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Saturday, June 16, 2012

मुझे आप याद आते हैं बाबूजी !



 













जब-जब भीड़ भरी राहों पर
किसी नन्हीं बच्ची को
बड़ी शान से अपने पिता के
कन्धों पर सवार देखती हूँ
मुझे आप याद आते हैं बाबूजी !

जब-जब बच्चों को
‘अबू बैन एडम’ और ‘साम ऑफ लाइफ’
का भावार्थ समझाती हूँ
मुझे आप याद आते हैं बाबूजी !

जब-जब किसी बुज़ुर्ग को
अपनी उम्रदराज़ पत्नी के
आँचल से अपने हाथ और चेहरा
पोंछते हुए देखती हूँ
मुझे आप याद आते हैं बाबूजी !  

जब-जब ज़िंदगी के मुश्किल सवाल
मुझे पेंच दर पेंच उलझाते जाते हैं
और उनका कोई हल मुझे
सुझाई नहीं देता ,
मुझे आप याद आते हैं बाबूजी !

सच तो यह है कि
उम्र के इस मुकाम पर पहुँच कर भी
अपनी हर समस्या, हर उलझन ,
हर चिंता, हर फ़िक्र, हर परेशानी,
के निदान के लिए मुझे
आज भी सिर्फ और सिर्फ
आप ही याद आते हैं बाबूजी !

साधना वैद