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Saturday, December 6, 2014

ओ मनमीत


ओ मनमीत
हृदय धर प्रीत
सुनाऊँ गीत !

प्राण अधारे
बाट तकत थके
नैन हमारे !

जीवन धारा
बहती कल-कल
दूर किनारा !

खेवनहार
डूबी जाती है नैया ‘
 लगा दो पार !

पालनहार
व्याकुल अंतर की
सुनो पुकार !

सीता के राम
राधा मीरा के श्याम
  हमारा कौन ...?

भावों के फूल
पिरो आँसू की डोर
अर्पित तुम्हें !

  कृष्णमुरारी  
हर लो ना आकर  
पीर हमारी !

पिरोती रही
वन्दना की माला में
भक्ति के फूल !

चढ़ाती रही
तुम्हारे चरणों में
  श्रद्धा के हार !  

साधना वैद

Wednesday, December 3, 2014

मैं जान जाती हूँ


जब सुबह की समीर पहले की तरह
ना तेरे गीत गुनगुनाती है
ना ही तेरी खुशबू लेकर आती है
मैं जान जाती हूँ
आज अभी तक तेरी सुबह नहीं हुई है !
जब दिन की फिजां पहले की तरह
चुस्त दुरुस्त नज़र नहीं आती
ना ही सूरज से हमेशा की तरह
वह अविरल ताप झरता है
मैं जान जाती हूँ
आज ज़रूर तेरी तबीयत नासाज़ है !
जब खुशनुमां शामों की तमाम
मीठी सी सरगोशियों के बाद भी
ना किसी बात से मन बहलता है
ना ही कोई मधुर गीत दिल को छूता है
मैं जान जाती हूँ
आज तू बहुत उदास है !
जब रात अपनी सारी गहनता के साथ
नीचे उतर आती है,
जब चाँद सितारे आसमान में
एकदम मौन स्तब्ध अपने स्थान पर
रत्न की तरह जड़े से दिखाई देते हैं,
जब पास से आती पत्तों की
धीमी सी सरसराहट भी
अनायास ही बेचैन कर जाती है
मैं जान जाती हूँ
नींद तेरी आँखों से कोसों दूर है !
बस इतनी सी ख्वाहिश है
जैसे तेरे बारे में इतनी दूर रह कर भी
मैं सब कुछ जान जाती हूँ
काश तुझे भी खबर होती
डाल से टूटने के बाद 
ज़मीन पर गिरे फूल पर
क्या गुज़रती है !
 


साधना वैद 

Saturday, November 29, 2014

शह और मात


सोचा था कभी याद ना करेंगे तुम्हें
लेकिन हर पल सिर्फ तुम्हारी
चुभती यादों के दंशों को झेलते ही रहे ,
सोचा था तिल-तिल कर मिटा देंगे खुद को
लेकिन हर पल समझौते की सुई से
बस अपने गहरे ज़ख्मों को सिलते ही रहे ,
लाख तुम्हें भुलाना चाहा हमने मगर
पल भर को भी भुला ही ना सके तुमको
लाख मिटाना चाहा खुद को हमने मगर
पल भर को भी मिटा ही ना सके खुद को
ज़िंदगी की चौसर के हर खाने पर हम
जाने क्यों ज़रूरत बेज़रूरत चलते ही रहे
तुम्हारी बिछाई इस बिसात पर जाने क्यों  
यह खेल शह और मात का खेलते ही रहे !

साधना वैद

Monday, November 24, 2014

विनती सुनो मेरी




तेरी अभ्यर्थना में मैं
इस तरह झुका हुआ हूँ
मेरे भुवन भास्कर !
इस नश्वर जीवन की
एक और संध्या घिर आई है !
बड़े-बड़े डग भरता अन्धकार
अपना अखण्ड साम्राज्य
स्थापित करने
तीव्र गति से बढ़ता
चला आ रहा है !
मन को सहलाता ,
आँखों को ठण्डक पहुँचाता
यह मनोरम दृश्य
आहिस्ता-आहिस्ता
घने तिमिर के
प्रगाढ़ आलिंगन में  
अदृश्य होता जा रहा है !
बस अब कुछ पलों के बाद
शेष रह जाएगा
शाश्वत अवसान सा
एक अभेद्द्य सन्नाटा
जिसकी सुदृढ़ दीवारों में
चेतना की सेंध लगाना
नितांत असंभव हो जाता है !
प्रखर प्रकाश के मेरे महापुंज
अब तो उदित हो जाओ !  
छा जाओ मेरे मनाकाश पर
आलोकित कर दो
मन का कोना कोना
वरना भय है कि  
हवाओं के साज़ पर
हर पल हर क्षण 
मद्धम होती जा रही
और शनैः-शनैः
चिर मौन में विलीन
होती जा रही इन चंद
गिनीचुनी धड़कनों की
क्षीण सी प्रतिध्वनि को
सुन पाने की कवायद में ही
मेरे जीवन की यह संध्या भी
कहीं बीत न जाए
और उसके साथ ही
तुम्हारे दर्शन की साध भी
कहीं मेरे अंतर में ही
घुट कर न रह जाए !  
मेरे देवाधिदेव
मेरी बस इतनी सी
अभिलाषा है कि
तुम्हारे स्निग्ध कोमल
दिव्य आलोक के
कल-कल छल-छल
अजस्त्र प्रवाह में  
शिखर से मूल तक सराबोर हो
मैं अपने सहस्त्रों करपर्णों से
तुम्हें अंतिम बार
कोटिश: प्रणाम कर सकूँ
और अपने अवरुद्ध कंठ की
मर्माहत सी मर्मर ध्वनि में
अंतिम बार तुम्हारा
स्तुति गान कर
तुम्हें सुना सकूँ एवं  
अपने इस जन्म को
सफल कर सकूँ !
मेरे जीवन के ज्योतिस्तंभ
तुम्हारे पुनरागमन की
कितनी उत्कंठा के साथ
मुझे प्रतीक्षा है
इतना तो तुम
जानते हो ना ?  

साधना वैद