Followers

Monday, April 20, 2020

दो पंछी



कल सुबह अपने कमरे की
खिड़की से बाहर देखा था मैंने  
धरा से गगन का असीम विस्तार
नापने को तैयार
दो बेहद सुन्दर और ऊर्जावान पंछियों को
हौसलों की उड़ते भरते हुए
देखा था मैंने !

बिल्कुल सम गति सम लय में
समानांतर उड़ रहे थे दोनों,
मधुर स्वर में चहचहाते हुए
कुछ जग की कुछ अपनी
एक दूजे को सुनाते हुए
बड़े आश्वस्त से पुलकित हो   
उड़ रहे थे दोनों !

कुछ देर बाद एक ऊँची सी उड़ान भर
यूकेलिप्टस की पत्रहीन
ऊँची ऊँची दो डालियों पर
आमने सामने बैठ गये वे दोनों  
शायद कुछ सुस्ताने को या फिर
कुछ अनकही कुछ अनसुनी रह गयीं
बातें फिर से दोहराने को
आमने सामने बैठ गये वे दोनों !

तार सप्तक में चह्चहाने की
एक दूजे के स्वर में स्वर मिलाने की 
दोनों की आवाजें सुन रही थी मैं
वो गा रहे थे या लड़ रहे थे  
उग्र थे या उल्लसित
खुश थे या नाखुश
समझ नहीं पा रही थी मैं !

थोड़ी देर के बाद
एक पंछी अपनी डाल छोड़ 
अनंत आकाश में उड़ कर
दूर कहीं बहुत दूर चला गया,
मुझे विश्वास था कि वह लौट कर
अपने साथी के पास ज़रूर आएगा
लेकिन देर तक प्रतीक्षा करने के बाद
मेरा विश्वास छला गया ! 
  
दूसरा पंछी मौन उदास अनमना सा
अपनी डाल पर ही बैठा रह गया
जीवन साथी के चले जाने के बाद
इस अनंत असीम व्योम में वह
नितांत अकेला रह गया ! 

मेरे दिल में जैसे कहीं कुछ
छन्न से टूट गया
शिथिल हुई मेरी पकड़ से
उँगलियों में लिपटा ऊन का
अधबना गोला धरा पर छूट गया ! 

नहीं जानती
यूकेलिप्टस की शाख पर बैठे
उस पंछी को वाकई में थी या नहीं
पर मुझे बड़ी व्यग्रता से प्रतीक्षा थी
उस पंछी के लौट आने की
जो उसे छोड़ कर चला गया था
पता नहीं क्यों
उस पंछी के साथ साथ वह मुझे भी
एक अकथनीय पीड़ा के
अनंत अथाह सागर में
डुबो कर चला गया था !

साधना वैद

Friday, April 17, 2020

मेरा मैं




जब भी अपने
हृदय का बंद द्वार
खोल कर अंदर झाँका है
अपने ‘मैं’ को सदैव सजग,
सतर्क, संयत एवँ दृढ़ता से अपने
इष्ट के संधान के लिये
समग्र रूप से एकाग्र ही पाया है !

ऐसा क्या है उसमें जो वह
सागर की जलनिधि सा अथाह,
आकाश सा अनन्त, धरती सा उर्वर,
वायु सा जीवनदायी व गतिमान एवँ
पवित्र अग्नि सा ज्वलनशील है !

ऐसा क्या है उसमें जो
संसार का कोई भी आतंक
उसे भयभीत नहीं करता,
कोई भी भीषण प्रलयंकारी तूफ़ान
उसे झुका नहीं सकता,
कैसे भी अनिष्ट का भय उसका
मनोबल तोड़ नहीं पाता !

लेकिन जो अपनी अंतरात्मा की
एक चेतावनी भर से सहम कर
निस्पंद हो जाता है,
जो मेरी आँखों में लिखे
वर्जना के हलके से संकेत को
पढ़ कर ही सहम जाता है और
मेरे होंठों पर धरी निषेधाज्ञा की
उँगली को देख अपनी वाणी
खो बैठता है ! 

मैं जानती हूँ
दुनिया की नज़रों में
मेरा यह ‘मैं’
एक ज़िद्दी, अड़ियल, अहमवादी,
दम्भी, घमण्डी और भी
न जाने क्या-क्या है ! 

लेकिन क्या आप जानते हैं  
मेरा यह ‘मैं’
मेरे आत्मसम्मान का एक
सबसे शांत, सौम्य और
सुदर्शन चेहरा है,
जिस पर मैं अपनी सम्पूर्ण
निष्ठा से आसक्त हूँ ! 

वह इस रुग्ण समाज में विस्तीर्ण   
वर्जनाओं, रूढ़ियों और सड़ी गली
परम्पराओं की गहरी दलदल से
बाहर निकाल मुझे किनारे तक
पहुँचाने के लिये मेरा एकमात्र
एवँ अति विश्वसनीय
अवलंब है ! 
अपने स्वत्व की रक्षा के लिये
मेरे पास उपलब्ध मेरा इकलौता
अचूक अमोघ अस्त्र है ! 

                     मेरी विदग्ध आत्मा के ताप को
हरने के लिये अमृत सामान
मृदुल, मधुर, शीतल जल का
अजस्त्र अनन्त स्त्रोत है ! 

मुझे कोई परवाह नहीं
लोग मुझे क्या समझते हैं
लेकिन मेरी नज़रों में मेरी पहचान
मेरे अपने इस ‘मैं’ से है
और निश्चित रूप से मुझे
अपनी इस पहचान पर गर्व है ! 

जिस दिन मेरी नज़र में
इस ‘मैं’ का अवमूल्यन हो जायेगा
वह दिन मेरे जीवन का
सर्वाधिक दुखद और कदाचित
अंतिम दिन होगा क्योंकि
मुझे नहीं लगता उसके बाद
मेरे जीवन में ऐसा कुछ
अनमोल शेष रह जायेगा
जिस पर मैं अभिमान कर सकूँ ! 

साधना वैद 

Wednesday, April 15, 2020

चंद चित्र हाइकू

आती हूँ पास 
तुम्हारी शरण मेंं
इस द्वार से 


शाख से गिरे 
धरा पर बिखरे 
रौंदे जाने को 


प्लावित कर 
मेरा अंतरमन 
अमृत धारा 



साधना वैद 

Saturday, April 11, 2020

बँटवारा


खिंच गयी थी मेरे दिल पर भी एक गहरी लकीर
जब बँटवारे के प्रस्ताव को अंजाम देने की खातिर

अधिकारियों की टीम नाप जोख करने
हमारे घर में आई थी
और कुदाल की हर चोट के साथ हो गए थे
मेरे दिल के भी कई टुकड़े
जब घर के आँगन के बीचों बीच
दीवाल उठाने को मिस्त्री ने
बुनियाद की पहली ईंट लगाई थी !
वही आँगन जहाँ सालों हमने मिल कर
जाने कितने मनों बड़ी, मंगौड़ी,
कचरी, पापड़, चिप्स, सेव बनाए
वही आँगन जहाँ धूप में बैठ हँसते गाते
जाने कितने स्वेटर, मफलर, शॉल बुने
जाने कितने मर्तबान भर आम, मिर्च,
नीबू, कटहल के अचार बनाए !
जहाँ न जाने कितने जगराते हुए
जाने कितनी ढोलकें बजीं
जाने कितने गीत संगीत हुए
जाने कितनी पायलें बजीं !
जहाँ नन्हे शिशुओं ने चलना सीखा
छोटे बच्चों ने साइकिल चलाई,
जहाँ खेल खेल में हुए कई घमासान
और बड़ों ने बीच बचाव कर सुलह कराई !
कई साल पहले जिस जगह पर
नई बहू के स्वागत के लिए
सासू जी ने मेरी आरती उतारी थी
आज ठीक उसी जगह से
विभाजन की यह रेखा गुज़री है,
तब शायद मेरे पैर ही रेखा के इधर उधर थे
आज मेरे समूचे अस्तित्व को दो भागों में
विभक्त करती हुई यह रेखा गुज़री है !
नहीं जानती सब किस नज़रिए से देखते हैं
और झेल जाते हैं इन सब विघटनकारी बातों को,
हम तो बने रह गए ‘इमोशनल फूल’
सबकी नज़रों में, नहीं सह पाए
आलगाव की इन घातों प्रतिघातों को !


चित्र - गूगल से साभार


साधना वैद

Friday, April 10, 2020

जुगाड़




“मरना है क्या ? कहाँ उधर खिसका जा रहा है सड़क के किनारे ? कोई गाड़ी आयेगी आधी रात में और तुझे ठोक जायेगी तो सोते में पता भी नहीं चलेगा !” 
झुँझलाते हुए बिलमा ने ज्वर से निढाल अपने पति चंदू की टाँग पकड़ उसे ऊपर फुटपाथ के बीच में घसीटा !
“ऐसा भी कहाँ होता है री बिलमा हमारे साथ !” 
गहरी साँस लेते हुए चंदू बुदबुदाया ! 
“जाने कौन सी किस्मत लिखा कर लाये हैं अपने कपाल पर ! ना काम का ठिकाना ना रोटी का, ना दवा दारू की कोई जुगत ना बच्चों के सर पे छत ! ऐसी जिंदगानी से तो मौत ही भली ! कोई गाड़ी ही ठोक जाए तो शायद कुछ दिन के लिए बच्चों के लिए रोटी पानी का जुगाड़ हो जाए !”
एक रोटी के लिए छीना झपटी करते, माँ की मार खाने के बाद गहरी नींद में सोये बच्चों की ओर अपराध भाव से ग्रस्त चंदू ने उचटती सी नज़र डाली !

साधना वैद

Sunday, April 5, 2020

स्वर्ण बिंदु से तुम



मेरे अंतस के मनाकाश पर
दूर क्षितज की रक्तिम रेखा पर हर सुबह
स्वर्ण बिंदु से तुम उदित हो जाते हो !
नहीं जानती भोर तुम्हारे उदित होने से होती है
या तुम मेरे जीवन को आलोकित करने के लिए
भोर की प्रतीक्षा करते हो !
किन्तु यह परम सत्य है
तुम्हारा प्रचुर प्रकाश मुझे असीम ऊर्जा से
भर जाता है और मुझे जीवन का हर रंग
भला लगने लगता है !
फिर संध्या होते होते पुन: एक
निस्तेज स्वर्ण बिंदु से तुम
मेरे अन्तस्तल में हिलोरें लेते
अतल सागर की गहराइयों में
निमग्न हो जाते हो !
लेकिन फिर तुरंत ही असंख्य बिन्दुओं से तुम
एक बार फिर मेरे मन के आकाश में
तारे बन कर छा जाते हो और
मैं सितारों भरी उस चूनर को ओढ़ कर
आश्वस्त हो जाती हूँ कि
तुम हो मेरे पास मुझे घेरे हुए
अपनी बाहों के सुरक्षा कवच में और मैं
अपलक देखती रहती हूँ उस चंद्र बिंदु को
और ढूँढती रहती हूँ उसमें तुम्हारी छवि
न जाने क्यों !

साधना वैद 



Friday, April 3, 2020

पलाश और हम



आओ चलो आज फिर भटकते हैं
उन्हीं वादियों में, उसी रहगुज़र पे
खड़े हैं जहाँ सैकड़ों दरख़्त पलाश के
सड़क के किनारे बिलकुल सतर सीधे
लाल लाल फूलों से लदे
गर्व से अपना सिर उठाये
आसमान से बातें करते
अपने नव कुसुमित सुर्ख फूलों से
बालारुण का अभिषेक सा करते !
चलो आज फिर करते हैं चहलकदमी
उन्हीं रास्तों पर जहाँ पलाश की शाखों ने
बड़े ही प्यार से बिछा दी हैं
नर्म नर्म अनगिनत सुर्ख पाँखुरियाँ
हमारे कदमों के नीचे बचाने के लिए
हमें राह में बिखरे काँटों और कंकड़ों से
आओ कि आज फिर से मेहरबान है मौसम
कि आज फिर से मेहरबान है कुदरत
कि आज फिर से खुशगवार है फ़िज़ा
कि आज फिर से पुकारा है हमें पलाश ने
गले में पहनाने को सुर्ख फूलों की जय माल
कि आज एक बार फिर पीछे मुड़ कर
जाते हुए मधुमास ने पुकारा है हमें
पलाश के इन सिंदूरी फूलों से
मन की वीणा के तारों को झंकृत कर
प्रेम का मधुर गीत गुनगुनाने के लिए !
आ जाओ एक दूजे के स्वर में स्वर मिला कर
प्रकृति के इस आह्वान का हम मान रख लें
आ जाओ एक दूजे के नयनों में अनुराग के
इन सुर्ख फूलों का प्रतिबिम्ब देख
मधुमास की मनुहार का हम ध्यान रख लें !

साधना वैद