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Wednesday, March 3, 2010

चलो चलें माँ .... ( एक लघु कथा )

नन्हा लंगूर डिम्पी अपने कान में उंगली डाले ज़ोर ज़ोर से चीख रहा था ! जिस पेड़ पर उसका घर था उसके नीचे बहुत सारे बच्चे होली के रंगों से रंगे पुते ढोल बजा बजा कर हुड़दंग मचा रहे थे ! कुछ बच्चों के हाथ में कुल्हाड़ी थी तो कुछ के हाथ में धारदार बाँख ! ये सब होली जलाने के लिये लकड़ी जमा करने निकले थे ! डिम्पी डर से थर थर काँप रहा था ! डिम्पी की आवाज़ सुन दूर से लम्बी लम्बी छलांगे भर पल भर में उसकी माँ उसके पास पहुँच गयी और ज़ोर से उसे अपनी छाती से चिपटा लिया ! बच्चों का हुजूम देख माँ के माथे पर भी चिंता की लकीरें उभर आयी थीं !
सहमे डिम्पी ने माँ के गले लग पूछा, “ माँ क्या ये फिर से हमारा घर तोड़ देंगे ? अब हम किधर जायेंगे ? माँ पहले हम कितने खुश थे ! शहर के पास वाले जंगल में जहाँ हमारा घर था वहाँ मैं अपने दोस्तों के साथ कितना खेलता था ! वहाँ कितने सारे पेड़ थे ! हम सब सारे पेड़ों पर कितनी धमाचौकड़ी मचाते थे ! लेकिन एक दिन वहाँ कुछ लोग आये ! ज़मीन की नाप जोख हुई और पता चला कि वहाँ कोई कॉलेज बनाया जायेगा ! उसके बाद एक दिन बहुत सारे लोगों ने आकर वहाँ के सारे पेड़ काट डाले ! हम लोगों के घर भी उजड़ गये ! हम शहर से और दूर वाले जंगल में चले गये ! मेरे सारे दोस्त बिछड़ गये लेकिन फिर भी हम वहाँ मन लगा रहे थे कि कुछ दिनों के बाद फिर से वही सब कुछ दोहराया जाने लगा ! पता चला इस बार वहाँ रिहाइशी कॉलॉनी बनायी जा रही थी जो अपने आप में एक शहर की तरह थी ! इसमें स्कूल, पार्क, अस्पताल, स्वीमिंग पूल, शॉपिंग मॉल सब बनाये जाने वाले थे ! एक बार फिर हमारे घर बहुत बड़े पैमाने पर उजाड़े गये ! इतने बड़े अभियान के लिये दूर दूर तक जंगल साफ कर दिये गये ! क्यों माँ ये इंसान कभी अपने घर के लिये, कभी अपने घर के खिड़की दरवाज़ों के लिये, कभी फर्नीचर के लिये तो कभी कॉपी किताबों के लिये तो कभी मरने के बाद श्मशान में लाशों को जलाने के लिये हमसे पूछे बिना हमारे घर क्यों उजाड़ देते हैं ? क्या इनकी सारी ज़रूरतें हमारे घरों से ही पूरी होती हैं ? हम कभी भूले भटके इनके घर के बगीचे में घुस जाते हैं तो ये बम पटाखे पत्थर डंडे सब लेकर हम पर क्यों पिल पड़ते हैं माँ ? ये हमारे सारे खाने पीने के साधन वाले पेड़ अपनी ज़रूरत के लिये काट डालते हैं और हम अगर इनके घर से एक केला भी उठा लें तो ये हमें पकड़वाने के लिये नगर निगम तक शिकायत लेकर क्यों पहुँच जाते हैं माँ ? क्या इंसानों की तरह हम वन्य जीव अपने बुनियादी अधिकारों के लिये नहीं लड़ सकते ? सबसे होशियार माने जाने वाले इंसान की सोच इतनी तंग और छोटी क्यों होती है माँ ? तुम बताओ माँ क्या कहीं कोई जगह ऐसी है जहाँ हम इस आतंकी इंसान के अत्याचारों से बच कर सुकून से रह सकें ? जहाँ यह स्वार्थी इंसान अपनी ज़रूरतों के लिये हमारी शांत सुकून भरी ज़िन्दगी में खलल न डाल सके और मैं चैन से तुम्हारी गोद में सो सकूँ ?
“ चलो चलें माँ सपनों के गाँव में
काँटों से दूर कहीं फूलों की छाँव में ! ”


साधना वैद