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Wednesday, August 8, 2018

कितना चाहा




कितना चाहा
कि अपने सामने अपने इतने पास
तुम्हें पा तुम्हें छूकर तुम्हारे सामीप्य की अनुभूति को जी सकूँ,
लेकिन हर बार ना जाने कौन सी
अदृश्य काँच की दीवारों से टकरा कर 
मेरे हाथ घायल हो जाते हैं
और मैं तुम्हें छू नहीं पाती ।
कितना चाहा
कि बिन कहे ही मेरे मन की मौन बातों को तुम सुन लो
और मैं तुम्हारी आँखों में उजागर
उनके प्रत्युत्तर को पढ़ लूँ,
लेकिन हर बार मेरी मौन अभ्यर्थना तो दूर
मेरी मुखर चीत्कारें भी समस्त ब्रह्मांड में गूँज
ग्रह नक्षत्रों से टकरा कर लौट आती हैं
लेकिन तुम्हारे सुदृढ़ दुर्ग की दीवारों को नहीं बेध पातीं ।
कितना चाहा
कि कस कर अपनी मुट्ठियों को भींच
खुशी का एक भी पल रेत की तरह सरकने ना दूँ,
लेकिन सारे सुख न जाने कब, कैसे और कहाँ
सरक कर मेरी हथेलियों को रीता कर जाते हैं
और मैं इस उपमान की परिभाषा को बदल नही पाती ।
कितना चाहा
कि मौन मुग्ध उजली वादियों में
सुदूर कहीं किसी छोर से हवा के पंखों पर सवार हो आती
अपने नाम की प्रतिध्वनि की गूँज मैं सुन लूँ
और वहीं पिघल कर धारा बन बह जाऊँ,
लेकिन ऐसा कभी हो नहीं पाता
और मैं अपनी अभिलाषा को कभी कुचल नहीं पाती ।

साधना वैद

Saturday, August 4, 2018

कल रात ख्वाब में


कल रात ख्वाब में
मैं तुम्हारे घर के कितने पास
पहुँच गयी थी !
तुम्हारी नींद ना टूटे इसलिये
मैंने दूर से ही तुम्हारे घर के
बंद दरवाज़े को
अपनी नज़रों से सहलाया था
और चुपके से
अपनी भीगी पलकों की नोक से
उस पर अपना नाम उकेर दिया था !
सुबह को जब तुमने दरवाजा खोला होगा
तो उसे पढ़ तो लिया था ना ?

तुम्हारे घर की बंद खिड़की के बाहर
मैंने अपने आँचल में बंधे
खूबसूरत यादों के सारे के सारे पुष्पहार
बहुत आहिस्ता से नीचे रख दिये थे !
सुबह उठ कर ताज़ी हवा के लिये
जब तुमने खिड़की खोली होगी
तो उनकी खुशबू से तुम्हारे
आस पास की फिजां
महक तो उठी थी ना ?

तुम्हारे घर के सामने के दरख़्त की
सबसे ऊँची शाख पर
अपने मन में सालों से घुटती एक
लंबी सी सुबकी को
मैं चुपके से टाँग आई थी
इस उम्मीद से कि कभी
पतझड़ के मौसम में
तेज़ हवा के साथ
उस दरख़्त के पत्ते उड़ कर
तुम्हारे आँगन में आकर गिरें तो
उनके साथ वह सुबकी भी
तुम्हारी झोली में जा गिरे !

तुम अपने बगीचे की क्यारी में
पौधे रोपने के लिये जब
मिट्टी तैयार करोगे तो
तुम वहाँ मेरे आँसुओं की नमी
ज़रूर महसूस कर पाओगे
शायद मेरे आँसुओं से सींचे जाने से
तुम्हारे बाग के फूल और स्वस्थ,
और सुरभित, और सुन्दर हो जायें !

अपने मन में उठती भावनाओं को
गीतों में ढाल कर मैंने
खामोशी के स्वरों में
मन ही मन दोहरा लिया था !
कहीं मेरी आवाज़ से, मेरी आहट से
तुम्हारी नींद ना टूट जाये
मैं चुपचाप दबे पाँव वापिस लौट आई थी !
मेरे वो सारे गीत सितारे बन के
आसमान में चमक रहे हैं
तुम जब आसमान में देखोगे
तो हर तारा रुँधे स्वर में
तुमसे मेरी ही बात करेगा
तुम उन बातों को समझ तो पाओगे ना ?

साधना वैद

Thursday, August 2, 2018

सपने



रफ्ता-रफ्ता सारे सपने पलकों पर ही सो गये ,
कुछ टूटे कुछ आँसू बन कर ग़म का दरिया हो गये !

कुछ शब की चूनर के तारे बन नज़रों से दूर हुए ,
कुछ घुल कर आहों में पुर नम बादल काले हो गये !

कुछ बन कर आँसू कुदरत के शबनम हो कर ढुलक गये ,
कुछ रौंदे जाकर पैरों से रेज़ा रेज़ा हो गये !

कुछ दरिया से मोती लाने की चाहत में डूब गये ,
कुछ लहरों ने लीले, कुछ तूफ़ाँ के हवाले हो गये !

कुछ ने उड़ने की चाहत में अपने पर नुचवा डाले ,
कुछ थक कर अपनी ही चाहत की कब्रों में सो गये !

कुछ गिर कर शीशे की मानिंद चूर-चूर हो बिखर गये ,
कुछ जल कर दुनिया की तपिश से रेत का सहरा हो गये !

अब तक जिन सपनों के किस्से तहरीरों में ज़िंदा थे ,
क़ासिद के हाथों में पड़ कर पुर्ज़ा-पुर्ज़ा हो गये !

अब इन आँखों को सपनों के सपने से डर लगता है ,
जो बायस थे खुशियों के रोने का बहाना हो गये !




साधना वैद

Tuesday, July 31, 2018

सीला सावन


सीला सावन 
तृषित तन मन 
दूर सजन 

मुग्ध वसुधा 
उल्लसित गगन 
सौंधी पवन

गाते विहग 
सुरभित सुमन 
झूमें मगन 

व्याकुल बूँदें 
देती हैं आमंत्रण
आओ सजन 

पुकारें तुम्हें 
बिखर धरा पर 
नष्ट हो जायेंं

बुलायें तुम्हें 
वार दें तन मन 
खुद सो जायें

आया सावन 
सुन कर पुकार 
धरा मुस्काई 

गोटे के फूल 
चूनर में अपनी 
टाँँक ले आई 

हुआ अंधेरा
कड़कती बिजली 
डरपे हिया 

बरसी बूँदें 
गरजते बादल 
तड़पे जिया 

रीता जीवन 
रीता उर अंतर 
आ जाओ पिया

भर के सुख 
सूने मधुबन में 
ना जाओ पिया


साधना वैद 














Thursday, July 26, 2018

किस्मत



इस दुनिया में बात एक ही
मुझको सच्ची लगती है
अपनी सबसे बुरी ग़ैर की
किस्मत अच्छी लगती है !

'किस्मत' की किस्मत को अब तक
कोई बदल न पाया
अपने दुःख का कारण सबने
किस्मत को ही पाया !

देखो उसकी किस्मत कैसे
चमक उठे हैं तारे
फूटी मेरी किस्मत पीछे
पड़े हुए दुःख सारे !

मैं किस्मत का मारा मेरी
कौन करे सुनवाई
फिरता दर दर मारा मैंने
पग पग ठोकर खाई !

इसकी उसकी सबकी किस्मत
क्यों ऊपर चढ़ जाती
मेरी ही किस्मत की रेखा
क्यों अक्सर मिट जाती !

इंद्रजाल किस्मत का कैसा
क्या खेला है सारा
समझ न पाऊँ लीला तेरी
डूबा हुआ सितारा !

वो छू ले जो मिट्टी तो
वो भी सोना बन जाती
मैं ही हूँ किस्मत का हेठी
बात नहीं बन पाती !

लोगों की सुन ऐसी बातें
'किस्मत' सिर धुनती है
अपनी ही किस्मत पर खुल कर
खूब हँसा करती है  !

मत भूलो नादान कि
किस्मत भी तब ही चमकेगी 
मन में हो संकल्प और पुरुषार्थ 
तभी दमकेगी ! 





साधना वैद 

Thursday, July 19, 2018

सूना री हिंडोला




सूना री हिंडोला अम्बुआ की डार पे जी
ए जी कोई मैया ना, अम्बे कोई बाबुल ना
देने को पुकार !
छुट गया बहना
देखो मेरा मायका जी !

भैया मेरे प्यारे धाये स्वर्ग को जी
कोई ना रहा अब मेरे संग को जी
मैया जैसी भाभी मेरी, बहना जैसी भाभी मेरी
गयी हैं सिधार !
छुट गया बहना
देखो मेरा मायका जी !

पिंजरे की मैना तुम ही पुकार लो जी  
बगिया के पंछी सखी को गुहार लो जी
मन को मनाऊँ कैसे, तुम तक आऊँ कैसे
हूँ मैं बेकरार !
छुट गया बहना
देखो मेरा मायका जी !

अम्बुआ के सुगना तुम ही पुकार लो जी
द्वारे की गैया बेटी को दुलार लो जी  
देखो मेरी बह रही, अम्बे झर-झर बह रही
अँसुअन धार !
छुट गया बहना
देखो मेरा मायका जी ! 


साधना वैद  

Thursday, July 12, 2018

भर ले अपनी झोली



जीवन यदि सुरभित एवँ
निष्कंटक बनाना है तो
अंतर के सारे शूलों को
चुन कर मन उपवन के
कोने-कोने की
सफाई करनी होगी !  
हृदय के सारे गरल को
एक पात्र में एकत्रित कर  
नीलकंठ बन अपने ही
गले के नीचे
उतारना होगा !
अंतर में दहकते
ज्वालामुखी के सारे लावे को
सप्रयास बाहर निकाल
शीतल जल की फुहार से
उसके भीषण ताप को
ठंडा करना होगा !
हाथ भले ही जल जायें
हृदय में सुलगते अंगारों पर
राख डाल इस धधकती
अग्नि का भी शमन
करना ही होगा !
मन की नौका को
तट पर लाना है तो
सागर की उत्ताल तरंगों से
कैसा घबराना !
डूब जायें या तर जायें
पतवार उठा कर
नाव को तो खेना ही होगा !
मुझे पता है तूने
कभी हार नहीं मानी है
आज भी अपने कदमों को
डगमगाने मत देना !
जितना तेरा संकल्प दृढ़ होगा
उतना ही तेरा आत्मबल बढ़ेगा
और उतना ही यह संसार
प्रीतिकर हो जायेगा !
एक अलौकिक
दिव्य संगीत की धुन
तुझे सुनाई देने लगेगी जिसे सुन
तू मंत्रमुग्ध हो जायेगा !
फिर तेरे मन में यह
असमंजस और संदेह कैसा !
चल उठ देर न कर !
नव निर्माण के पथ पर
अपने कदम बढ़ा
और संसार के सारे सुख
अपनी झोली में भर ले !


साधना वैद