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Tuesday, September 4, 2012

शिक्षक दिवस – आत्म चिंतन की महती आवश्यक्ता

शिक्षक दिवस पर उन सभी विभूतियों को मेरा हार्दिक नमन और अभिनन्दन है जिन्होंने विद्यादान के पावन कर्तव्य के निर्वहन के लिये अपना सारा जीवन समर्पित कर दिया । नि:सन्देह रूप से यह एक अत्यन्त महत्वपूर्ण और वन्दनीय कार्य है एवम् इसे वही कर सकता है जो पूर्ण रूप से निर्वैयक्तिक हो चुका हो और जिसने अपने जीवन का ध्येय ही अनगढ़ पत्थरों को तराश कर अनमोल हीरों में परिवर्तित कर देने का बना लिया हो । जैसे एक मूर्तिकार कच्ची माटी को गूँध कर अनुपम मूर्तियों का निर्माण करता है उसी तरह एक सच्चा शिक्षक बच्चों के मन मस्तिष्क की कोरी स्लेट पर पुस्तकीय ज्ञान के अलावा अच्छे संस्कार और उचित जीवन मूल्यों की परिभाषा इतनी गहराई से उकेर देता है जिसे जीवन पर्यंत कोई मिटा नही पाता । एक समाजोपयोगी व्यक्तित्व का बीजारोपण एक शिक्षक बालक के मन में बचपन में ही कर सकता है यदि यह लक्ष्य उसकी प्राथमिकताओं में शामिल हो ।
वर्तमान परिदृश्य में समर्पण का ऐसा भाव विरले महापुरुषों में ही देखने को मिलता है । आज के युग में शिक्षक सरस्वती के उपासक नहीं रह गये हैं वे तो अब लक्ष्मी की तरफ अधिक आकृष्ट हो गये हैं । शिक्षा का क्षेत्र अब व्यावसायिक हो गया है और शिक्षादान अब धनोपार्जन का अच्छा विकल्प माना जाने लगा है । शिक्षक और छात्रों में परस्पर सम्बन्ध भी अब उतने पावन और वात्सल्यपूर्ण नहीं रह गये हैं जितने होने चाहिये । वरना दण्ड देने के नाम पर बच्चों के साथ अमानवीयता की हद तक अत्याचार करने के प्रसंग सामने नहीं आते । मेरा आज का यह आलेख ऐसे ही शिक्षकों को समर्पित है जो पूरा वेतन तो वसूल कर लेते हैं लेकिन बच्चों को पढ़ाने के लिये कभी स्कूल नहीं जाते , जो बच्चों के साथ हद दर्ज़े की बदसलूकी करते हैं और उनका निजी हितों के लिये शोषण करने से ज़रा भी नहीं हिचकते , जो बच्चों के लिये दी गयी अनुदान राशि को खुद हड़प कर जाते हैं और जिन्हें बच्चों को बासी , विषाक्त भोजन खिलाते समय ईश्वर का भय भी नहीं सताता ।
क्या ऐसे शिक्षक सचमुच नमन के योग्य हैं ? क्या आज शिक्षक दिवस के दिन ऐसे शिक्षकों को चिन्हित करके उनकी सार्वजनिक रूप से भर्त्सना नहीं की जानी चाहिये ? वास्तव में शिक्षकों के आदरणीय वर्ग में कुछ ऐसे अपवाद भी घुलमिल गये हैं जिनकी अनुचित हरकतों ने सबकी छवि को धूमिल किया है ।
मेरी ऐसे शिक्षकों से विनम्र विनती है कि वे अपने कर्तव्यों को पहचानें , जिन बच्चों के व्यक्तित्व और भविष्य को सँवारने का दायित्व उन्होने स्वयम लिया है उसे पूरा करें । बच्चे बहुत कोमल होते हैं अपने शिक्षक पर उनकी अगाध श्रद्धा और विश्वास होता है इस विश्वास का वे मान रखें और कभी इसे कलंकित ना होने दें । बच्चों को इतना प्यार , इतना भरोसा और निर्भयता का वातावतण दें कि वे उनके सान्निध्य में स्वयम को सबसे सुरक्षित , सुखी और आश्वस्त महसूस करें । उन्हें अपने शिक्षक से डर ना लगे , वे बेझिझक अपने मन की गुत्थियों को उनके सामने खोल सकें और उनके सुझाये समाधानों को अपना सकें ।
आज का दिन अपने अंतर में झांकने का दिन है । आप ईमानदारी से अपने क्रियाकलापों का विश्लेषण कीजिये क्या शिक्षक दिवस के इस पवित्र दिन पर आप वास्तव में उन श्रद्धा सुमनों को पाने के योग्य हैं जिन्हें अगाध विश्वास, प्यार और भक्तिभाव के साथ आपके विद्यार्थी आपको समर्पित करते हैं ? यदि नहीं तो यही दिन है जब आप यह संकल्प ले सकते हैं कि आप इन श्रद्धासुमनों को पाने की पात्रता स्वयम में अवश्य अर्जित् करेंगे और शिक्षक तथा विद्यार्थी के पवित्र रिश्ते को कभी कलंकित नहीं होने देंगे । आज सर्वश्री डॉ.सर्वपल्ली राधाकृष्णन् जी को सविनय नमन करते हुए उनका अभिनन्दन करती हूँ जिन्होंने आदर्श गुरु शिष्य परंपरा की नींव डाली तथा ऐसे कीर्तिमान स्थापित किये कि उनका जन्मदिवस शिक्षक दिवस के रूप में मनाया जाने लगा ! ईश्वर से यही कामना है कि उनकी स्थापित की हुई इमारत की नींव डगमगाने ना पाये और इस स्वस्थ परम्परा को जिलाए रखने के लिये सभी कृत संकल्प हो जायें !

साधना वैद

10 comments :

  1. aatm chintan ko prerit karti.........shubhkamnayen

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  2. शिक्षक दिवस पर आपकी कामनाओं में मेरी भी यही दुआ है कि जिस नींव को डॉ राधकृष्णन ने डाला उसकी जिम्मेवारी सभी निभाएं

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  3. शिक्षक दिवस की बहुत२ शुभकामनाए,,,
    आत्म चिंतन करती उम्दा पोस्ट,,,,,

    RECENT POST,तुम जो मुस्करा दो,

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  4. सार्थक चिंतन .... हमारी प्रार्थना भी शामिल है ।

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  5. शिक्षक दिवस पर हार्दिक शुभ कामनाएं |
    आशा

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  6. आपकी इस प्रेरक प्रस्‍तुति के लिए हमारी भी अनंत शुभकामनाएं

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  7. bahut prerak prastuti hai lekin bhrasht shikshak kaise prerit honge jo is bhrashtachaar ka hissa ban kar lakhon rupay ka chadhava chadha kar sarkari schools me shikshak pad haansil karte hain to vaazib hai vo is kshetr ko vyaapar samjhenge aur shishyon dhano-parjan ka sadhan. jab aisi bhawna hogi to kahan aisi bhawnayane rah jayengi jisse vo vandneey aur bacche komal kusum rupi hon.

    waise to ye maatra adhik nahi hai lekin aapne sach kaha ki kuchh apwad hi gandgi failane k liye kafi hain.

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  8. बहुत गंभीरता से लिखा आपने

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