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Monday, July 18, 2011

कहाँ हो तुम अब भोलेनाथ

आज सावन का पहला सोमवार है ! सभी पाठकों को श्रावण मास की हार्दिक शुभकामनायें !


कहाँ हो तुम अब भोलेनाथ !
असुरों ने धरती को है आक्रान्त किया ,
सीधे सादे जन मन को दिग्भ्रांत किया ,
कहाँ छिपा कर रखा है डमरू अपना ,
कब आओगे तज कर सिंहासन अपना !
लगी है तुमसे सारी आस ,
कहाँ हो तुम अब भोले नाथ !
मस्तक पर शोभित है शशि शेखर प्यारा,
पावन गंगा को निज केशों में धारा ,
सर्प विषैले हिय पर शोभा पाते हैं ,
भूत पिशाच चरण रज पाने आते हैं !
कहाँ है गण चर सारे आज !
कहाँ हो तुम अब भोले नाथ !
धरती पर आई कैसी विपदा भारी ,
दुष्टों की करनी से मानवता हारी ,
लेकर अपनी फ़ौज ज़रा नीचे आओ ,
खोलो तीजा नेत्र, खलों को धमकाओ !
उठाओ अपना भाला आज ,
कहाँ हो तुम अब भोलेनाथ !
धरती को असुरों से खाली करना है ,
भक्तों के दुःख औ पीड़ा को हरना है ,
ताण्डव अपना इस धरती पर कर जाओ ,
काम, क्रोध, मद, लोभ भस्म सब कर जाओ !
तुम्हारी यहाँ ज़रूरत आज ,
कहाँ हो तुम अब भोलेनाथ !
साधना वैद

Wednesday, July 13, 2011

सम्भल के रहना अपने घर में ----

मुम्बई में हुए बम धमाकों ने आज फिर देश को दहला दिया है ! व्यस्तता अधिक होने की वजह से कुछ नया नहीं दे पा रही हूँ इन दिनों लेकिन आज अपना एक पुराना आलेख मैं पुन: पोस्ट कर रही हूँ क्योंकि यह आज की इस विचलित कर देने वाली दुर्घटना के सन्दर्भ में भी कदाचित उतना ही प्रासंगिक है !

सम्भल के रहना अपने घर में ----

अपने बचपन की यादों के साथ देश प्रेम और देश भक्ति के जो चन्द गाने आज भी ज़ेहेन में गूँजते हैं उनके सम्मोहन से इतने वर्षों बाद आज भी मुक्त हो पाना असम्भव सा लगता है । संगीत के सूक्ष्म गुण दोषों के पारखी महान संगीतकारों के लिये हो सकता है ये गीत अति सामान्य और साधारण गीतों की श्रेणी में शुमार किये जायें लेकिन बालमन पर इनका प्रभाव कितना स्थायी और अमिट होता था यह मुझसे बढ़ कर और कौन जान सकता है । “ दे दी हमें आज़ादी बिना खड्ग बिना ढाल “, “ आओ बच्चों तुम्हें दिखायें झाँकी हिन्दुस्तान की “ ,“ सारे जहाँ से अच्छा हिन्दोस्ताँ हमारा “ , जहाँ डाल डाल पर सोने की चिड़ियाँ करती हैं बसेरा “ ऐसे ही और भी ना जाने कितने गीत थे जिनको सुनते ही मन गर्व से भर उठता था और आँखे भावावेश से नम हो जाया करती थीं । उन्ही दिनों एक गीत और बहुत लोकप्रिय हुआ था जो वर्तमान समय में जितना सामयिक और प्रासंगिक है उतना शायद उन दिनों में भी नहीं होगा । वह गीत है _ “ कहनी है एक बात हमें इस देश के पहरेदारों से सम्भल के रहना अपने घर में छिपे हुए ग़द्दारों से “ । इस गाने की सीख को हम क्यों भुला बैठे ? यदि हमने इस बात पर ग़ौर किया होता तो आज हमारे देश को ये छिपे हुए ग़द्दार इस तरह से खोखला नहीं कर पाते ।
समाचार पत्र और टी वी के सभी न्यूज़ चैनल आतंकवादियों के नये-नये कारनामों और भारत के समाज और सरज़मीं पर उनकी गहरी जड़ों के वर्णन से रंगे रहते हैं । लेकिन क्या कभी कोई इस पर विचार करता है कि कैसे ये आतंकवादी ठीक हमारी नाक के नीचे इतने खतरनाक कारनामों को अंजाम दे लेते हैं और हम बेबस लाचार से इनके ज़ुल्म का शिकार हो जाते हैं और प्रतिकार में कुछ भी नहीं कर पाते । इसकी सिर्फ एक वजह है कि यहाँ चप्पे-चप्पे पर उनके मददगार बैठे हुए हैं जो उनकी हर तरह से हौसला अफ़ज़ाई कर रहे हैं , उनकी ज़रूरतें पूरी कर रहे हैं और अपने देश और देशवासियों के साथ ग़द्दारी कर रहे हैं । कोई उनको नकली पासपोर्ट बनाने में मदद कर रहा है, तो कोई उनको सैन्य गतिविधियों और संवेदनशील ठिकानों की जानकारी उपलब्ध करा रहा है, तो कोई उन्हें अपने घर में शरण देकर उनका आतिथ्य सत्कार कर रहा है और उन्हें अपने नापाक इरादों को पूरा करने देने के लिये अवसर प्रदान कर रहा है तो कोई उन्हें उनकी आवश्यक्ता के अनुसार हथियार और विस्फोटकों की आपूर्ति कर रहा है । जैसे कि वे कोई आतंकवादी नहीं हमारे कोई अति विशिष्ट सम्मानित अतिथि हैं । और आश्चर्य की बात यह है कि ऐसे “ मेहमान नवाज़ “ समाज के निचले वर्ग में ही नहीं मिलते ये तो समाज के हर वर्ग में व्याप्त हैं । नेता हों या अभिनेता , सैनिक अधिकारी हों या प्रशासनिक अधिकारी , प्राध्यापक हों या विद्यार्थी , धर्मगुरू हों या वैज्ञानिक , कम्प्यूटर विशेषज्ञ हों या वकील , सेना या पुलिस के जवान हों या ढाबों और चाय की दुकानों पर काम करने वाले ग़रीब तबके के नादान कर्मचारी जिनमें दुर्भाग्य से अबोध बच्चे भी शामिल हैं , सब अपने छोटे-छोटे व्यक्तिगत स्वार्थों की पूर्ति के लिये अवसर पाते ही देश के साथ ग़द्दारी करने से पीछे नहीं हटते । फिर चाहे कितने ही निर्दोष लोगों की जान चली जाये या देश की फ़िज़ा में कितना ही ज़हर क्यों ना घुल जाये । इनके अंदर का भारतवासी मर चुका है । ये सिर्फ लालच का एक पुतला भर हैं जिन्हें ना तो देश से प्यार है ना देशवासियों से । किसी को पैसों का लालच है तो किसीको धर्म के नाम पर गुमराह किया जाता है । अपनी अंतरात्मा की आवाज़ को दबा ये अपने विदेशी आकाओं की बीन पर नाचने के लिये मजबूर हो जाते हैं ।
विदेशों से आये आतंकवादियों की खोजबीन में जितनी कसरत कवायद की जाती है उसकी आधी भी यदि घर के भेदी इन “ विभीषणों “ को पहचानने में और उन पर कड़ी कार्यवाही करने में लगाई जाये तो आधी से ज़्यादह समस्या खुद ही समाप्त हो जायेगी और आतंकवादियों की जड़ें ढीली हो जायेंगी क्योंकि इनकी मदद के बिना बाहर से आये विदेशी आतंकवादी आसानी से घुसपैठ कर ही नहीं सकते । जब तक स्थानीय लोगों का साथ और सहयोग इन दुर्दांत आतंकवादियों को मिलता रहेगा इनके हौसले बुलन्द रहेंगे और मुम्बई, दिल्ली, गुजरात और हैदराबाद जैसी भीषण काण्ड घटित होते रहेंगे । अनेकों निर्दोष लोगों की बलि चढ़ती रहेगी और अनगिनत घर परिवार उजड़ते रहेंगे ।
सवाल यह उठता है कि देश का कामकाज चलाने के लिये और लोगों की सुरक्षा के लिये जिन ज़िम्मेदार व्यक्तियों को यह काम सौंपा है यदि वे ही अपने कर्तव्यपालन से चूक जाते हैं या बेईमानी पर उतर आते हैं तो आम आदमी किसके पास जाये अपनी फरियाद लेकर ? ऐसी स्थिति में हमें स्वयम ही खुद को सबल , समर्थ और सक्षम करना होगा । मेरा सभी भारतवासियों से निवेदन है कि सजग रहिये, सतर्क रहिये, चौकन्ने रहिये अपनी आँखे और कान खुले रखिये, यदि कोई भी संदेहास्पद गतिविधि या व्यक्ति आपकी नज़र में आते हैं तो उसे अनदेखा मत करिये और अपने देश को ऐसे ग़द्दारों के हाथों खोखला होने से बचाइये । देश को तोड़ने वालों की कमी नहीं है । आज ज़रूरत है देश को जोड़ने वालों की । उसे एकता के सूत्र में पिरोने वालों की । आज अपने देश की पहरेदारी के लिये हमें खुद कमर कस कर तैयार रहना होगा और इन छिपे हुए ग़द्दारों से अपने देश को बचाना होगा । अपने कर्तव्य को पहचानिये और मातृभूमि के प्रति अपने ऋण को चुकाने से पीछे मत हटिये । अशेष शुभकामनाओं के साथ आप सभी को मेरा जय भारत ! जय हिन्दोस्तान !

साधना वैद

Saturday, July 9, 2011

मंदिर और उनके खजाने

मंदिरों से मिली धन दौलत को लेकर समाज में इन दिनों जो सुनामी आई हुई है वह निश्चित रूप से हर व्यक्ति की सोच को प्रभावित कर रही है ! कम से कम इस बात का तो संतोष होना ही चाहिये कि यह धन मंदिरों के कोषागारों में सुरक्षित है और अभी तक इसका कोई दुरुपयोग नहीं हुआ है ! यह संचित राशि उसी प्रकार की है जैसे गुल्लक में बच्चे थोड़ा थोड़ा धन इसलिए जमा करते हैं कि कभी काम आयेगा ! हम सब लोगों की इच्छा होती है कि कुछ धन इसलिए जमा करें कि आवश्यकता पड़ने पर हमारे आने वाली पीढ़ियों के काम यह आयेगा ! यह कोई भ्रष्टाचार के द्वारा, लूट या डकैती के द्वारा या गबन करके जमा किया हुआ धन नहीं है ! यह भोले भाले भक्तों की श्रद्धा, आस्था एवं समर्पण का प्रतिफल है !
आजकल इस धन के अधिग्रहण को लेकर बड़ी उथल पुथल मची हुई है ! इसे सरकार और प्रशासन के ऐसे मंत्रियों और अधिकारियों को, जो सौ रुपयों में से अस्सी रुपये अपनी जेब में डालते हैं, इस आशा से सौंप देना कि वे इसे समाज के कल्याण के कार्य में लगायेंगे नितांत मूर्खतापूर्ण कदम होगा ! मन्दिरों में संकलित एवं संग्रहित यह धन राशि इन मंदिरों के ट्रस्टियों की ईमानदारी एवं साफ़ नीयत की ओर संकेत करती है ! वरना इस दौलत के बारे में तो आम जनता को कोई जानकारी ही नहीं थी ! इसका इधर उधर हो जाना किसीको शायद पता भी नहीं चल पाता ! अनेकों ऐसे मंदिर भी हैं जिनके कोई ट्रस्ट ही नहीं हैं और वहाँ पर चढ़ा हुआ सारा चढावा उन मंदिरों के पुजारी और सेवादार आपस में बाँट लेते हैं ! ना तो मंदिरों का ही ठीक से रख रखाव होता है ना गरीबों को ही दान पुण्य होता है ! हाँ ऐसे मंदिरों के पण्डे पुजारी दिन दूनी रात चौगुनी अपनी संपत्ति का विस्तार करने में अवश्य लगे हुए हैं !
समाज हित में यही होगा कि जिन मंदिरों में अक्षुण्ण खजाने मिले हैं उनके ट्रस्टियों को ही इसे समाज कल्याण के लिये उपयुक्त योजनाएं बना कर निवेशित करने का अधिकार दिया जाना चाहिये ! इसके लिये समाज के हर वर्ग से और स्थान विशेष के प्रबुद्ध, निष्ठावान एवं समर्पित समाजसेवियों को जोड़ कर एक समिति का गठन किया जाये जो इस बात का सही आकलन कर सकें कि उस जगह के लोगों की क्या ज़रूरते एवं समस्याएं हैं और किस आवश्यकता की पूर्ति के लिये धन का प्रयोग होना चाहिये ! देश में जब इतना संकट है और आम आदमी मंहगाई की चक्की में पिस रहा है, सरकारी तंत्र उसे हर तरह से निचोड़ने में कोई कसर नहीं छोड़ रहा है तो उसीकी जेबों से निकला यह धन ऐसे आड़े वक्त में यदि उसे कुछ राहत दिला जाये तो उसमें हर्ज ही क्या है !
वैसे आप सभी से मात्र इतनी प्रार्थना है मंदिरों में भगवान की मूर्ति पर केवल फूल चढाएं पैसे नहीं ! भगवान आस्था और प्यार के भूखे हैं ! ना वे इस भोग को चखते हैं और ना ही यह धन उनके पास जाता है ! इसका फ़ायदा पण्डे पुजारी उठाते हैं ! मंदिरों के रख रखाव की जब आवश्यकता हो तब जनता से धन की माँग की जा सकती है ! और मुझे पूरा विश्वास है ईश्वर में आस्था रखने वाली हमारी जनता ऐसे समय में कभी भी अपना कदम पीछे नहीं हटायेगी !

साधना वैद

Tuesday, July 5, 2011

सचमुच तुम केवल पत्थर हो


सचमुच तुम केवल पत्थर हो !

इतनी सारी धन दौलत पर बैठे हो अधिकार किये ,
निर्धन जनता सहती जाती हर दुःख विपदा अधर सिये ,
कैसे सह लेते हो अपने भक्तों की इतनी पीड़ा ,
यह सब है निर्मम सच्चाई नहीं कोई कंदुक क्रीड़ा !
देख नहीं पाते यदि यह सब कैसे भक्तों के हितकर हो !
सचमुच तुम केवल पत्थर हो !

कैसे प्रतिनिधि भेजे तुमने भक्तों की सेवा करने ,
जो बन बैठे खुद ही 'भगवन', छोड़ा भक्तों को मरने ,
काम, क्रोध, मद, लोभ से जिनकी छूट न पायी कभी लगन ,
रहे देखते अविचल जग को, स्वयं रास में रहे मगन ,
क्या सचमुच तुम ऐसे ढोंगी साधू संतों के अनुचर हो !
सचमुच तुम केवल पत्थर हो !

सोने चाँदी के आसन पर सदा विराजे रहते तुम ,
हीरे, मोती, रत्न, नगों से सदा सुसज्जित रहते तुम ,
मनों भोग चढ़ता है निश दिन क्षुधित जनों के पैसों से ,
जिसे चखा ना तुमने कण भर जुटा भक्त की जेबों से ,
काला, श्वेत बहुत धन जाने, तुम बहुरंगी धन के घर हो !
सचमुच तुम केवल पत्थर हो !

बच्चों को भूखा रख दुखिया माँ मंदिर में अर्चन करती ,
विवश विकलता एक पिता की तेरी देहरी पर सिर धरती ,
क्यों दुःख नहीं बाँटते उनका, बोलो तुम किसका भय है ,
वार नहीं क्यों देते यह धन उर अंतर जो करुण, सदय है ,
लेकिन ऐसा तभी करोगे मन पर पीड़ा से कातर हो !
सचमुच तुम केवल पत्थर हो !


साधना वैद






Wednesday, June 29, 2011

ज़रूरी तो नहीं

हर जीत तुम्हारी हो ज़रूरी तो नहीं ,
हर हार हमारी हो ज़रूरी तो नहीं !

सच है तुम्हें सब मानते हैं रौनके महफ़िल ,
हर बात तुम्हारी हो ज़रूरी तो नहीं !

जो रात की तारीकियाँ लिख दीं हमारे नाम ,
हर सुबह पे भारी हों ज़रूरी तो नहीं !

बाँधो न कायदों की बंदिशों में तुम हमें ,
हर साँस तुम्हारी हो ज़रूरी तो नहीं !

तुम ख़्वाब में यूँ तो बसे ही रहते हो ,
नींदें भी तुम्हारी हों ज़रूरी तो नहीं !

जज़्बात ओ खयालात पर तो हावी हो ,
गज़लें भी तुम्हारी हों ज़रूरी तो नहीं !

दिल की ज़मीं पे गूँजते अल्फाजों की ,
तहरीर तुम्हारी हों ज़रूरी तो नहीं !

माना की हर एक खेल में माहिर बहुत हो तुम ,
हर मात हमारी हो ज़रूरी तो नहीं !


साधना वैद

Monday, June 27, 2011

अंगारे


कविवर पन्त जी की अत्यंत हृदयग्राही पंक्तियाँ -
"वियोगी होगा पहला कवि
आह से निकला होगा गान ,
उमड़ कर आँखों से चुपचाप
बही होगी कविता अनजान !"
आज के सन्दर्भों में शायद अपनी प्रासंगिकता खो रही हैं ! इसीसे प्रेरित हो इस रचना ने आकार लिया है !

अंगारे

हथेलियों पर रखे अंगार को मैंने

बड़े जतन से अपनी मुट्ठी में

बंद कर लिया है !

जलन से बेचैन अपने चहरे पर

बिखर आये पीड़ा के भावों को

सायास मुस्कराहट में

बदल लिया है !

अकथनीय दर्द से व्याकुल

कंठ से फूटती करुण चीत्कार को मैंने

भैरवी के कोमल स्वरों में ढाल

सुरीली रागिनी में

रूपांतरित कर लिया है !

इस चाहत के साथ कि

किसीकी भी नज़र

इस बाह्य आवरण को भेद कर

इन अंगारों पर ना पड़े,

मैंने अपनी सुकुमार भावनाओं की

राख तले उन्हें बड़े जतन से

ढँक दिया है !

ये अंगारे सदियों से

ना सिर्फ मेरी हथेलियों को वरन

मेरे उर, अंतर, आत्मा, चेतना

सभी को झुलसा रहे हैं और

सदियों से इस पीड़ा को मैं

दाँतों तले अपने अधरों को दबाये

चुपचाप झेल रही हूँ ,

क्योंकि आँखों से उमड़ी कविता पढ़ना

अब किसीको अच्छा नहीं लगता !


साधना वैद

चित्र गूगल से साभार _


Sunday, June 26, 2011

इन्हें भी सम्मान से जीने दें !


इसे सामाजिक न्याय व्यवस्था की विडम्बना कहा जाये या विद्रूप कि जिन वृद्धजनों के समाज और परिवार में सम्मान और स्थान के प्रति तमाम समाजसेवी संस्थायें और मानवाधिकार आयोग बडे सजग और सचेत रहने का दावा करते हैं और समय – समय उनके हित के प्रति पर अपनी चिंता और असंतोष का उद्घाटन भी करते रहते हैं उन्हींको पराश्रय और असम्मान की स्थितियों में जब ढकेला जाता है तब सब मौन साधे मूक दर्शक की भूमिका निभाते दिखाई देते हैं।
ऐसी धारणा है कि साठ वर्ष की अवस्था आने के बाद व्यक्ति की शारीरिक और मानसिक शक्तियाँ क्षीण हो जाती हैं और वह शारीरिक श्रम के लिये अक्षम हो जाता है और यदि वह प्रबन्धन के कार्य से जुड़ा है तो वह सही निर्णय ले पाने में असमर्थ हो जाता है इसीलिये उसे सेवा निवृत कर दिये जाने का प्रावधान है । अगर यह सच है तो संसद में बैठे वयोवृद्ध नेताओं की आयु तालिका पर कभी किसीने विचार क्यों नहीं किया ? उन पर कोई आयु सीमा क्यों लागू नहीं होती ? क़्या वे बढ़ती उम्र के साथ शरीर और मस्तिष्क पर होने वाले दुष्प्रभावों से परे हैं ? क़्या उनकी सही निर्णय लेने की क्षमता बढ़ती उम्र के साथ प्रभावित नहीं होती ? फिर किस विशेषाधिकार के तहत वे इतने विशाल देश के करोड़ों लोगों के भविष्य का न्यायोचित् निर्धारण अपनी जर्जर मानसिकता के साथ करने के लिये सक्षम माने जाते हैं ? य़दि उन्हें बढ़ती आयु के दुष्प्रभावों से कोई हानि नहीं होती तो अन्य लोगों के साथ यह भेदभाव क्यों किया जाता है ? अपवादों को छोड़ दिया जाये तो साठ वर्ष की अवस्था प्राप्त करने के बाद व्यक्ति अधिक अनुभवी, परिपक्व और गम्भीर हो जाता है और उसके निर्णय अधिक न्यायपूर्ण, तर्कसंगत और समझदारी से भरे होते हैं । ऐसी स्थिति में उसे उसके सभी अधिकारों और सम्मान से वंचित करके सेवा निवृत कर दिया जाता है जो सर्वथा अनुचित है ।
घर में उसकी स्थिति और भी शोचनीय हो जाती है । अचानक सभी अधिकारों से वंचित, शारीरिक, मानसिक और आर्थिक रूप से क्लांत वह चिड़चिड़ा हो उठता है । घर के किसी भी मामले में उसकी टीकाटिप्पणी को परिवार के अन्य सदस्य सहन नहीं कर पाते और वह एक अंनचाहे व्यक्ति की तरह घर के किसी एक कोने में उपेक्षा, अवहेलना, असम्मान और अपमान का जीवन जीने के लिये विवश हो जाता है । उसकी इस दयनीय दशा के लिये हमारी यह दोषपूर्ण व्यवस्था ही जिम्मेदार है । साठवाँ जन्मदिन मनाने के तुरंत बाद एक ही दिन में कैसे किसीकी क्षमताओं को शून्य करके आँका जा सकता है ?
वृद्ध जन भी सम्मान और स्वाभिमान के साथ पूर्णत: आत्मनिर्भर हों और उन्हें किसी तरह की बैसाखियों का सहारा ना लेना पड़े इसके लिये आवश्यक है कि वे आर्थिक रूप से भी सक्षम हों । इसके लिये ऐसे रोज़गार दफ्तर खोलने की आवश्यक्ता है जहाँ साठ वर्ष से ऊपर की अवस्था के लोगों के लिये रोज़गार की सुविधायें उपलब्ध करायी जा सकें । प्राइवेट कम्पनियों और फैक्ट्रियों में बुज़ुर्ग आवेदकों के लिये विशिष्ट नियुक्तियों की व्यवस्था का प्रावधान सुनिश्चित किया जाये । इस बात पर भी ध्यान देने की ज़रूरत है कि उनको उनकी क्षमताओं के अनुरूप ही काम सौपे जायें । आर्थिक रूप से सक्षम होने पर परिवार में भी बुज़ुर्गों को यथोचित सम्मान मिलेगा और उनकी समजिक स्थिति भी सुदृढ़ होगी ।
यह आज के समय की माँग है कि समाज में व्याप्त इन विसंगतियों की ओर प्रबुद्ध लोगों का ध्यान आकर्षित किया जाये और वृद्ध जनों के हित के लिये ठोस और कारगर कदम उठाये जायें । तभी एक स्वस्थ समाज की स्थापना का स्वप्न साकार हो सकेगा जहाँ कोई किसी का मोहताज नहीं होगा और सभी स्वाभिमान के साथ एक उपयोगी एवं सार्थक जीवन व्यतीत कर सकेंगे !

साधना वैद