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Sunday, June 24, 2012

कुछ तो कहो


उँगलियों की
शिथिल पकड़ से
सब्र के आँचल का
रेशमी सिरा
छूटता सा जाता है !
एक बाँझ प्रतीक्षा का
असह्य बोझ
हताशा से चूर
थके मन पर
बढ़ता सा जाता है !
सुकुमार सपनों की
आशंकित अकाल
मृत्यु का शोक
पलकों के बाँध तोड़
आँसुओं के सैलाब में
बहता सा जाता है !
मुझे कब तक
अपने अवसन्न अधरों पर
तुम्हारे स्वागत के लिए
स्वरबद्ध किये  
सदियों पुराने गीतों को
दोहराते हुए
बैठे रहना होगा !
अब ना तो
आवाज़ में वो कशिश बाकी है
कि एक अलाप पर
बुझे दीप जल उठें
और अन्धेरा दूर हो जाये  
ना संगीत में वो जादू है
कि एक तान पर
मेघ गगन में छा जायें
और घनघोर वृष्टि हो जाये !
कुछ तो कहो  
क्या उपाय करूँ
कि ज्वर से तप्त
इस दग्ध तन मन को
कुछ तो राहत
कुछ तो शीतलता
मिल सके !  

साधना वैद