Followers

Thursday, May 17, 2012

लकीरें














हाथों की लकीरों में
ज़िंदगी उसी तरह उलझ गयी है
जैसे बहुरंगी स्वेटर बुनते वक्त
सारी ऊनें उलझ जाती हैं और
जब तक उन्हें पूरी तरह से
सुलझा न लिया जाये
एक फंदा भी आगे बुनना
असंभव हो जाता है !
भागती दौड़ती
सुबह शामों के बीच
किसी तरह समय निकाल
स्वेटर की उलझी ऊन को तो
मैं फिर भी सुलझा लूँगी
लेकिन पल-पल दामन छुड़ा
चोरों की तरह भागती
इस ज़िंदगी ने तो
इतना वक्त भी नहीं दिया है कि
हाथों की इन लकीरों को मिटा
तकदीर की तख्ती पर कोई
नयी इबारत लिख सकूँ !
अब नसीब में जो कुछ
हासिल होना लिखा है
हाथ की इन्हीं उलझी  
लकीरों में छिपा है !
बस कोई इन लकीरों को
सुलझाने की तरकीब
मुझे बता दे !

साधना वैद