आज सावन का पहला सोमवार है ! सभी पाठकों को श्रावण मास की हार्दिक शुभकामनायें !
कहाँ हो तुम अब भोलेनाथ !
असुरों ने धरती को है आक्रान्त किया ,
सीधे सादे जन मन को दिग्भ्रांत किया ,
कहाँ छिपा कर रखा है डमरू अपना ,
कब आओगे तज कर सिंहासन अपना !
लगी है तुमसे सारी आस ,
कहाँ हो तुम अब भोले नाथ !
मस्तक पर शोभित है शशि शेखर प्यारा,
पावन गंगा को निज केशों में धारा ,
सर्प विषैले हिय पर शोभा पाते हैं ,
भूत पिशाच चरण रज पाने आते हैं !
कहाँ है गण चर सारे आज !
कहाँ हो तुम अब भोले नाथ !
धरती पर आई कैसी विपदा भारी ,
दुष्टों की करनी से मानवता हारी ,
लेकर अपनी फ़ौज ज़रा नीचे आओ ,
खोलो तीजा नेत्र, खलों को धमकाओ !
उठाओ अपना भाला आज ,
कहाँ हो तुम अब भोलेनाथ !
धरती को असुरों से खाली करना है ,
भक्तों के दुःख औ पीड़ा को हरना है ,
ताण्डव अपना इस धरती पर कर जाओ ,
काम, क्रोध, मद, लोभ भस्म सब कर जाओ !
तुम्हारी यहाँ ज़रूरत आज ,
कहाँ हो तुम अब भोलेनाथ !
साधना वैद



