प्लेट लगा कर ला दी, “लो अम्मा जल्दी से खाना खा लो ! दिन में भी कुछ नहीं खाया था ! फिर चलते हैं कमरे में ! आप भी थक गयी होगी !”
“और फेरे के लिए नहीं रुकेंगे क्या ? फेरे कब होंगे ?“ शांता ने दबे स्वर में प्रतिवाद किया !
“अरे छोड़ो अम्मा ! कितनी लम्बी यात्रा करके आई हो ! कल वापिसी के लिए इतना ही लंबा सफ़र फिर करना होगा ! फेरे होंगे रात को दो तीन बजे ! सुबह पाँच बजे बिदाई का मुहूर्त है ! कहाँ बैठी रहोगी रात भर ! सबसे मिल लीं ! सबको देख लिया ! खाना खा लो और फिर कमरे में चल कर आराम करो ! रात को ठीक से सो लोगी तो कल के सफ़र में परेशानी नहीं होगी !” शांता ने भाभी की ओर देखा ! उनकी आँखें भी दीपक का अनुमोदन करती दिखीं ! शांता का मन भाभी के संग रात गुज़ारने का था, “ठीक है बचुआ ! खाना खा लेते हैं फिर मैं तो भाभी के पास रहूँगी रात में तुम सुबह मुझे लिवा ले जाना अपने कमरे में !” भाभी संकुचित हो उठीं, “अरे नहीं जिज्जी, मेरे लिए तो वैसे ही अलग से बिस्तर लगवा कर शाश्वत और नवीना के कमरे में इंतज़ाम किया है ! आप वहाँ कैसे सो पाओगी ! कल सुबह मिलेंगे ना हम सब नाश्ते के टाइम पर ! आप अपने कमरे में आराम करो !” शांता अचंभित थीं ! पहले कैसे ज़मीन पर फर्श बिछा उस पर गद्दे डाल दिए जाते थे और एक-एक कमरे में दस-दस पंद्रह-पंद्रह लोग सो जाते थे किसीको कोई तकलीफ नहीं होती थी ! गप्पें लगाते, सोते जागते कब सुबह हो जाती थी पता ही नहीं चलता था ! अब होटल के इतने बड़े-बड़े कमरों में चार लोगों का साथ रहना मुश्किल था !
भरे मन से खाना समाप्त कर उन्होंने अपनी प्लेट दीपक को थमा दी ! कमरे में जाने से पहले एक बार उन्होंने मेहमानों से भरे हॉल में नज़र दौड़ाई ! एक बार फिर भाभी को गले लगाया और थके कदमों से अपने कमरे की ओर चल दीं ! किसीका भी ध्यान उनके आने जाने पर नहीं था ! हॉल के दरवाज़े पर एक बड़ी सी मेज़ पर ढेर सारे मिठाई के डिब्बे रखे हुए थे ! क्षितिज की छोटी बेटी नवीना हर जाने वाले मेहमान के हाथ में नमस्कार के साथ एक मिठाई का डिब्बा थमाती जा रही थी ! शांता के हाथों में भी उसने एक डिब्बा थमा दिया !
शांता को महसूस हुआ जैसे उनकी भी विदाई कर दी गयी है ! अब तो यहाँ और रुकने का कोई औचित्य भी नहीं रहा ! ज़माना वाकई बदल गया है !
साधना वैद
चित्र - गूगल से साभार

Friday, September 28, 2018

माँ मुझको भी रंग दिला दे



माँ मुझको भी रंग दिला दे
मुझको जीवन रंगना है  
सपनों के कोरे कागज़ पर
इन्द्रधनुष एक रचना है !

लाल रंग से मैं अपना
सौभाग्य लिखूँगी माथे पर
नारंगी से हर्ष और
उल्लास रचूँगी माथे पर !

पीला रंग जीवन में मेरे
ज्ञान बुद्धि भर जायेगा
हरा रंग आध्यात्म और
प्रकृति से मुझे मिलायेगा !

नीले रंग से धैर्य, न्याय के
गुण मैं चित्रित कर लूँगी
जामुनी रंग से निर्भय होकर
दूर गगन तक उड़ लूँगी !

रंग बैंगनी मानवता के
सद्गुण मुझमें भर देगा
माँ रंगों का तोहफा मेरे
सब सपने सच कर देगा !

इन्द्रधनुष के रंगों से
जीवन मेरा खिल जायेगा
मेरे हर सपने को जैसे
नया अर्थ मिल जायेगा !



साधना वैद








Thursday, September 20, 2018

जा रहा मधुमास है





पंछियों के स्वर मधुर खोने लगे
चाँद तारे क्लांत हो सोने लगे    
क्षीण होती प्रिय मिलन की आस है  
मलिन मुख से जा रहा मधुमास है ! 

वन्दना के स्वर शिथिल हो मौन हैं
करें किसका गान अतिथि कौन है
भ्रमित नैनों में व्यथा का भास है
भाव विह्वल जा रहा मधुमास है !

राह कितनी दूर तक सुनसान है
पंथ की कठिनाइयों का भान है
किन्तु मन में ढीठ सा विश्वास है
आओगे तुमजा रहा मधुमास है !

प्रेम की प्रतिमा सजाने के लिए
अर्चना के गीत गाने के लिये
तृषित उर में भावना का वास है
चकित विस्मित ठगा सा मधुमास है !

हृदय की तृष्णा विकल हो बह रही
युगों से पीड़ा विरह की सह रही
प्रियमिलन की साध का यह मास है
व्यथित व्याकुल जा रहा मधुमास है !

आओगे कब फूल मुरझाने लगे
खुशनुमां अहसास भरमाने लगे
जतन से थामे हूँ जो भी पास है
आ भी जाओ जा रहा मधुमास है ! 

साधना वैद







Friday, September 7, 2018

मेरे मितवा




मेरे मितवा
न कोई ख़त, न सन्देश, न संकेत
हर जगह से आज फिर मुझे   
खाली हाथ, रिक्त हृदय, रिक्त मन
लौटाया है तुमने   
एक बार फिर मेरी उम्मीदों,
मेरी आशा, मेरे विश्वास को
नर्मम होकर बलि
चढ़ाया है तुमने !
मितवा मेरे
ठान लिया है मैंने
तुम्हारे ज़ुल्म ओ सितम से
अब हार नहीं मानूँगी
चाहे जितनी बेरुखी दिखा लो
मैं हथियार नहीं डालूँगी !
ओ मनमीत   
आशा निराशा की इन
सावनी बदलियों को
अपने मनाकाश के किसी
सुदूर कोने में बहुत सहेज कर
छिपा लूँगी मैं और अगले बरस
सावन के महीने में
जब फिर से पुरवा चलेगी
मेरे मन में छिपी
आशा निराशा की ये बदलियाँ
एक बार फिर उमड़ घुमड़ कर
घिर आयेंगी और प्रेम रस की
उस घनघोर बारिश में भीग कर  
तुम्हारी बेरुखी का यह ताप   
खुद ब खुद शीतल हो जाएगा !
मितवा मेरे
प्रकृति से यही तो सीखा है मैंने
हर मौसम अपना पूरा जलवा दिखा
एक दिन उतार पर
अवश्यमेव आता ही है
और अंतत: परास्त हो कहीं
पार्श्व में विलीन हो जाता है
 अगले बरस एक बार फिर
उसी जोश खरोश के साथ
लौट कर आने के लिए !
मनमितवा
मैं भी अगली बार
फिर से लौट कर ज़रूर आऊँगी
और साथ ले आऊँगी वह जादू
जो विवश कर देगा तुम्हें
बेरुखी का अपना यह मुखौटा
उतार फेंकने के लिए
क्योंकि कभी हारना तो मैंने
सीखा ही नहीं !


साधना वैद 




  

Tuesday, September 4, 2018

गुरु शिष्य



शिक्षक दिवस पर विशिष्ट 

गुरु गोविन्द 
खड़े मेरे सामने
शीश उठाये 

भ्रमित मन 
सोच है भारी शीश 
किसे नवाये 

राह दिखाओ 
हरो विपदा सारी 
बाँँके बिहारी 

किसको गहूँँ 
असमंजस भारी 
कृष्ण मुरारी

गुरु को बड़ा 
बताया था जग ने 
जानता हूँ मैं 

गुरू का स्थान 
है प्रभु से भी ऊँचा
मानता हूँ मैं 

लेकिन है क्या 
शिक्षक का दायित्व 
जानते हैं वे ?

भोले बच्चों का 
क्या खुद को सर्जक 
मानते हैं वे ?  

निर्दय होके 
बच्चों पे हिंसा नहीं 
गुरु का धर्म 

देना सुशिक्षा 
सँँवारना  व्यक्तित्व 
गुरू का कर्म 

हुए शिक्षक 
लक्ष्मी के उपासक 
भूले कर्तव्य 

छोड़ी कलम 
भूले सरस्वती को 
उठाया द्रव्य 

देना सम्मान 
आदेश का पालन 
छात्र का कर्म 

गुरु की शिक्षा 
धारना अंतर में 
छात्र का धर्म 

जीवन डोर 
सौंप दी है तुमको 
पार लगाना 

दे के सुशिक्षा 
संस्कार औ' करुणा
मान बढ़ाना 

हर के तम 
भर देना प्रकाश 
सूर्य समान 

गुरु पूर्णिमा 
महत्वपूर्ण पर्व 
आनंद स्रोत 

मेरे श्रद्धेय 
मेरे अभिभावक 
तुम्हें प्रणाम 



साधना वैद 








Thursday, August 30, 2018

कौन है बैरी



कौन है बैरी
किसे माने वह अपना बैरी
उस माँ को जिसने उसे जीवन दिया
एक कच्ची मिट्टी के ढेर को
आकार दे उसकी सुन्दर मूरत गढ़ी 
सद्शिक्षा और सद्संस्कार दे
उसके व्यक्तित्व को निखारा सँवारा
संसार के सारे सुख और खुशियाँ दीं
और जीवन संगीत की मधुर स्वर लहरी में
अपना सुर जोड़ उसे गाना सिखाया !
या बैरी माने वह अपने पिता को
जिन्होंने विद्यालयों और महाविद्यालयों
की शिक्षा के साथ-साथ उसे
सदा मर्यादा और अनुशासन का
पाठ पढ़ाया और शिक्षित बना दिया,
जीवन की कड़ी धूप में घना साया बन
जिन्होंने सदा उसकी रक्षा की
और कभी उसे कुम्हलाने नहीं दिया !
फिर कहाँ कमी रह गयी कि
हर प्रकार से सर्वगुण संपन्न,
सक्षम, सुयोग्य, सुशिक्षिता यह नारी
आज हारी हुई खड़ी है  
कौन है उसका बैरी ?
क्या भाग्य ? या यह समाज ?
या कुसंस्कारी हैवानों की गंदी सोच
और घटिया मानसिकता ?
क्यों वह आज निर्भय होकर
बाहर निकल नहीं सकती ?
क्यों वह ‘इंसानों’ की इस भीड़ में
स्वयं को सुरक्षित नहीं पाती ?
क्यों ‘इंसानों’ की इस भीड़ में उसे
कोई अपना दोस्त नहीं मिलता ?
क्यों ‘इंसानों’ की इस भीड़ में हर शख्स
उसे अपना बैरी दिखाई देता है ?
कोई बताएगा
कहाँ क्या ग़लत है
और है तो वह क्यों ग़लत है ?




चित्र - गूगल से साभार 

साधना वैद 





Saturday, August 25, 2018

वो आँखें






नहीं भूलतीं वो आँखें !

मुझे छेड़तीं, मुझे लुभातीं,
सखियों संग उपहास उड़ातीं,
नटखट, भोली, कमसिन आँखें !

हर पल मेरा पीछा करतीं,
नैनों में ही बाँधे रहतीं,
चंचल, चपल, विहँसती आँखें !

मुझे ढूँढतीं, मुझे निरखतीं,
मुझे देख कर खिल-खिल उठतीं,
इंतज़ार में व्याकुल आँखें !

मुझ पर फिर अनुराग जतातीं,
कभी रूठतीं, कभी मनातीं,
स्नेह भार से बोझिल आँखें !

प्रथम प्रणय के प्रथम निवेदन 
पर लज्जा से सिहर-सिहर कर 
सकुचाती, शर्माती आँखें !

कभी बरजतीं, कभी टोकतीं,
कभी मानतीं, कभी रोकतीं,
मर्यादा में सिमटी आँखें !

विरह व्यथा से अकुला जातीं,
बात-बात में कुम्हला जातीं,
नैनन नीर बहाती आँखें !

पर पीड़ा से भर-भर आतीं,
चितवन से ही सहला जातीं,
करुणा कलश लुटाती आँखें !

जिनके भावों में भाषा है,
जिनकी भाषा में कविता है,
मौन, मुखर, मतवाली आँखें !

जिनमें रह कर जीना सीखा,
जिनमें बह कर तरना सीखा,
अंतर पावन करती आँखें !

साधना वैद

चित्र - गूगल से साभार