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Sunday, April 10, 2011

कुछ तो बोलो

The world suffers a lot
Not because of the
violence of bad people
but because of the
silence of good people.

जिसने भी लिखा है कितना सही लिखा है ना ! वास्तव में हमारे दुखों का कारण हमारी चुप्पी है ! हम अपने आसपास घटित होने वाली अवांछनीय गतिविधियों के प्रति जिस तरह से निस्पृह और तटस्थ रहने लगे हैं इसी की वजह से असामाजिक तत्वों के हौसले मजबूत होते हैं और वह सब कुछ जो नहीं होना चाहिये अबाध गति से होता रहता है ! जो बुरे लोग हैं वे तो बुरा करेंगे ही लेकिन जो अच्छे हैं वे खामोश रह कर ऐसा होने देते हैं उसे रोकने के लिये कुछ नहीं करते इसीका खामियाजा बाकी सबको भुगतना पड़ता है !
जब हम सब कुछ जानते समझते हुए भी आँखें मूँदे रहना चाहते हैं तो हमें शिकायत करने का भी कोई अधिकार नहीं है ! कहीं ना कहीं परोक्ष रूप से उन असामाजिक अनैतिक गतिविधियों के घटित होने में हम भी थोड़े बहुत ज़िम्मेदार तो हो ही जाते हैं ! क्योंकि ना तो हम अपना विरोध ही दर्ज करा रहे हैं और ना ही हम उन्हें रोकने के लिये कोई उपाय ही कर रहे हैं ! सोचिये क्या अपने आसपास के परिवेश को अपराधमुक्त रखने के लिये हमारा कोई कर्तव्य, कोई प्रतिबद्धता नहीं होनी चाहिये ?
राह चलते हुए मैंने कई बार छोटे-छोटे बच्चों को जुआ खेलते हुए देखा है, अपने से छोटे बच्चों को बेरहमी से पीटते हुए देखा है ! जब भी ऐसा होते हुए देखती हूँ मैं खुद को रोक नहीं पाती और उन बच्चों के साथ अक्सर उलझ पड़ती हूँ ! जानती हूँ हमारा देश गरीब है ! निर्धन बस्तियों में रहने वाले बच्चों के पास खेलने के लिये स्थान नहीं होता ! माता पिता जीवन की आपाधापी में इतने संघर्षरत रहते हैं कि उनके पास यह देखने का भी वक्त नहीं रहता कि उनके बच्चे दिन भर क्या करते हैं और कैसी गतिविधियों में लीन रहते हैं ! यदि उनके पास वक्त नहीं है तो क्या हमें भी अपनी आँखें बंद कर लेनी चाहिये ? क्या आपराधिक गतिविधियों में लिप्त यही बच्चे बड़े होकर शातिर अपराधी बन कर समाज के लिये और अधिक खतरनाक साबित नहीं होंगे ? और आज जब हम उन्हें रोकते नहीं हैं तो क्या कहीं उनके इस नैतिक पतन के लिये हम भी उत्तरदायी नहीं हैं ?
सरे राह चलते हुए बदमाश लड़के लड़कियों को छेड़ते हैं, किसीका पर्स छीन लेते हैं, किसीका सामान चुराते हैं, किसीके साथ मारपीट करते हैं और हम यह सब देख कर निगाहें चुरा कर चुपचाप निकल जाते हैं ! जब हम यह सब जानबूझ कर होने दे रहे हैं तो महात्माओं की तरह समाज के इस पतन पर मगरमच्छी आँसू बहाने का भी हमें कोई अधिकार नहीं है ! मेरा कहने का तात्पर्य यह कतई नहीं है कि क़ानून अपने हाथ में लेकर हमें सरे राह झगड़े निपटाने के कार्य में लग जाना चाहिये लेकिन इतना कहना अवश्य चाहती हूँ कि आप अगर कुछ भी गलत होता हुआ देखें तो कृपया चुप ना रहें उसे रोकने के लिये अपनी आवाज़ ज़रूर उठायें !
Whistle blowing की आवश्यकता आज हर जगह है ! वह चाहे हमारा घर हो , हमारा मोहल्ला हो, हमारा शहर हो या हमारा देश ! अपनी आँखों के सामने गलत बातों की घटित ना होने दें अपनी आवाज़ उठायें, अपना विरोध दर्ज करायें और अपनी सम्पूर्ण क्षमता और शक्ति से उस गलत को होने से रोकें तभी हम एक स्वस्थ और अपराधमुक्त समाज में रहने का स्वप्न साकार कर सकेंगे !

साधना वैद