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Monday, September 3, 2012

रीता आँचल


एक पल
जीने की चाह में
हर पल मैंने
जाने कितनी
साँसें खोई हैं !

एक स्मित
पल भर को
अधरों पर खेल जाये
इसके लिये
जाने कितने घूँट
आँसुओं के
कण्ठ के नीचे  
उड़ेले हैं ! 

मात्र पल भर को
उल्लसित हो मन मयूर
झूम कर नाच ले
इसके लिये
सावन की पहली फुहार
की प्रतीक्षा में   
ना जाने कितने दिन
मैंने अपने कोमल पंख
ज्येष्ठ अषाढ़ की
तपती धूप में  
झुलसाये हैं ! 

इन क्षणिक उपलब्धियों
के खुमार को
मैंने सदा सँजो कर
अपने आँचल से
बाँध लेने की
निरर्थक चेष्टा की है ! 

क्योंकि जब-जब मैंने
सघन पीड़ा के पलों में
अपने आँचल की 
गाँठ खोल 
उन गिने चुने 
सुख के पलों को 
छू कर
अपने सुखी होने के 
भ्रम को 
मैंने जीने की 
कोशिश की है
अपने आँचल को 
तब-तब
रीता ही पाया है !

साधना वैद