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Thursday, June 14, 2012

गिरह


कितनी कस कर बाँधा था
उसने अपने मन की
इस गिरह को
कितना विश्वास था उसे कि
यह सात जन्मों तक
नहीं खुलेगी !
लेकिन वक्त के फौलादी हाथ
कितने ताकतवर हैं
यह अनुमान वह
कहाँ लगा पाई !
सात जन्मों के लिये
जो गिरह बाँधी थी
वह चंद महीने भी
नहीं चल पाई !
प्यार की चूनर
चीर-चीर हो फट गयी
और विश्वास की
ज़र्क वर्क चादर में
चंद दिनों में ही
ना जाने कितने
पैबंद लग गये !
बेरहम दुनिया के
तीखे नश्तरों से
छलनी हुआ अपना
घायल मन और
प्यार और विश्वास
की जर्जर चिन्दियाँ
अपनी कलाइयों में लपेटे
वह बाध्य थी
एक अनजानी डगर पर
चल पड़ने के लिये
जिस पर दूर-दूर तक
किसी हमकदम के
कदमों के निशाँ
उसे नज़र नहीं आते थे
और ना ही उसे
कोई परिचित आवाज़
सुनाई देती थी
जो उसके मन को
सुकून से भर जाये !
बस उसे चलते जाना था
चलते ही जाना था  
बिना थके बिना रुके
हर क्षण हर पल
एक अंतहीन सफर पर !


साधना वैद !