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Wednesday, June 6, 2012

कोई तो मूरत दे देते













दे डाली थीं जीने को जब इतनी साँसें
जीने का भी कोई तो मकसद दे देते ,
इन साँसों की पीर तुम्हें जो पहुँचा आये
कोई तो ऐसा हमदम कासिद दे देते ! 

आँखों में ख़्वाबों की किरचें चुभ जाती हैं
इन ज़ख्मों को कोई तो मरहम दे देते ,
अनगाई अनजानी इन बिखरी आहों को
लहराने को कोई तो परचम दे देते ! 

उन अश्कों को जो आँखों में सूख गये हैं
बह जाने का कोई तो ज़रिया दे देते ,
मन में उठते और उमड़ते तूफानों को
मिल जाने को कोई तो दरिया दे देते ! 

सदियों से तनहा-तनहा थे हम तुम दोनों ,
मिल पाने की कोई तो सूरत दे देते ,
कुछ कहते कुछ सुनते हम तुम इक दूजे से
सिजदा करने को कोई मूरत दे देते !  


साधना वैद