कॉल बेल का बटन दबाते समय नीरा के हृदय में बड़ी उथल पुथल हो रही थी – हो सकता है दरवाज़ा सौम्या भाभी ही खोलें या उनके पति विश्वास हों ! अगर कहीं सौम्या भाभी ही हुईं तो कैसे उनसे मिलूँगी ! कस के लिपट जाऊँगी उनसे । पिछले छ: महीनों में जो भावनायें मन में उमड़ती रही हैं मिलते ही सारी की सारी उनके सामने उड़ेल कर रख दूँगी । नीरा अधीर हो रही थी । कितना छटपटाई है वह इन बीते दिनों में सौम्या के सान्निध्य के लिये । शंकाओं ने फिर सिर उठाया – कहीं सौम्या भाभी यहाँ नहीं हुईं तो ? अगर हुईं भी तो क्या उनके पास वक़्त होगा उसकी बकवास सुनने के लिये ? उन्होनें लिखा था विश्वास उसे पल भर भी आँखों से दूर रखना नहीं चाहते और उनके सास ससुर तो सौम्या जैसी बहू को पाकर जैसे निहाल ही हो गये हैं । घर का हर सदस्य उसकी छोटी से छोटी इच्छा पूरी करने के लिये हमेशा तत्पर रहता है ।
नीरा का मन आशंकित हो उठा _ इतने प्यार दुलार मान सम्मान के बीच कहीं सौम्या भाभी बदल तो नहीं गयी होंगी ! उनकी रुखाई उनका ठण्डा फीका व्यवहार वह कैसे झेल पायेगी । पता नहीं वे घर पर होंगी भी या नहीं ! उन्होंने लिखा था विश्वास उन्हें टूर पर भी अपने साथ ले जाते हैं । वह तो सौम्या भाभी के अलावा अन्य किसी को यहाँ ठीक से जानती भी नहीं है । नीरा उद्विग्न हो उठी । उसे पूर्व सूचना दिये बिना यहाँ इस तरह नहीं आना चाहिये था । तरह-तरह के प्रश्न मन में उठ रहे थे । धड़कते दिल से उसने बटन दबा ही दिया और अपने भावोद्रेक पर भरसक नियंत्रण कर दरवाज़ा खुलने की प्रतीक्षा करने लगी ।
अन्दर से कुण्डी खुलने की आवाज़ आई और द्वार खुलते ही एक प्रौढ़ महिला का चेहरा सामने दिखाई दिया । नीरा के चेहरे पर उचटती सी दृष्टि डाल उन्होंने रूखे स्वर में पूछा, ” कहिये! किससे मिलना है ? “
स्वर के तीखेपन से नीरा हत्प्रभ हो गयी उसे लगा अचानक उसकी आवाज़ जैसे कहीं खो सी गयी है । मस्तिष्क में सन्नाटा छा गया । प्रश्न के प्रत्युत्तर में वास्तव में उसे सोचना पड़ गया कि वह यहाँ क्यों आयी है । यत्न करने पर विचारों का सूत्र पकड़ में आया । स्वर के कम्पन पर किसी तरह नियंत्रण कर उसने धीरे से कहा ,
” नमस्ते आण्टीजी! मैं सौम्या भाभी से मिलने आई हूँ । वे घर पर हैं क्या ? “
“ सौम्या भाभी ..! कहाँ से आयी हो ? अच्छा-अच्छा तुम क्या मथुरा से आई हो ? आओ अन्दर आओ । घर पर ही हैं तुम्हारी सौम्या भाभी । बैठो बुलाती हूँ अभी । “
’तुम्हारी सौम्या भाभी ‘ इस तरह की व्यंगोक्ति का कोई औचित्य और प्रयोजन नीरा की समझ में नहीं आया । भाषा में कोई दोष नहीं था लेकिन मात्र स्वरों के उतार चढ़ाव से कैसे किसी को घायल किया जा सकता है इस कला में वे भलिभाँति निष्णात लगीं । नीरा सहसा बचैन हो उठी । उसे यहाँ नहीं आना चाहिये था लेकिन सौम्या भाभी से मिलने की उत्कण्ठा और अपने नये घर परिवार में उनको रचा बसा देखने का मोह् उसे यहाँ तक खींच लाया । प्रौढ़ महिला की तीक्ष्ण दृष्टि और वाणी की चोट से असहज हो सहमते हुए नीरा ने कमरे में प्रवेश किया । सौम्या की सास से नीरा का यह प्रथम परिचय था ।
( क्रमश: )
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Wednesday, December 16, 2009
Tuesday, December 15, 2009
आशा
जीवन की दुर्गमता मैंने जानी है ,
अपनों की दुर्जनता भी पहचानी है ,
अधरों के उच्छ्वास बहुत कह जाते हैं ,
निज मन की दुर्बलता मैंने मानी है ।
पर साथ तेरा पा अनुभव जब विपरीत हुए
मौन अधर ने खुलना चाहा तेरे लिये ।
टूट गये विश्वास , आस्था की माला ,
जला गयी संसार द्वेष की इक ज्वाला ,
जीवन के सब रंग हुए बेरंग , बचा
दुख, दर्द, घृणा, अवसाद, व्यथा का रंग काला ,
ऐसे में जब घायल तन को तूने छुआ
बन्द पलक ने खुलना चाहा तेरे लिये ।
जली शाख पर कली एक मुस्काई है ,
दूर तेरे आँचल की खुशबू आयी है ,
कहीं क्षितिज पर सूरज कोई चमका है ,
कहीं अंधेरा चीर रोशनी आयी है ,
भावों का उन्माद बहक कर उमड़ा है
गीत हृदय ने रचना चाहा तेरे लिये ।
साधना वैद
अपनों की दुर्जनता भी पहचानी है ,
अधरों के उच्छ्वास बहुत कह जाते हैं ,
निज मन की दुर्बलता मैंने मानी है ।
पर साथ तेरा पा अनुभव जब विपरीत हुए
मौन अधर ने खुलना चाहा तेरे लिये ।
टूट गये विश्वास , आस्था की माला ,
जला गयी संसार द्वेष की इक ज्वाला ,
जीवन के सब रंग हुए बेरंग , बचा
दुख, दर्द, घृणा, अवसाद, व्यथा का रंग काला ,
ऐसे में जब घायल तन को तूने छुआ
बन्द पलक ने खुलना चाहा तेरे लिये ।
जली शाख पर कली एक मुस्काई है ,
दूर तेरे आँचल की खुशबू आयी है ,
कहीं क्षितिज पर सूरज कोई चमका है ,
कहीं अंधेरा चीर रोशनी आयी है ,
भावों का उन्माद बहक कर उमड़ा है
गीत हृदय ने रचना चाहा तेरे लिये ।
साधना वैद
Thursday, December 10, 2009
तुम्हें आना ही होगा
ओ मनमोहन !
द्वापर के उस कालखण्ड से बाहर आओ
कलयुग के इस मानव वन में
भूले भटके क्लांत पथिक को राह दिखाओ ।
ओ मुरलीधर !
अधिकारों के प्रश्न खड़े हैं
काम बन्द है , सन्नाटा है
ऐसे नीरव मौन पलों में
बंद मिलों के सारे यंत्रों को थर्रा दे
ऐसी प्रेरक मंजुल मधुर बाँसुरी बजाओ ।
ओ नटनागर !
यमुना तट पर महारास के रासरचैया
कलयुग के इस थके रास को भी तो देखो
आज सुदामा अवश निरंतर नाच रहा है
भग्न ताल पर गिरते पड़ते बाल सखा को
निज बाहों का सम्बल देकर प्राण बचाओ ।
ओ नंदलाला !
उस युग में ग्वालों संग कौतुक बहुत रचाये
इस युग के बालों की भी थोड़ी तो सुध लो
बोझा ढोते और समय से पूर्व बुढ़ाते
भूखे प्यासे इन बच्चों को
माखन रोटी दे इनका बचपन लौटाओ ।
ओ गिरिधारी !
दुश्चिंताओं की निर्दय घनघोर वृष्टि में
आज आदमी गले-गले तक डूब रहा है
तब भी गिरिधर तुमने सबकी रक्षा की थी
अब भी तुम छिंगुली पर पर्वत धारण कर लो
सुख के सूरज की किरणों से जग चमकाओ ।
पार्थसारथी कृष्णकन्हैया !
उस अर्जुन की दुविधा तुमने खूब मिटाई
आज करोड़ों अर्जुन दुविधाग्रस्त खड़े हैं
इनकी पीड़ा से निस्पृह तुम कहाँ छिपे हो ?
आज तुम्हें इस तरह तटस्थ ना रहने दूँगी
रुक्मणी के आँचल में यूँ छिपने ना दूँगी
यह लीला जो रची तुम्हीं ने तुम ही जानो
इनके दुख का कारण भी तुम ही हो मानो
इनकी रक्षा हेतु तुम्हें आना ही होगा
गीता का संदेश इन्हें सिखलाना होगा
निष्काम कर्म का पाठ इन्हें भी आज पढ़ा दो
धर्म अधर्म की शिक्षा देकर ज्ञान बढ़ा दो
कृष्णा ज्ञान सुधा बरसा कर सावन कर दो
अपनी करुणा से तुम सबको पावन कर दो ।
साधना वैद
द्वापर के उस कालखण्ड से बाहर आओ
कलयुग के इस मानव वन में
भूले भटके क्लांत पथिक को राह दिखाओ ।
ओ मुरलीधर !
अधिकारों के प्रश्न खड़े हैं
काम बन्द है , सन्नाटा है
ऐसे नीरव मौन पलों में
बंद मिलों के सारे यंत्रों को थर्रा दे
ऐसी प्रेरक मंजुल मधुर बाँसुरी बजाओ ।
ओ नटनागर !
यमुना तट पर महारास के रासरचैया
कलयुग के इस थके रास को भी तो देखो
आज सुदामा अवश निरंतर नाच रहा है
भग्न ताल पर गिरते पड़ते बाल सखा को
निज बाहों का सम्बल देकर प्राण बचाओ ।
ओ नंदलाला !
उस युग में ग्वालों संग कौतुक बहुत रचाये
इस युग के बालों की भी थोड़ी तो सुध लो
बोझा ढोते और समय से पूर्व बुढ़ाते
भूखे प्यासे इन बच्चों को
माखन रोटी दे इनका बचपन लौटाओ ।
ओ गिरिधारी !
दुश्चिंताओं की निर्दय घनघोर वृष्टि में
आज आदमी गले-गले तक डूब रहा है
तब भी गिरिधर तुमने सबकी रक्षा की थी
अब भी तुम छिंगुली पर पर्वत धारण कर लो
सुख के सूरज की किरणों से जग चमकाओ ।
पार्थसारथी कृष्णकन्हैया !
उस अर्जुन की दुविधा तुमने खूब मिटाई
आज करोड़ों अर्जुन दुविधाग्रस्त खड़े हैं
इनकी पीड़ा से निस्पृह तुम कहाँ छिपे हो ?
आज तुम्हें इस तरह तटस्थ ना रहने दूँगी
रुक्मणी के आँचल में यूँ छिपने ना दूँगी
यह लीला जो रची तुम्हीं ने तुम ही जानो
इनके दुख का कारण भी तुम ही हो मानो
इनकी रक्षा हेतु तुम्हें आना ही होगा
गीता का संदेश इन्हें सिखलाना होगा
निष्काम कर्म का पाठ इन्हें भी आज पढ़ा दो
धर्म अधर्म की शिक्षा देकर ज्ञान बढ़ा दो
कृष्णा ज्ञान सुधा बरसा कर सावन कर दो
अपनी करुणा से तुम सबको पावन कर दो ।
साधना वैद
Wednesday, December 9, 2009
न दिल में ज़ख्म न आँखों में ख्वाब की किरचें
न दिल में ज़ख्म न आँखों में ख्वाब की किरचें
फिर किस गुमान पे इतने दीवान लिख डाले
तमाम उम्र जब इस दर्द को जिया मैने
तब कहीं जाके ये छोटी सी ग़ज़ल लिखी है ।
साधना वैद
फिर किस गुमान पे इतने दीवान लिख डाले
तमाम उम्र जब इस दर्द को जिया मैने
तब कहीं जाके ये छोटी सी ग़ज़ल लिखी है ।
साधना वैद
Saturday, December 5, 2009
मिड डे मील और जाँच के आदेश
आजकल अखबारों में खराब मिड डे मील का मामला सुर्खियों से छाया हुआ है । खराब, बासी, दूषित, कंकड़युक्त और दुर्गंधपूर्ण खाने की अंतहीन शिकायतों के साथ अभिभावकों और विद्यार्थियों की प्रतिक्रियाएं भी विचारणीय हैं । आज 5 दिसम्बर 2009 के दैनिक जागरण में पृष्ठ 2 पर एक छात्र का पत्र पढ़ने योग्य है । समाचार पत्र की लिंक दे रही हूँ
www.jagran.com
लेकिन पाठकों की सुविधा के लिये मैं यहाँ पर इस पत्र को उद्धृत करना चाहूँगी ।
“मैडम, पुरानी शिकायतें दिखवा लें
बीएसए मैडम. यह् पत्र लिखने वाला एक परिषदीय स्कूल का छोटा सा छात्र है । मैडम हम मिड डे मील में कैसा खाना खाते हैं, यह आपको जागरण ( अखबार )से पता चल ही गया होगा । मुझे भी पता चला है कि आपने मामले की एक रिपोर्ट तलब की है । परंतु छोटा होने पर भी मैं एक सवाल उठा रहा हूँ कि जाँच के तो अक्सर आदेश हो जाते हैं, रिपोर्ट माँग ली जाती है परंतु आखिर कार्यवाही कितने मामलों में होती है ? आपकी नेकनीयती पर हमें बिल्कुल संदेह नहीं परंतु यदि कार्यवाही करना चाहती हैं तो पूर्व में आई शिकायतों की फाइल शनिवार को ही लाल फीते से बाहर निकलवा लें । इसके बाद एक तरफ से कार्यवाही कर दें । हाँ, भोजन की और खराब क्वालिटी में कितना सुधार हुआ यह फिर देखने के लिये किसी भी दिन शहरी और देहात क्षेत्र के किसी भी स्कूल में निरीक्षण फिर कर लें । बच्चे आपके बड़े आभारी होंगे । “ उपरोक्त पत्र मिड डे मील की योजनाओं और उनके कार्यान्वयन की प्रक्रिया की त्रुटियों की ओर बरबस ही सबका ध्यान आकृष्ट करता है । क्या जाँच के आदेश देकर अधिकारी अपना पल्ला झाड़ सकते हैं ? क्या ऐसी शिकायतें पहली बार आयी हैं ? अगर पहले भी आयी हैं तो उन पर कब और क्या कार्यवाही हुई क्या जनता को, जिनमें बच्चे व उनके अभिभावक भी शामिल हैं, इस बारे में जानकारी देने की कोई ज़रूरत नहीं समझी जाती है ? आखिर कब तक ये भ्रष्ट नेता और अधिकारी आम जनता के स्वास्थ्य और उनकी भावनाओं के साथ खिलवाड़ करते रहेंगे ? जाँच के आदेश देने का मतलब है कि दोषी व्यक्तियों को राहत दे दी जाये और उन्हें अपने कुकृत्यों पर पर्दा डालने और लीपापोती करने के लिये समय दे दिया जाये ताकि वे सारे सबूत मिटा सकें और अपनी गर्दन बचा सकें । जाँच का ऐसा ढोंग करने का औचित्य क्या है ?
इस बात पर विचार करने की बहुत आवश्यक्ता है कि बच्चों को गरम भोजन ही देने की क्या ज़रूरत है ? यदि आप लोग भूले नहीं होंगे तो दक्षिण भारत के एक स्कूल में बच्चों के लिये खाना बनाते वक्त भयंकर आग लग गयी थी जिसमें कई बच्चों को अपनी जान से हाथ धोना पड़ गया था । ऐसी विरली दुर्घटनाओं को छोड़ भी दिया जाये तो गरम खाने के नाम पर जिस तरह का घटिया खाना वर्तमान में बच्चों को दिया जा रहा है क्या वह उचित है ? कंकड़ और कीड़ेयुक्त दुर्गंधपूर्ण दलिया और दूध की जगह पानी में पकाई गयी खीर देना क्या बच्चों के स्वास्थ्य के साथ खिलवाड़ करना नहीं है ?
गरम भोजन के स्थान पर बच्चों को अच्छे स्तर का अधिक कैलोरीयुक्त पैक्ड खाना क्यों नहीं दिया जाता जिनमें उस पैकेट क़े खाद्य पदार्थ के बारे में सभी जानकारी उपलब्ध होती है ? ऐसे पैकेट्स के वितरण पर कोई सवाल नहीं उठेंगे और उन्हें बाँटने में भी सुविधा होगी । अच्छे स्तर के बिस्किट्स, पाउडर मिल्क के पाउच , चकली और चिक्की इत्यादि के पैकेट्स इसमें शुमार किये जा सकते हैं । इन पदार्थों की बेंच लाइफ भी अधिक होती है तो इनका भंडारण भी आसानी से किया जा सकता है और स्कूलों में रसोई बनाने के ताम झाम से भी मुक्ति मिल सकती है । यदि अच्छी कम्पनियों से सम्पर्क किया जायेगा तो वे बच्चों के लिये सब्सीडाइज़्ड दामों पर छोटे पैक़ेट्स में अपने यहाँ के उत्पाद अवश्य उपलब्ध कराने में सहयोग करेंगे और बच्चे भी प्रसन्नतापूर्वक इनका आनंद उठायेंगे । बच्चे हमारे देश का भविष्य हैं और दुर्बल कंधों पर हम कितना भार डाल सकते हैं कभी यह भी सोचा है आपने ?
साधना वैद
www.jagran.com
लेकिन पाठकों की सुविधा के लिये मैं यहाँ पर इस पत्र को उद्धृत करना चाहूँगी ।
“मैडम, पुरानी शिकायतें दिखवा लें
बीएसए मैडम. यह् पत्र लिखने वाला एक परिषदीय स्कूल का छोटा सा छात्र है । मैडम हम मिड डे मील में कैसा खाना खाते हैं, यह आपको जागरण ( अखबार )से पता चल ही गया होगा । मुझे भी पता चला है कि आपने मामले की एक रिपोर्ट तलब की है । परंतु छोटा होने पर भी मैं एक सवाल उठा रहा हूँ कि जाँच के तो अक्सर आदेश हो जाते हैं, रिपोर्ट माँग ली जाती है परंतु आखिर कार्यवाही कितने मामलों में होती है ? आपकी नेकनीयती पर हमें बिल्कुल संदेह नहीं परंतु यदि कार्यवाही करना चाहती हैं तो पूर्व में आई शिकायतों की फाइल शनिवार को ही लाल फीते से बाहर निकलवा लें । इसके बाद एक तरफ से कार्यवाही कर दें । हाँ, भोजन की और खराब क्वालिटी में कितना सुधार हुआ यह फिर देखने के लिये किसी भी दिन शहरी और देहात क्षेत्र के किसी भी स्कूल में निरीक्षण फिर कर लें । बच्चे आपके बड़े आभारी होंगे । “ उपरोक्त पत्र मिड डे मील की योजनाओं और उनके कार्यान्वयन की प्रक्रिया की त्रुटियों की ओर बरबस ही सबका ध्यान आकृष्ट करता है । क्या जाँच के आदेश देकर अधिकारी अपना पल्ला झाड़ सकते हैं ? क्या ऐसी शिकायतें पहली बार आयी हैं ? अगर पहले भी आयी हैं तो उन पर कब और क्या कार्यवाही हुई क्या जनता को, जिनमें बच्चे व उनके अभिभावक भी शामिल हैं, इस बारे में जानकारी देने की कोई ज़रूरत नहीं समझी जाती है ? आखिर कब तक ये भ्रष्ट नेता और अधिकारी आम जनता के स्वास्थ्य और उनकी भावनाओं के साथ खिलवाड़ करते रहेंगे ? जाँच के आदेश देने का मतलब है कि दोषी व्यक्तियों को राहत दे दी जाये और उन्हें अपने कुकृत्यों पर पर्दा डालने और लीपापोती करने के लिये समय दे दिया जाये ताकि वे सारे सबूत मिटा सकें और अपनी गर्दन बचा सकें । जाँच का ऐसा ढोंग करने का औचित्य क्या है ?
इस बात पर विचार करने की बहुत आवश्यक्ता है कि बच्चों को गरम भोजन ही देने की क्या ज़रूरत है ? यदि आप लोग भूले नहीं होंगे तो दक्षिण भारत के एक स्कूल में बच्चों के लिये खाना बनाते वक्त भयंकर आग लग गयी थी जिसमें कई बच्चों को अपनी जान से हाथ धोना पड़ गया था । ऐसी विरली दुर्घटनाओं को छोड़ भी दिया जाये तो गरम खाने के नाम पर जिस तरह का घटिया खाना वर्तमान में बच्चों को दिया जा रहा है क्या वह उचित है ? कंकड़ और कीड़ेयुक्त दुर्गंधपूर्ण दलिया और दूध की जगह पानी में पकाई गयी खीर देना क्या बच्चों के स्वास्थ्य के साथ खिलवाड़ करना नहीं है ?
गरम भोजन के स्थान पर बच्चों को अच्छे स्तर का अधिक कैलोरीयुक्त पैक्ड खाना क्यों नहीं दिया जाता जिनमें उस पैकेट क़े खाद्य पदार्थ के बारे में सभी जानकारी उपलब्ध होती है ? ऐसे पैकेट्स के वितरण पर कोई सवाल नहीं उठेंगे और उन्हें बाँटने में भी सुविधा होगी । अच्छे स्तर के बिस्किट्स, पाउडर मिल्क के पाउच , चकली और चिक्की इत्यादि के पैकेट्स इसमें शुमार किये जा सकते हैं । इन पदार्थों की बेंच लाइफ भी अधिक होती है तो इनका भंडारण भी आसानी से किया जा सकता है और स्कूलों में रसोई बनाने के ताम झाम से भी मुक्ति मिल सकती है । यदि अच्छी कम्पनियों से सम्पर्क किया जायेगा तो वे बच्चों के लिये सब्सीडाइज़्ड दामों पर छोटे पैक़ेट्स में अपने यहाँ के उत्पाद अवश्य उपलब्ध कराने में सहयोग करेंगे और बच्चे भी प्रसन्नतापूर्वक इनका आनंद उठायेंगे । बच्चे हमारे देश का भविष्य हैं और दुर्बल कंधों पर हम कितना भार डाल सकते हैं कभी यह भी सोचा है आपने ?
साधना वैद
Friday, December 4, 2009
कुछ आपबीती कुछ जगबीती ( एक कविता )
पुरुष प्रधान भारतीय समाज में नारी को किस तरह से विषम परिस्थितियों में अपने अस्तित्व के लिये संघर्ष करना पड़ा है । रूढिवादी रस्मों रिवाज़ और परम्पराओं की बेड़ियों से जकड़े होने के बावज़ूद भी जीवनधारा के विरुद्ध प्रवाह में तैरते हुए किस तरह से उसने आधुनिक समाज में अपनी उपस्थिति दर्ज कराई है , अपनी पहचान पुख्ता की है यह कविता स्त्री की हर हाल में जीत हासिल करने की उसी अदम्य जिजिविषा को अभिव्यक्ति देने की छोटी सी कोशिश है ।
तुम क्या जानो
रसोई से बैठक तक ,
घर से स्कूल तक ,
रामायण से अखबार तक
मैने कितनी आलोचनाओं का ज़हर पिया है
तुम क्या जानो !
करछुल से कलम तक ,
बुहारी से ब्रश तक ,
दहलीज से दफ्तर तक
मैंने कितने तपते रेगिस्तानों को पार किया है
तुम क्या जानो !
मेंहदी के बूटों से मकानों के नक्शों तक ,
रोटी पर घूमते बेलन से कम्प्यूटर के बटन तक ,
बच्चों के गड़ूलों से हवाई जहाज़ की कॉकपिट तक
मैंने कितनी चुनौतियों का सामना किया है
तुम क्या जानो !
जच्चा सोहर से जाज़ तक ,
बन्ना बन्नी से पॉप तक ,
कत्थक से रॉक तक
मैंने कितनी वर्जनाओं के थपेड़ों को झेला है
तुम क्या जानो !
सड़ी गली परम्पराओं को तोड़ने के लिये ,
बेजान रस्मों को उखाड़ फेंकने के लिये ,
निषेधाज्ञा में तनी रूढ़ियों की उँगली मरोड़ने के लिये
मैने कितने सुलगते ज्वालामुखियों की तपिश को बर्दाश्त किया है
तुम क्या जानो !
आज चुनौतियों की उस आँच में तप कर
प्रतियोगिताओं की कसौटी पर घिस कर निखर कर
कंचन सी, कुंदन सी अपरूप दपदपाती
मैं खड़ी हूँ तुम्हारे सामने
अजेय अपराजेय दिक्विजयी !
मुझे इस रूप में भी तुम जान लो
पहचान लो !
साधना वैद
तुम क्या जानो
रसोई से बैठक तक ,
घर से स्कूल तक ,
रामायण से अखबार तक
मैने कितनी आलोचनाओं का ज़हर पिया है
तुम क्या जानो !
करछुल से कलम तक ,
बुहारी से ब्रश तक ,
दहलीज से दफ्तर तक
मैंने कितने तपते रेगिस्तानों को पार किया है
तुम क्या जानो !
मेंहदी के बूटों से मकानों के नक्शों तक ,
रोटी पर घूमते बेलन से कम्प्यूटर के बटन तक ,
बच्चों के गड़ूलों से हवाई जहाज़ की कॉकपिट तक
मैंने कितनी चुनौतियों का सामना किया है
तुम क्या जानो !
जच्चा सोहर से जाज़ तक ,
बन्ना बन्नी से पॉप तक ,
कत्थक से रॉक तक
मैंने कितनी वर्जनाओं के थपेड़ों को झेला है
तुम क्या जानो !
सड़ी गली परम्पराओं को तोड़ने के लिये ,
बेजान रस्मों को उखाड़ फेंकने के लिये ,
निषेधाज्ञा में तनी रूढ़ियों की उँगली मरोड़ने के लिये
मैने कितने सुलगते ज्वालामुखियों की तपिश को बर्दाश्त किया है
तुम क्या जानो !
आज चुनौतियों की उस आँच में तप कर
प्रतियोगिताओं की कसौटी पर घिस कर निखर कर
कंचन सी, कुंदन सी अपरूप दपदपाती
मैं खड़ी हूँ तुम्हारे सामने
अजेय अपराजेय दिक्विजयी !
मुझे इस रूप में भी तुम जान लो
पहचान लो !
साधना वैद
Thursday, December 3, 2009
तुमसे कुछ भी नहीं चाहिये ।
नयनों ने बह-बह कर कितनी सींची धरती ,
आहों ने ऊपर उठ कितना जल बरसाया ,
भावों ने मथ अंतर कितने खोदे कूँए ,
क्योंकर इसका लेखा जोखा तुमको दूँ मैं ।
यह दौलत तो मेरी, बस केवल मेरी है
मुझे तुम्हारी साझेदारी नहीं चाहिये ।
मैंने टूटे इंद्रधनुष गिरते देखे हैं ,
सपनों की गलियों में दुख पलते देखे हैं ,
तारों के संग उड़ते अगणित पंछी के दल
पंखहीन नभ से भू पर गिरते देखे हैं ।
मैंने अपना लक्ष्य और पथ ढूँढ लिया है
मुझे तुम्हारी दूरदर्शिता नहीं चाहिये ।
तुमने कब मेरे सच का विश्वास किया है,
मेरे हर संवेदन का परिहास किया है ,
मेरी आँखों ने जो देखा जाना परखा
तुमने तो केवल उसका उपहास किया है ।
अपने सच की उँगली थाम मुझे जीने दो
मुझे तुम्हारी सत्यधर्मिता नहीं चाहिये ।
मेरा सच वो सच है जिसको जग जीता है ,
सत्य तुम्हारा वैभव के पीछे चलता है ,
मेरा सपना है सबकी आँखों का सपना ,
स्वप्न तुम्हारा धन दौलत तुमको फलता है ।
देखूँ निज प्रतिबिम्ब स्वेद के दर्पण में मैं
मुझे तुम्हारी दुनियादारी नहीं चाहिये ।
साधना वैद
आहों ने ऊपर उठ कितना जल बरसाया ,
भावों ने मथ अंतर कितने खोदे कूँए ,
क्योंकर इसका लेखा जोखा तुमको दूँ मैं ।
यह दौलत तो मेरी, बस केवल मेरी है
मुझे तुम्हारी साझेदारी नहीं चाहिये ।
मैंने टूटे इंद्रधनुष गिरते देखे हैं ,
सपनों की गलियों में दुख पलते देखे हैं ,
तारों के संग उड़ते अगणित पंछी के दल
पंखहीन नभ से भू पर गिरते देखे हैं ।
मैंने अपना लक्ष्य और पथ ढूँढ लिया है
मुझे तुम्हारी दूरदर्शिता नहीं चाहिये ।
तुमने कब मेरे सच का विश्वास किया है,
मेरे हर संवेदन का परिहास किया है ,
मेरी आँखों ने जो देखा जाना परखा
तुमने तो केवल उसका उपहास किया है ।
अपने सच की उँगली थाम मुझे जीने दो
मुझे तुम्हारी सत्यधर्मिता नहीं चाहिये ।
मेरा सच वो सच है जिसको जग जीता है ,
सत्य तुम्हारा वैभव के पीछे चलता है ,
मेरा सपना है सबकी आँखों का सपना ,
स्वप्न तुम्हारा धन दौलत तुमको फलता है ।
देखूँ निज प्रतिबिम्ब स्वेद के दर्पण में मैं
मुझे तुम्हारी दुनियादारी नहीं चाहिये ।
साधना वैद
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