जब-जब
भीड़ भरी राहों पर
किसी
नन्हीं बच्ची को
बड़ी
शान से अपने पिता के
कन्धों
पर सवार देखती हूँ
मुझे
आप याद आते हैं बाबूजी !
जब-जब
बच्चों को
‘अबू
बैन एडम’ और ‘साम ऑफ लाइफ’
का
भावार्थ समझाती हूँ
मुझे
आप याद आते हैं बाबूजी !
जब-जब
किसी बुज़ुर्ग को
अपनी
उम्रदराज़ पत्नी के
आँचल
से अपने हाथ और चेहरा
पोंछते
हुए देखती हूँ
मुझे
आप याद आते हैं बाबूजी !
जब-जब
ज़िंदगी के मुश्किल सवाल
मुझे
पेंच दर पेंच उलझाते जाते हैं
और
उनका कोई हल मुझे
सुझाई
नहीं देता ,
मुझे
आप याद आते हैं बाबूजी !
सच
तो यह है कि
उम्र
के इस मुकाम पर पहुँच कर भी
अपनी
हर समस्या, हर उलझन ,
हर
चिंता, हर फ़िक्र, हर परेशानी,
के
निदान के लिए मुझे
आज
भी सिर्फ और सिर्फ
आप
ही याद आते हैं बाबूजी !
साधना
वैद
