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Tuesday, May 29, 2012

मन उपवन

इन दिनों मेरे मन उपवन में
बहार अपने पूरे यौवन पर है !
ह्रदय के बीचों बीच
वर्षों से गहरी जड़ें जमाये
मेरे दुःख के अमलतास की
हर डाल पर इन दिनों
दर्द के ज़र्द पीले
गुच्छे ही गुच्छे लटक रहे हैं !
 
मेरे अंतर महल की
हर खिड़की के सहारे
मेरे मन की विवर्ण
मनोदशा को
परिभाषित सा करतीं 
श्वेत फूलों से लदी
वगनवेलिया की
मनोहारी बेलें शीर्ष तक
चढ़ गयी हैं !

नयनों से बहने को आतुर
मेरे ह्रदय सरोवर के
रक्ताश्रु गुलमोहर और
रक्त चम्पा की
हर शाख पर इन दिनों
विपुल मात्रा में सजे हुए हैं !


नहीं जानती
इनकी खुशबू तुम तक
पहुँचती भी है या नहीं
लेकिन पल भर को
अपनी आँखें बंद कर लोगे
तो मेरे अंतर की पीड़ा के
सुन्दर मनोरम संसार की
इस अनुपम सुषमा को तुम
अवश्य निरख पाओगे !

साधना वैद !