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Tuesday, March 16, 2010

बड़ी चली है बन कर लाट ( बाल कथा ) - 8

एक शहर में एक बिल्ली रहती थी ! एक छत से दूसरी छत पर कूदते फलांगते हुए वह पूरे शहर में घूमती रहती थी ! क़िसी घर में वह चूहे का शिकार कर लेती तो किसी घर में वह दूध मलाई पर हाथ साफ कर लेती थी ! उसका जीवन मज़े से गुज़र रहा था ! लेकिन धीरे-धीरे उम्र के साथ बिल्ली कुछ कमज़ोर होने लगी ! वह चूहा पकड़ने के लिये छलांग लगाती तो चूहा उसके हाथ से निकल भाग कर बिल में घुस जाता ! फुर्ती कम हो जाने के कारण अक्सर दूध मलाई पर भी वह अब हाथ साफ नहीं कर पाती थी ! इस वजह से वह भूखी रहने लगी !
शहर में उसका पेट भरना मुश्किल होता जा रहा था ! तब उसने शहर छोड़ कर जंगल की तरफ जाने का मन बनाया ! उसने सोचा कि जंगल का राजा तो शेर होता है और लोग बिल्ली को शेर की मौसी कहते हैं ! मैं भी जंगल के राजा शेर की मेहमान बन कर मज़े करूँगी ! बस यह सोच कर वह चल दी जंगल की ओर ! जंगल पहुँचने पर सबसे पहले उसकी मुलाकात लोमड़ी से हुई ! बिल्ली ने लोमड़ी से शेर के घर का पता पूछा !
लोमड़ी बोली, “अरे चूहे खानी बिल्ली तुझे शेर से क्या काम है ?”
बिल्ली बोली, “मैं उसकी मौसी हूँ !“
लोमड़ी को हँसी आ गई ! वह बिल्ली को डाँट कर बोली,
“चल भाग,
बड़ी चली है बन कर लाट
जा चूहे की पत्तल चाट !“
बिल्ली आगे बढ़ी ! वहाँ उसे मिला एक सियार !
बिल्ली बोली, ”मुझे शेर के घर का रास्ता बता दो !“
सियार बोला, “तुझे शेर से क्या काम है ?“
बिल्ली बोली, ”मैं उसकी मौसी हूँ ! और उससे मिलने आयी हूँ !“
सियार उसकी हँसी उड़ा कर बोला, ”अरे चूहेखानी बिल्ली ! तू और शेर की मौसी ?
चल भाग,
बड़ी चली है बन कर लाट !
जा चूहे की पत्तल चाट !“
आगे जंगल में उसे एक भेड़िया मिला ! बिल्ली ने उससे भी शेर के घर का पता पूछा !
भेड़िया बोला, “तुम्हें हमारे जंगल के राजा से क्या काम ?“
बिल्ली ने उसको भी यही बताया, ”मैं तो उसकी मौसी हूँ ! और उससे मिलने आयी हूँ !“
भेड़िया बोला, ”हट झूठी !
चल भाग,
बड़ी चली है बन कर लाट
जा चूहे की पत्तल चाट !“
ऐसे ही भटकते-भटकते बिल्ली को लकड़बग्घा, भालू और कई सारे जानवर मिले जिनसे उसने शेर के घर का पता पूछा पर किसीने भी उसे शेर का पता नहीं बताया और 'चूहेखानी बिल्ली' कह कर उसका खूब मज़ाक उड़ाय़ा ! तभी थकी और भूखी प्यासी बिल्ली को झाड़ी में छिपी हुई एक चिड़िया दिखाई दी ! उसने झपट्टा मार कर चिड़िया को दबोच लिया और उससे शेर के घर का पता पूछा ! डरी हुई चिड़िया ने बिल्ली को शेर की माँद का सही ठिकाना बता दिया ! बिल्ली चिड़िया को पकड़े हुए उस तरफ चल दी ! जब वह शेर के घर के बिल्कुल पास पहुँच गयी तो चिड़िया को उसने छोड़ दिया और दरवाज़े को डरते-डरते धीरे से खटखटाया ! अंदर से शेर दहाड़ा, ”कौन है ?“
हिम्मत करके बिल्ली बोली, “मैं ! तुम्हारी मौसी !“
शेर बोला, ”मौसी ? कौन मौसी ?“
बिल्ली बोली, ”बेटा बाहर तो आओ ! मैं तुमसे मिलने आई हूँ !“
शेर बाहर निकल कर आया और चारों तरफ देखने लगा ! उसे कोई दिखाई ही नहीं दिया ! तभी नीचे उसके पैरों के पास से आवाज़ आई, “बेटा मैं तो यहाँ पर हूँ !”
अब शेर ने बिल्ली को देखा तो दुविधा में पड़ गया !
हैरानी से बोला, “अरे, इतनी छोटी ? और मेरी मौसी ? मेरी तो कोई मौसी ही नहीं है !“
बिल्ली चालाकी से बोली, “शेरू बेटे जब तुम बहुत छोटे थे तब मैं दुनिया की सैर पर निकल गयी थी ! अब जाकर इतने सालों बाद लौटी हूँ ! वहाँ पर मैने सब जगह तुम्हारे जंगलराज की बहुत तारीफ सुनी इसीलिये मैं सीधे तुमसे मिलने आयी हूँ !”
शेर को अभी भी विश्वास नहीं हो रहा था !
वह बोला, “पर ऐसा कैसे हो सकता है मौसी ? मैं तो इतना बड़ा और तुम इतनी छोटी सी ?“
बिल्ली रुआँसी होकर बोली, ”शेरू बेटे इतने दिनों से चलते-चलते मैं घिस गयी हूँ ! देखो ना मैं कितनी दुबली हो गयी हूँ और मैं भूखी भी हूँ ! अब मैं कुछ दिन तुम्हारे साथ रहना चाहती हूँ !“
बिल्ली की बात सुन शेर को भी दया आ गयी ! वह बोला, ”अरे-अरे मौसी बाहर क्यों खड़ी हो ! अन्दर आओ ! पलंग पर बैठो ! मैं आपके लिये सेवकों से भोजन मँगवाता हूँ !“
बिल्ली को तो मज़े आ गये ! वह आराम से पलंग पर पसर गयी और छक कर मनपसन्द खाना खाया ! शेर के घर में सेवकों पर उसका हुकुम चलने लगा और वह रोज़ तरह-तरह के पक्वान उड़ाने लगी ! बिल्ली के कुछ दिन इसी तरह ऐश के साथ बीत गये और वह मोटी भी होने लगी ! अब बिल्ली ने उन जानवरों से बदला लेने का मन बनाया जिन्होंने उसे शेर के घर का रास्ता ना बता कर उसका मज़ाक उड़ाया था ! बिल्ली थी तो पूरी नाटकबाज ! एक दिन वह सिर पर पट्टी बाँध पलंग पर लेट गयी और ज़ोर से हाय-हाय करने लगी !
शेर ने पूछा, ”मौसी क्या हो गया ?“
बिल्ली बोली, “बेटा बहुत ज़ोर से सिर में दर्द हो रहा है !“
शेर ने कहा, ”मैं अभी डॉक्टर या वैद्य को बुलाता हूँ !“
बिल्ली बोली, ”नहीं नहीं ! यह तो पुरानी बीमारी है ! इसका तो कुछ दूसरा ही इलाज होता है !“
शेर ने कहा, ”मौसी जल्दी बताओ क्या इलाज है !“
बिल्ली बोली, ”भेड़िये को बुलाओ और उसकी पूँछ काट कर मेरे माथे पर रखो तभी यह दर्द बंद होगा !“
शेर ने फौरन भेड़िये को बुलवाया और अपने सेवकों से कहा, ”इसकी पूँछ काट के मौसी को दे दो !“
भेड़िया बोला, ”महाराज यह कोई मौसी वौसी नहीं है ! यह तो चूहेखानी बिल्ली है !“
शेर ने डपट कर कहा, ”बको मत ! सेवकों इसकी पूँछ फौरन काटी जाये !“
बेचारे भेड़िये की पूँछ काट कर मौसी को दे दी गयी !
बिल्ली पूँछ सिर पर रख कर बोली, “आहा ! कितना आराम हो गया ! अब मैं बिल्कुल ठीक हूँ !“ और मज़े से बैठ गयी और सेवकों से बोली, “अब मेरा खाना ले आओ !”
थोड़े दिन इसी तरह और बीत गये ! एक दिन फिर वह पट्टी बाँध कर हाय-हाय करने लगी !
शेर बोला, ”मौसी आज यह दर्द कैसे ठीक होगा ?“
बिल्ली बोली, ”बेटा आज तो लकड़बग्घे की पूँछ कटेगी !“
लकड़बग्घे को बुलाया गया ! वह हाथ जोड कर बोला, ”हज़ूर यह चालाक चूहेखानी बिल्ली आपको धोखा दे रही है ! यह कोई मौसी वौसी नहीं है !“
शेर बोला, “बको मत ! चुपचाप बैठ जाओ !“ और उसकी भी पूँछ काट कर बिल्ली को दे दी गयी जिसे सिर पर रख कर बिल्ली बोली, “अब मैं बिल्कुल ठीक हूँ ! अब मेरा खाना ले आओ !“
इसी तरह बिल्ली खूब मज़े उड़ाती रही और हर दो चार दिन के बाद सिर दर्द का बहाना बना कर उन जानवरों की पूँछ कटवाती रही जिनसे उसे बदला लेना था ! जंगल में धीरे-धीरे पूँछ कटे जानवरों की संख्या बढ़ती जा रही थी ! एक दिन बिल्ली ने अपने सिर दर्द के इलाज के लिये लोमड़ी की पूँछ माँगी ! शेर ने लोमड़ी को बुलाने के लिए सेवकों को उसके घर भेजा ! लोमड़ी तो बहुत चालाक होती है ! उसे पता था कि एक दिन उसका भी नम्बर आ सकता है ! तैयारी के लिये उसने कुछ चूहे पाल रखे थे ! वह एक चूहे को अपने साथ छिपा कर शेर के पास पहुँची ! पहले उसने शेर को नमस्कार किया फिर बिल्ली से बोली, ”चूहेखानी जी नमस्कार !“
शेर ने लोमड़ी को डाँटा, ”मेरी मौसी का मज़ाक उड़ाती है ! उसे चूहे खानी बताती है ! यह क्या बिल्ली है ? यह तो मेरी मौसी है !“
लोमड़ी बोली, ”हज़ूर यह बिल्ली ही है !” ऐसा कह कर उसने अपना चूहा बिल्ली के सामने छोड़ दिया ! इतने दिनों बाद अपना मनपसंद भोजन देख कर बिल्ली के मुँह में पानी आ गया और उसने झपट्टा मार कर चूहे को पकड़ लिया और वहीं सबके सामने उसे खाने लगी !
लोमड़ी बोली, ”देख लीजिये ह्ज़ूर इस चूहेखानी बिल्ली को ! अब तो आपको सबूत मिल गया ?“
शेर भौंचक्का रह गया !
वह दहाड़ कर बोला, ”लोमड़ी को छोड़ो और इस मक्कार बिल्ली को पकड़ो !”
बिल्ली को फौरन पकड़ लिया गया ! शेर सोचने लगा मेरे साथ इतनी बड़ा धोखा ! इसकी अक्ल तो ठीक करनी ही चाहिये ! इसे क्या सज़ा दूँ जो यह याद रखे !
तभी लोमड़ी ने सलाह दी, ”हज़ूर इसने सबकी पूँछ कटवाई है ! अब इसकी भी पूँछ कटवा कर इसे जंगल से बाहर निकाल दिया जाये !“ इस तरह से धोखेबाज़ बिल्ली अपनी पूँछ गँवा कर वापिस अपने पुराने शहर में लौट आई ! जहाँ उसका खूब मज़ाक उड़ाया गया ! सब उसे ‘दुमकटी मौसी’ कह कर चिढ़ाते और पूछते, “यह तो बताओ मौसी शेर ने तुम्हें क्या-क्या माल खिलाये !“
बेचारी बिल्ली खिसिया के रह जाती ! गली के बच्चे उसे चिढ़ाते,
“चली थी खाने दूध मलाई
पूँछ गँवा कर वापिस आई !“

साधना