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Thursday, March 15, 2012

कसक













कैसा लगता है
जब गहन भावना से परिपूर्ण
सुदृढ़ नींव वाले प्रेम के अंतर महल को
सागर का एक छोटा सा ज्वार का रेला
पल भर में बहा ले जाता है ।

क़ैसा लगता है
जब अनन्य श्रद्धा और भक्ति से
किसी मूरत के चरणों में झुका शीश
विनयपूर्ण वन्दना के बाद जब ऊपर उठता है
तो सामने न वे चरण होते हैं और ना ही वह मूरत ।

क़ैसा लगता है
जब शीतल छाया के लिये रोपा हुआ पौधा
खजूर की तरह ऊँचा निकल जाता है
जिससे छाया तो नहीं ही मिलती उसका खुरदरा स्पर्श
तन मन को छील कर घायल और कर जाता है ।

कैसा लगता है
जब पत्तों पर संचित ओस की बूंदों की
अनमोल निधि हवा के क्षणिक झोंके से
पल भर में नीचे गिर धरा में विलीन हो जाती हैं
और सारे पत्तों को एकदम से रीता कर जाती हैं ।

साधना वैद

24 comments :

  1. एक सुखद आध्यात्मिक अनुभूति।

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  2. इस कसक पर क्या लिखूँ ?

    सोच रही हूँ बस .... सागर का छोटा सा ज्वार गर बहा ले गया प्रेम के अंतरमहल को तो सुदृढ़ नीव पर ही हमला हुआ होगा ....अनन्य श्रद्धा और भक्ति जहां हो वहाँ तो मुंदे नयनो से भी मोहनी सूरत नज़र आ जाती है ...और आज के जमाने में बच्चों को तो शीतल छायादार वृक्ष समझने की भूल नहीं ही करनी चाहिए ...

    और ओस की बूंद के समान भावनाएं भी क्षणिक प्रहारों से लुप्त हो मन को रीता कर जाती हैं ....

    मन को छूती हुई सशक्त रचना .....

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  3. बहुत गहरे भाव छिपे हैं रचना में बधाई|
    मेरी पुस्तक "अनकहा सच" कल छप कर आगई है |उसका विमोचन दिनांक ३१.३.२०१२ को रखा है |सपरिवार आमंत्रण |
    आशा

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  4. bahut hi gahri kavita hain,
    nice poem

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  5. क़ैसा लगता है
    जब अनन्य श्रद्धा और भक्ति से
    किसी मूरत के चरणों में झुका शीश
    विनयपूर्ण वन्दना के बाद जब ऊपर उठता है
    तो सामने न वे चरण होते हैं और ना ही वह मूरत ।


    बहुत सुन्दर साधना जी...
    विश्वास का टूटना कैसा लगता है इससे शब्दों में भला कैसे व्यक्त करें...

    सादर.

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  6. bahot bura lagta hai......lekin kavita behad achchi hai.....

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  7. क़ैसा लगता है
    जब अनन्य श्रद्धा और भक्ति से
    किसी मूरत के चरणों में झुका शीश
    विनयपूर्ण वन्दना के बाद जब ऊपर उठता है
    तो सामने न वे चरण होते हैं और ना ही वह मूरत । ... बस एक अनकही स्तब्द्धता और मंथन

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  8. कैसा लगता है ……………ये कसक ………उफ़ निशब्द कर दिया आपकी इस रचना ने ।

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  9. कल 17/03/2012 को आपकी यह पोस्ट नयी पुरानी हलचल पर लिंक की जा रही हैं.आपके सुझावों का स्वागत है .
    धन्यवाद!

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  10. पल भर में नीचे गिर धरा में विलीन हो जाती हैं
    और सारे पत्तों को एकदम से रीता कर जाती हैं ।
    पढकर सुखद आध्यात्मिक अनुभूति महसूस किया..

    MY RESENT POST...काव्यान्जलि ...: तब मधुशाला हम जाते है,...

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  11. कैसा लगता है
    जब पत्तों पर संचित ओस की बूंदों की
    अनमोल निधि हवा के क्षणिक झोंके से
    पल भर में नीचे गिर धरा में विलीन हो जाती हैं
    और सारे पत्तों को एकदम से रीता कर जाती हैं ।
    बहुत सुंदर भाव ....

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  12. बहुत सुंदर अभिव्यक्ति !

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  13. बहुत सुंदर-अद्भुत ..

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  14. बहुत बुरा लगता है।

    ### इम्यून सिस्टम को मज़बूत बनाता है पावन वैवाहिक प्रेम
    http://blogkikhabren.blogspot.com/

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  15. कैसा लगता है- ये कि सारी चीज़ों का अंत निश्चित है, फिर भी उन्ही थोड़ी थोड़ी जिंदगियों में खूबसूरती है, जो जितना चाहे सराह ले!
    सुन्दर, प्रभावशाली पोस्ट.
    सादर

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  16. जब सपनों के महल धराशायी होते हैं ...जब विश्वास टूटते हैं ..जब किसीको खो देने का दुःख , एक खोह बना देता है भीतर ....वह पीड़ा सिर्फ अपनी होती है ....
    ..गहरे पैठती रचना !

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  17. अद्भुत कविता है साधना जी हर पंक्ति हर शब्द लाजबाब !
    ........
    क़ैसा लगता है
    जब अनन्य श्रद्धा और भक्ति से
    किसी मूरत के चरणों में झुका शीश
    विनयपूर्ण वन्दना के बाद जब ऊपर उठता है
    तो सामने न वे चरण होते हैं और ना ही वह मूरत ।

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  18. बहुत अच्छी प्रस्तुति!

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  19. सच बड़ा दुःख होता है जब जब शीतल छाया के लिये रोपा हुआ पौधा
    खजूर की तरह ऊँचा निकल जाता है जिससे छाया तो नहीं ही मिलती उसका खुरदरा स्पर्श तन मन को छील कर घायल और कर जाता है ...लेकिन उम्मीद है कि साथ ही नहीं छोड़ती आखिर इतने प्यार से उसकी देखभाल कि उसे सींचा तो क्या उसे लगाव नहीं होता हमसे?? मन को गहरे तक छू रहे हैं आपके शब्द... आभार...

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  20. आपको ये मैं बड़े हर्ष के साथ सूचित कर रही हूँ की आपकी पोस्ट आज की ब्लोगर्स मीट वीकली (३५) में शामिल की गई है आप आइये और अपने अनुपम विचारों से हमें अवगत करिए /आपका सहयोग हमेशा इस मंच को मिलता रहे यही कामना है /आभार /लिंक है
    http://hbfint.blogspot.in/2012/03/35-love-improves-immunity.html

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  21. बहुत ही गहन भाव लिए उत्‍कृष्‍ट अभिव्‍यक्ति ।

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  22. क़ैसा लगता है
    जब शीतल छाया के लिये रोपा हुआ पौधा
    खजूर की तरह ऊँचा निकल जाता है
    जिससे छाया तो नहीं ही मिलती उसका खुरदरा स्पर्श
    तन मन को छील कर घायल और कर जाता है ।

    .... गहन चिंतन...बहुत सुंदर प्रस्तुति..

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  23. gahen tulantamak upmaao aur bimbo se saty ko ukerti, sacchayi ka pardafash karti utkrisht rachna.

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