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Wednesday, March 21, 2012

सूर्यास्त


मैं धरा हूँ

रात्रि के गहन तिमिर के बाद

भोर की बेला में

जब तुम्हारे उदित होने का समय आता है

मैं बहुत आल्हादित उल्लसित हो

तुम्हारे शुभागमन के लिए

पलक पाँवड़े बिछा

अपने रोम रोम में निबद्ध अंकुरों को

कुसुमित पल्लवित कर

तुम्हारा स्वागत करती हूँ !

तुम्हारे बाल रूप को अपनी

धानी चूनर में लपेट

तुम्हारे उजले ओजस्वी मुख को

अपनी हथेलियों में समेट

बार बार चूमती हूँ और तुम्हें

फलने फूलने का आशीर्वाद देती हूँ !

लेकिन तुम मेरे प्यार और आशीर्वाद

की अवहेलना कर

अपने शौर्य और शक्ति के मद में चूर

गर्वोन्नत हो

मुझे ही जला कर भस्म करने में

कोई कसर नहीं छोड़ते !

दिन चढ़ने के साथ-साथ

तुम्हारा यह रूप

और प्रखर, और प्रचंड,

रौद्र और विप्लवकारी होता जाता है !

लेकिन एक समय के बाद

जैसे हर मदांध आतातायी का

अवसान होता है !

संध्या के आगमन की दस्तक के साथ

तुम्हारा भी यह

रौरवकारी आक्रामक रूप

अवसान की ओर उन्मुख होने लगता है

और तुम थके हारे निस्तेज

विवर्ण मुख

पुन: मेरे आँचल में अपना आश्रय

ढूँढने लगते हो !

मैं धरा हूँ !

संसार के न जाने कितने कल्मष को

जन्म जन्मांतर से निर्विकार हो

मैं अपने अंतर में

समेटती आ रही हूँ !

आज तुम्हारा भी क्षोभ

और पश्चाताप से आरक्त मुख देख

मैं स्वयं को रोक नहीं पा रही हूँ !

आ जाओ मेरी गोद में

मैंने तुम्हें क्षमा किया

क्योंकि मैं धरा हूँ !

साधना वैद