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Sunday, October 11, 2015

गोरक्षा – एक कठिन समस्या



गोरक्षा भारत में सदियों से एक संवेदनशील विषय रहा है ! देश के अलग-अलग राज्यों में इस मसले पर विभिन्न क़ानून हैं ! गाय, बैल व भैंस को अलग-अलग श्रेणियों में रखा गया है ! इनके सन्दर्भ में कहाँ क्या क़ानून हैं ज़रा प्रान्तों के अनुसार इसकी जानकारी भी लेते चलें !
जम्मू काश्मीर – गाय, बैल व भैंस तीनो के वध पर प्रतिबन्ध है
हिमांचल प्रदेश – तीनों पर प्रतिबन्ध
पंजाब – तीनों पर प्रतिबन्ध
हरियाणा – तीनों पर प्रतिबन्ध
राजस्थान – तीनों पर प्रतिबन्ध
उत्तर प्रदेश – सिर्फ गाय पर प्रतिबन्ध
बिहार – सिर्फ गाय पर प्रतिबन्ध
झारखंड – सिर्फ गाय पर प्रतिबन्ध
उत्तराखंड – तीनों पर प्रतिबन्ध
गुजरात – सिर्फ गाय और बैलों पर प्रतिबन्ध
मध्य प्रदेश – सिर्फ गाय और भैंसों पर प्रतिबन्ध
छत्तीसगढ़ – तीनों पर प्रतिबन्ध
उड़ीसा – सिर्फ गाय पर प्रतिबन्ध
महाराष्ट्र – सिर्फ गाय पर प्रतिबन्ध
कर्नाटक – सिर्फ गाय पर प्रतिबन्ध
गोआ – सिर्फ गाय पर प्रतिबन्ध
तेलंगाना – सिर्फ गाय पर प्रतिबन्ध
आंध्र प्रदेश – सिर्फ गाय पर प्रतिबन्ध
तामिलनाडू – सिर्फ गाय पर प्रतिबन्ध
केरल – कोई प्रतिबन्ध नहीं
बंगाल – कोई प्रतिबन्ध नहीं
आसाम – कोई प्रतिबन्ध नहीं
सिक्किम – कोई प्रतिबन्ध नहीं
मेघालय – कोई प्रतिबन्ध नहीं
अरुणांचल प्रदेश – कोई प्रतिबन्ध नहीं
नागालैंड – कोई प्रतिबन्ध नहीं
मिजोरम – कोई प्रतिबन्ध नहीं
त्रिपुरा – कोई प्रतिबन्ध नहीं
मणीपुर – सिर्फ गाय पर प्रतिबन्ध 



गो वध निषेध का क़ानून सबसे पुराना जम्मू काश्मीर का है जो सन १९३२ से लागू है ! तामिलनाडू में दस वर्ष और बिहार में पन्द्रह वर्ष से अधिक आयु के बैलों के वध पर कोई प्रतिबन्ध नहीं है ! देश के विभिन्न प्रान्तों में विभिन्न कानूनों की वजह से बीफ को परिभाषित करने में संशय (कन्फ्यूज़न) बना रहता है ! तीनों पशुओं के मांस को बीफ ही कहा जाता है ! क्या आप जानना चाहेंगे कि विश्व का सबसे बड़ा बीफ निर्यातक देश कौन है ? उत्तर है हमारा देश भारत ! यहाँ यह बात भी नोट करने योग्य है कि दुनिया में सबसे अधिक पशुधन भी भारत में ही है ! और दुनिया के सबसे अधिक शाकाहारी लोग भी भारत में ही बसते हैं ! पशुपालन भी एक उद्योग ही है और औद्योगिक अर्थशास्त्र के अपने ही नियम और लक्ष्य होते हैं !
यदि हम अपने पड़ोसी देशों की तरफ देखें तो नेपाल में गोवध पर प्रतिबन्ध है, श्रीलंका और म्यांमार, जहाँ का प्रमुख धर्म बौद्ध धर्म है, वहाँ अहिंसा की वजह से गोवध गैर कानूनी है ! इंडोनेशिया, जो एक मुस्लिम आबादी वाला देश है, वहाँ भी बीफ खाना एक टैबू है क्योंकि वे लोग अपने पूर्वजों को हिन्दू मानते हैं और उनका सम्मान करते हैं ! पाकिस्तान और बांग्लादेश में बीफ गरीबों का प्रमुख भोजन है इसलिए भारत से अधिकाँश गायें तस्करों के द्वारा इन्हीं देशों में भेजी जाती हैं !
हकीकत यह है कि सारे प्रतिबंधों के बावजूद अर्थशास्त्र सब पर भारी पड़ता है और इसी कारण से आज पशुपालक भैंस पालना गाय पालने से अधिक लाभकारी पाते हैं ! गाँवों में ट्रैक्टरों का प्रचलन बढ़ता ही जा रहा है और खेतों में बैलों की आवश्यकता निरंतर घट रही है ! सामान ढोने के लिये बैलगाड़ी का स्थान विभिन्न तरह के डीज़ल से चलने वाले वाहनों ने ले लिया है ! ऐसी स्थिति में गोवंश को बचाने के लिये क्या किया जा सकता है ! देश में अनेक गोशालाएं चल रही हैं जहाँ ट्रकों और रेलगाड़ियों के द्वारा कटने के लिये अवैध रूप से ले जाई जा रही गायों व भैसों को छुड़ा कर रखा जाता है ! लोग यदि चाहें तो अपने पशुओं को वहाँ पर आकर दान भी कर सकते हैं ! ऐसी अधिकाँश गोशालाएं अपना खर्च दूध और गोबर बेच कर निकालने का प्रयास करती हैं ! जो कमी पड़ती है वह दान से पूरी की जाती है जो प्राय: आसानी से प्राप्त हो जाता है ! गाड़ियों द्वारा पशुधन को सिर्फ कटने के लिये ही ले जाया जाता हो ऐसा नहीं है ! पालने के लिये भी पशु गाड़ियों द्वारा ही ले जाये जाते हैं ! लेकिन जो पशु पालने के लिये ले जाये जाते हैं उन्हें ठूँस-ठूँस कर नहीं भरा जाता ! उनके साथ यथेष्ट मात्रा में हरे चारे और पीने के पानी का प्रबंध भी किया जाता है ! कटने के लिये ले जाये जा रहे पशुओं के पैरों को रस्सी या जंजीरों से बाँध दिया जाता है ! उनको सींगों से भी इस तरह बाँधा जाता है कि उनकी गर्दन झुक जाए और वह कम स्थान घेरें ! कहीं-कहीं तो एक पशु की पीठ पर दूसरे पशु के पैर रख कर दोनों को एक साथ ही बाँध दिया जाता है ! खैर यह तो मनुष्य कितना क्रूर हो सकता है उस विषय की बात हो गयी पर यह बात विचारणीय है कि यदि गोवध के क़ानून सब राज्यों में एक प्रकार के हों और नागरिक गोवध को रोकने के अभियान में अपना सहयोग करना चाहते हों तो उन्हें ज़ोर देकर गाय के दूध की माँग को बढ़ाना होगा ! गाय का दूध स्वास्थ्य के लिये भैंस के दूध से कहीं अधिक फायदेमंद होता है यह बात सभी जानते हैं ! दूध के अतिरिक्त गाय से प्राप्त अन्य वस्तुओं जैसे गोबर इत्यादि की उपयोगिता का भी भरपूर विज्ञापन किया जाना चाहिए जिससे गो रक्षा के लिये एक सकारात्मक वातावरण तैयार किया जा सके और गोवध को रोका जा सके !
      


साधना वैद  



Thursday, October 8, 2015

व्याकुल प्राण




व्याकुल प्राण

कब तक बाट निहारूँ प्रियतम पथराये हैं नैन
किसे सुनाऊँ पीर हृदय की घायल हैं सब बैन
काठ हुई मैं खड़ी अहर्निश तकते राह तुम्हारी
व्याकुल प्राण देह पिंजर में तड़पत हैं दिन रैन !

साधना वैद   


चित्र - गूगल से साभार  

Sunday, October 4, 2015

साहब सब्ज़ी लाये


हमारे पड़ोस में शर्मा जी रहते हैं ! सरकारी नौकरी से अवकाश प्राप्त शर्मा जी निहायत ही सीधे सादे से सज्जन इंसान हैं ! बाल बच्चे शादी विवाह के बाद अपने-अपने घरों के हो गये ! बेटियाँ ससुराल चली गयीं ! बेटा नौकरी की वजह से परदेश चला गया और वहीं बस गया ! घर में उनके साथ रहती हैं उनकी जीवन संगिनी जिन्हें सब प्यार से शर्माइन बुलाते हैं ! 


शर्माइन अपने पतिदेव से बिलकुल अलग मिजाज़ की हैं ! आखिर घर गृहस्थी चलाने के लिये किसीको तो मोर्चा सम्हालना ही पड़ता है ! लिहाज़ा घर की बागडोर शर्माइन के हाथ में रहती है ! आलम ये कि पत्ता भी खड़कता है तो शर्माइन की इजाज़त से ! घर में क्या लाना है, कहाँ से लाना है, कब लाना है, कितना लाना है, कैसे लाना है, किसे लाना है सारे फैसले शर्माइन ही लेती हैं और उनका फरमान घर में फाइनल होता है ! साल छ: महीने में जब कभी छुट्टियों में बेटे बेटियाँ घर आते हैं तो वे भी अपनी माताजी के आदेश के अनुसार ही साँस ले सकते हैं वरना उन्हें शर्माइन के कोप का भाजन पड़ता है ! शर्मा जी के नाती पोते अगर हमारे यहाँ दस मिनिट को भी खेलने आ जायें तो पीछे-पीछे शर्माइन उन्हें अनुशासन का कोई न कोई पाठ पढ़ातीं या ‘पहले यह करो फिर खेलना’ के अंदाज़ में हिदायत देतीं बुला कर ले जातीं और बच्चे बेचारे मन मार कर चले जाते !


एक दिन शर्माइन बड़ी खुश-खुश घर आईं !

“दीदी ! हमने आज से साहब को सब्ज़ी लाने का काम सौंप दिया है ! रोज़ सुबह पार्क में टहलने तो जाते ही हैं वहाँ से लौटते समय बाज़ार से सब्ज़ी भी ले आया करेंगे ! सुबह-सुबह ताज़ी सब्ज़ी मिल जाया करेगी !” हमने सिर हिला कर उनकी बात का अनुमोदन तो किया लेकिन यह व्यवस्था लंबे समय तक चल पायेगी इसमें हमें संदेह था ! 


शर्मा जी ने अपनी सर्विस के ज़माने में कभी कोई घरेलू काम नहीं किया ! लेकिन श्रीमती जी का मानना है कि अब जब नौकरी पर नहीं जाना है तो घर के प्रति उन्हें अपनी ज़िम्मेदारी निभाने के लिये कुछ काम तो करना ही चाहिए इसलिए यह काम उन्हें सौंपा गया है ! मरता क्या न करता ! शर्मा जी बेचारे रोज़ सुबह लदे फदे थैला भर सब्ज़ी लेकर लौटते पार्क से ! लेकिन सब्ज़ी लाने बाद से उनके यहाँ आये दिन कोई न कोई नया शगूफा छिड़ने लगा ! 
  
एक दिन सुबह-सुबह शर्माइन झींकी झल्लाई सी खूब सारे बैंगन लेकर हमारे घर आयीं !
“दीदी ! साहब को तो कुछ समझ ही नहीं आता है ! बताइये हम कुल जमा दो लोग हैं और देखो तो ज़रा कितने सारे बैंगन खरीद लाये हैं ! कल तो लाये ही थे आज भी उठा लाये हैं ! हमने जब टोका इतने बैंगन क्यों ले आये तो फ़ौरन कहने लगे, "अच्छे लग रहे थे तो खरीद लिये ! मेरी लाई सब्ज़ी से दिक्कत होती है तो कल से नहीं लाया करूँ ?" भला यह भी कोई बात हुई ! सब्ज़ी तो ये ही लायेंगे !" उनके स्वर में दृढ़ निश्चय की खनक थी ! फिर थैले से बैंगन निकाल कर मुझे देते हुए बोलीं, "ये बैंगन आप बना लीजियेगा !” 
“ठीक है !" मैंने बैंगन फ्रिज की बास्केट में डालते हुए कहा !  
"लेकिन सुबह से शाम तक कॉलोनी में कम से कम सब्ज़ी के सात आठ ठेल वाले आते हैं तुम शर्मा जी को क्यों परेशान करती हो ! जो चाहिए जितना चाहिए खुद ही ले लिया करो ना !”

“नहीं, उन्हें भी तो घर का कुछ काम करना चाहिए ! सब्ज़ी तो वो ही लायेंगे !” शर्माइन का जवाब था !

“तो उन्हें बता दिया करो कि कितनी लाया करें !” हमने भी सलाह ठोक दी !


दो दिन बाद फिर सुबह-सुबह शर्माइन अवतरित हुईं !

“अब क्या हुआ ?“ हमारा सवाल था !

“आपकी सलाह के अनुसार हमने साहब को बता दिया कि हमारे यहाँ थोड़ी सब्ज़ी बनती है इसलिए बैंगन वगैरह दो से ज़्यादह नहीं लाया करें ! तो आज तो इन्होंने कमाल ही कर दिया ! सब्ज़ी के थैले में दो आलू, दो टिंडे, दो करेले, दो परवल, दो गाजर, दो टमाटर यानि कि हर सब्ज़ी दो की संख्या में है और जब हमने पूछा यह क्या है तो फिर वही रट “तो कल से सब्जी ना लाऊँ !”

किसी तरह हँसी रोक कर हमने कहा, “कोई बात नहीं मिक्स्ड वेजीटेबिल बना लो !”

“और बना कर सारी की सारी महरी को दे दूँ क्योंकि साहब तो उसे चखेंगे भी नहीं !” शर्माइन का चिढ़ा हुआ जवाब था !

“तो अब तो बख्श दो उन्हें !” हमने फिर धीरे से अपनी सलाह सरका दी !

“अजी नहीं ! सब्ज़ी तो वो ही लायेंगे ! हम भी पीछे हटने वालों में से नहीं हैं ! कभी कुछ सीखेंगे कि नहीं ?”

शर्मा जी की सब्ज़ी खरीदने की क्लास रोज़ इसी तरह चलती रही और रोज़ कोई न कोई मज़ेदार किस्सा सामने आता रहा !


दीवाली आने को थी ! सभी घरों में त्यौहार से पहले के काम छिड़े हुए थे ! साफ़ सफाई भी चल रही थी ! मौसम बदल रहा था ! गरम कपड़े बॉक्स से निकालने थे ! लिहाफ गद्दों को धूप लगानी थी ! शर्मा जी के यहाँ राज मज़दूरों का काम भी फैला हुआ था ! ऐसे में एक दिन शर्मा जी बाज़ार से ताज़ी-ताज़ी छोटी जड़ों वाली ढेर सारी थैला भर मैथी ले आये ! शर्माइन का मूड बहुत खराब ! अब इसे साफ़ करने के लिये कौन जान मारेगा ! मौसम की पहली मँहगी सौगात ! ना तो देते बन रही थी ना ही फेंकते ! इतनी महीन मैथी साफ़ करने का टाइम भी नहीं था उनके पास ! दो तीन दिन तक ऐसी ही फ्रिज में पड़ी रही ! एक दिन कुछ जोश चढ़ा तो मुरझाई मैथी से बमुश्किल सौ सवा सौ ग्राम ही साफ़ कर पाईं ! अगले दिन घर में जो बेलदारनी काम कर रही थी उसे मैथी साफ़ करने के काम में लगा दिया गया ! सारा दिन धीरे-धीरे कछुए की रफ़्तार से बेलदारनी ने जो मैथी साफ़ करके थाली में दी उसका वज़न मुश्किल से सौ ग्राम से अधिक नहीं रहा होगा ! और सूरत ऐसी कि उसे देख कर खाने की इच्छा ही मर जाए ! अंतत: मौसम की पहली मैथी कूड़ेदान के हवाले कर दी गयी ! 


शर्माइन का मलाल देखने लायक था ! मैथी बड़ी मँहगी पड़ी और थाली में परोसी भी नहीं जा सकी ! शर्माइन का चेहरा उतरा हुआ था लेकिन उनके साहब के चहरे पर पूरी बत्तीस इंच की मुस्कान फ़ैली हुई थी ! उन्हें एक फ़ायदा जो हो गया था कि सब्ज़ी लाने की आफत से उनका पीछा स्थायी रूप से छूट गया था ! कई बार सोचती हूँ यह शर्मा जी की सोची समझी साज़िश थी या सचमुच ही उनके भोले भाले अनाड़ी व्यक्तित्व की एक बानगी !



साधना वैद    





Thursday, October 1, 2015

कब आयेंगे राम



(१) 
दाता तेरे दान का, कोई ओर न छोर !
फिर भी डूबा लोभ में, पापी मन का चोर ! 

(२)
मालिक इतना दीजिये, जितनी है दरकार ! 
संचय के अपराध से, लीजे मुझे उबार ! 

(३)
अर्चन पूजन वंदना, किये नहीं स्वीकार ! 
मिली न अनुकम्पा कभी, व्यर्थ हुई मनुहार ! 

(४)
ना माणिक ना संपदा, देने को उपहार ! 
भाव कुसुम अर्पित करूँ, कर लो प्रभु स्वीकार ! 

(५)
रैन दिवस जपती रही, जिह्वा उनका नाम ! 
नैन बिछे हैं पंथ पर, बिना किये विश्राम ! 

(६)
इन्द्रिय सभी सचेत हैं, आहट पर हैं कान ! 
अंतर में मूरत बसी, उर में प्रभु का ध्यान ! 

(७)
बैठी काग़ज़ नाव में, करने सागर पार ! 
आ जाओ प्रभु तारने, थामो कर पतवार ! 

(८)
बाती बन जलती रही, डोर आस की थाम !
कौन जतन जानूँ सखी, कब आयेंगे राम ! 


साधना वैद 




Thursday, September 24, 2015

शुकराना



तुम क्या गये
भावनाओं की रेशमी नमी
जीवन की कड़ी धूप में
भाप बन कर उड़ गयी !    
स्नेह के खाद पानी के अभाव में
कल्पना के कुसुमों ने
खिलना बंद कर दिया !
पलकों के बराज में निरुद्ध झील
सहसा ही सूख कर
रेतीले मैदान में तब्दील हो गयी !
प्रेम आल्हादित हृदय के
उत्कंठा से छलछलाते गीत
कंठ में ही घुट कर रह गये !
हवाएं खामोश हो गयीं,
पेड़ पौधे गुमसुम से
निस्पंद हो गये,
खुशबुएँ सहम कर कहीं दुबक गयीं,
आसमान के थाल को खाली कर
रात ने सारे चमकते चाँद सितारे
अपनी गठरी में समेट कर
कहीं छिपा दिये !
जीवन में छाए इस अँधेरे में
भटकते हुए महसूस करती हूँ कि  
अब कोई उत्साह नहीं, विश्वास नहीं
उम्मीद नहीं, इंतज़ार नहीं
आहट नहीं, दस्तक नहीं
आस नहीं, आवाज़ नहीं,
यहाँ तक कि
नीरव रात के सन्नाटों में कहीं
सूखे पत्तों की सरसराहट भी नहीं !
अपने निर्जन, निसंग, नीरव एकांत में
बस एक अकेली मैं हूँ और
मेरे साथ है मेरा आइना
जिसमें मैं गिनती रहती हूँ
अपने चहरे पर बढ़ती हुई
हर रोज़ नई झुर्रियों को !
उम्र के इस मुकाम पर आकर
शायद एक यही काम
बाकी रह गया है
मेरे करने के लिये !
और इसके लिये मुझे तुम्हारा
आभार मानना भी तो ज़रूरी है !
तो मेरा यह शुकराना
तुम्हें क़ुबूल तो है ना ?

साधना वैद 
  
चित्र  - गूगल से साभार