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Tuesday, March 22, 2011

हैरान हूँ

हैरान हूँ
सदियों से
मुठ्ठी में बंद
यादों के स्निग्ध,
सुन्दर, सुनहरे मोती
अनायास ही अंगार की तरह
दहक कर
मेरी हथेलियों को
जला क्यों रहे हैं !

अंतरतम की
गहराइयों में दबे
मेरे सुषुप्त ज्वालामुखी में
घनीभूत पीड़ा का लावा
सहसा ही व्याकुल होकर
करवटें क्यों
बदलने लगा है !

वर्षों से संचित
आँसुओं की झील
की दीवारें सहसा
कमज़ोर होकर दरक
कैसे गयी हैं कि
ये आँसू प्रबल वेग के साथ
पलकों की राह
बाहर निकलने को
आतुर हो उठे हैं !

मेरे सारे जतन ,
सारे इंतजाम ,
सारी चेष्टाएं
व्यर्थ हुई जाती हैं
और मैं भावनाओं के
इस ज्वार में
उमड़ते घुमड़ते
लावे के साथ
क्षुद्र तिनके की तरह
नितांत असहाय
और एकाकी
बही जा रही हूँ !

क्या पता था
इस ज्वालामुखी को
इतने अंतराल के बाद
इस तरह से
फटना था और
मेरे संयम,
मेरी साधना,
मेरी तपस्या को
यूँ विफल करना था !


साधना वैद