Followers

Wednesday, October 17, 2012

मैं वचन देती हूँ माँ ....



तुम मुझे संसार में
आने तो दो माँ
देख लेना
मैं सारे संसार के उजाले
तुम्हारी आँखों में भर दूँगी !
तुम मेरे पाँवों से बँधी
सोने की इस जंजीर को
बस खोल तो दो माँ
मैं क्षितिज तक की दूरी
एक निमिष मात्र में
नाप आऊँगी !
तुमने जो मेरे पंख
क़तर दिए हैं ना माँ
उन्हें थोड़ा वक्त देकर
फिर से उग तो आने दो
मैं तुम्हें वचन देती हूँ माँ
मैं अनन्त आकाश में
झिलमिलाते  
सारे सितारे तोड़ कर
तुम्हारे आँचल में
टाँक दूँगी !
तुम इस स्वर्ण पिंजर का द्वार 
ज़रा सा तो खोल दो माँ
मैं भी उस अलौकिक
माटी की दिव्य मूरत के
दर्शन करना चाहती हूँ
जिसके चरणों में
बार-बार माथा रगड़
तुम मुझे जन्म देने के
अपराध का प्रायश्चित
करना चाहती हो और
उसी माँ से बेटे का
वरदान देने की
गुहार लगाती हो !
मुझे पूरा विश्वास है माँ
इस संसार में मेरे आने से
अगर उस माँ को भी
ऐतराज़ होगा तो फिर
उसे तुम्हारा भी यहाँ होना
उतना ही नागवार गुजरा होगा !
है ना माँ ?  

साधना वैद