उस दिन बड़े सवेरे मेरा मन
मीठी सी खुशबू से महक गया
शायद मेरे मन की बगिया में
बहार आ गई थी,
मेरी आँखों में सपने जाग गए,
मेरे अधरों पर मुस्कान सज गई!
वो शायद तेरा ख़याल था
तेरे आने की आहट थी,
तेरा तसव्वुर था
या मेरी खामखयाली थी
नहीं जानती
बस जानती हूँ तो सिर्फ यह
कि मुद्दतों बाद एक आस जगी थी
एक विश्वास दृढ हुआ था
एक इंतज़ार को कुछ और
जीने की मोहलत मिल गई थी!
उस शाम बड़ी उम्मीद से
दरवाज़े पर निगाहें टिकी थीं
कान हर आहट पर
चौकन्ने हो रहे थे
लेकिन अनायास ही
तेरे कदमों की आहट पीछे मुड़ गई
और फिर धीरे-धीरे धीमी होती हुई
नेपथ्य में विलीन हो गई,
फूलों की खुशबू मंद हो गई,
सपना टूट गया,
अधरों पर चिर परिचित टीस
फिर से उभर आई और
आँखें एक निर्मम. नीरस, बेरंग
यथार्थ को झेलने के लिए
ऐसी खुलीं कि अब
किसी भी तरह
सोना ही नहीं चाहतीं!
साधना वैद
चित्र - गूगल से साभार
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