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Sunday, May 6, 2012

ओ नन्हे से परिंदे !



ओ नन्हें से परिंदे
मुझे तुमसे बहुत कुछ सीखना है !

सीखना है कि
दिन भर की अपनी थकान को
सहज ही भुला तुम
अपने छोटे-छोटे से पंखों में
कहाँ से इतनी ऊर्जा भर लाते हो
कि पलक झपकते ही
आकाश की ऊँचाइयों में विचरण करते  
घने मेघों से गलबहियाँ डाल
चहचहा कर तुम ढेर सारी
बातें करने लगते हो !


सीखना है कि  
कहाँ से तुमने इतना हौसला जुटाया है
कि लगभग हर रोज़
कभी इंसान तो कभी बन्दर
तुम्हारा यत्न से सँजोया हुआ
घरौंदा उजाड़ देते हैं  
और तुम निर्विरोध भाव से  
तिनका-तिनका जोड़
पुन: नव नीड़ निर्माण के  
असाध्य कर्म में बिना कोई उफ़ किये
एक बार फिर से जुट जाते हो !

सीखना है कि
कहाँ से तुम धीर गंभीर
योगी तपस्वियों जैसी  
असम्पृक्तता, निर्वैयक्तिकता
और दार्शनिकता की चादर
ओढ़ पाते हो कि अपने 
जिन नन्हे-नन्हे चूजों की चोंच में  
दिन रात के अथक श्रम से  
एकत्रित किये दानों को चुगा कर
तुम उन्हें जीवनदान देते हो,
दिन रात चील, कौए 
गिद्ध, बाजों से उनकी 
रक्षा करते हो ,
सक्षम सशक्त होते ही
तुम्हें अकेला छोड़ वे
फुर्र से उड़ जाते हैं 
और उनके जाने के बाद भी  
निर्विकार भाव से 
बिना स्वर भंग किये
हर सुबह तल्लीन हो तुम  
उतने ही मधुर, 
उतने ही जीवनदायी,
उतने ही प्रेरक गीत 
गा लेते हो !

ओ नन्हें से परिंदे अभी
मुझे तुमसे बहुत कुछ सीखना है !

साधना वैद !