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Thursday, December 6, 2012

बैंकॉक --- गोल्डन बुद्धा टेम्पिल


अमेरिका जाने के दिन नज़दीक आ गए थे ! अपने बच्चों से मिलने का उत्साह, लम्बी हवाई यात्रा के लिए वज़न की सीमा रेखा और जाड़ों के भारी भरकम वस्त्रों के साथ सामान की पैकिंग से जुड़ी उठा पटक और साथ ही घर गृहस्थी के रोज़मर्रा के काम और हर रोज़ बाज़ार में कुछ न कुछ खरीदारी के चक्करों ने कई दिनों से मेरी नींद उड़ा रखी थी ! २७ तारीख की सुबह भी जल्दी उठ कर तैयार हो गयी थी दिल्ली जाने के लिए ! लेकिन पतिदेव के कुछ परम आवश्यक कामों के चलते आगरा से बाहर निकलते-निकलते दिन के बारह बज चुके थे ! इंदिरा गांधी अंतर्राष्ट्रीय हवाई अड्डे से रात २.४० पर बैंकॉक के लिए हमारी फ्लाईट थी ! २७ तारीख का भी सारा दिन कार में ही बीता ! रात का पूर्वार्ध छोटे बेटे के घर से एयर पोर्ट जाने में और सामान के चैक इन कराने की फोर्मेलिटीज़ को पूरा करने और फिर बोर्डिंग लाउन्ज की कुर्सियों पर आस पास के नज़ारों और विविध भाँति के सहयात्रियों को निहारने में बीता !
२८ तरीख की सुबह स्थानीय समय के अनुसार ८ बज कर पाँच मिनिट पर कैथे पैसिफिक की एयर बस ए ३३०-३०० ने बैंकॉक के स्वर्णभूमि हवाई अड्डे पर पंख पसार अपनी उड़ान को विराम दिया ! बैंकॉक का यह एयर पोर्ट छोटा है लेकिन बहुत सुन्दर और फ्रेंडली है ! क्राफ्ट से बाहर निकलने में, इमीग्रेशन की समस्त औपचारिकताएं पूरी करने में, हमारे दो दिन के प्रवास के लिए अस्थायी वीसा के लिए आवेदन करने में और अमेरिकी डॉलर्स को बैंकॉक की स्थानीय मुद्रा ‘भात’ में प्रत्यावर्तित करने में काफी समय लग गया ! फिर चेक इन किये हुए चारों भारी आइटम कन्वेयर बेल्ट से उठा कर एयर पोर्ट के क्लॉक रूम में रखने का विचार था ! यहाँ पर भाषा की भी समस्या आ रही थी क्योंकि कोई भी ना तो इंग्लिश ही ठीक से बोल या समझ पाता है ना ही हिन्दी ! कुछ देर तो ज़रूर लगी लेकिन साथ के पेपर्स और हाव भाव की भाषा ने सारे काम आसान कर दिये ! बैंकॉक में हमारे ट्रेवेल एजेंट ने हमारे पहले से बुक्ड होटल अमारी बुलीवर्ड तक पहुँचाने के लिये कैब और एस्कॉर्ट की व्यवस्था कर रखी थी ! बाहर आते ही हाथ में हमारे नाम का प्लेकार्ड और चहरे पर बड़ी सी मुस्कान लिये मि. वान हमारे स्वागत के लिए उपस्थित मिले ! बाहर रिमझिम बरसात हो रही थी और बहुत ही सुहावना मौसम था ! बड़ी सी वैन में हम दोनों नये शहर, नये परिवेश और नितांत नये लोगों के साथ तालमेल बैठाने के लिए स्वयं को तैयार कर रहे थे ! एयर पोर्ट से होटल काफी दूर था ! शहर की साईट सीइंग के लिये हमारा पोस्ट लंच का समय तय हुआ था ! रास्ते में ट्रेवेल एजेंट के दो रिमांडर आ चुके थे ड्राइवर के पास ! बैंकॉक में सड़कों पर ट्रैफिक बहुत रहता है और स्पीड भी कम ही होती है ! लेकिन फिर भी किसीके चहरे पर खीझ या झल्लाहट दिखाई नहीं देती ना ही कोई धैर्य खोकर दनादन हॉर्न बजाता है ! दो दिन में मैंने एक बार भी हॉर्न की आवाज़ नहीं सुनी ! होटल पहुँच कर जल्दी-जल्दी नहा धोकर तैयार हुए ! नीचे रिसेप्शन पर ट्रेवल एजेंसी के गाइड मि. पिक पोस्ट लंच साईट सीइंग के लिये हमें अपने साथ ले जाने के लिये हमारी प्रतीक्षा कर रहे थे ! यह बड़ा ही सुखद आरम्भ था !
बैंकॉक आधुनिक ऊँची-ऊँची इमारतों से सुसज्जित एक बहुत ही खूबसूरत और हरा-भरा शहर है ! हर घर, हर गली, हर बाज़ार स्वस्थ, सुन्दर, सुगन्धित फूलों से लदे पेड़ों और गमलों से आच्छादित दिखाई देता है ! लेकिन शहर की चर्चा फिर कभी ! आज आपको गोल्डन बुद्धा टैम्पिल ले जाना है सबसे पहले ! जो हमारा पहला मुकाम था और जिसकी भव्यता से मैं अभी तक अभिभूत हूँ !
गोल्डन बुद्धा का यह मंदिर बैंकॉक के चाइना टाउन के व्यस्त बाज़ार वाट त्रैमित में स्थित है ! यह विश्व में गौतम बुद्ध की एकमात्र सबसे विशाल सोने की मूर्ति है जो बुद्ध को ध्यानावस्थित भूमिस्पर्श मुद्रा में बैठे हुए दर्शाती है ! बुद्ध का दाहिना हाथ भूमि को स्पर्श कर रहा है और बाँया हाथ गोद में रखा हुआ है ! आकार में यह प्रतिमा ३.९१ मीटर्स ऊँची तथा ३.१० मीटर्स चौड़ी है ! इसकी विशेषता यह है कि यह नौ हिस्सों में बनी है जिन्हें जोड़ कर इसको यह भव्य आकार दिया गया है ! इस प्रतिमा का वज़न ५.५ टंस है ! आधार से लेकर गर्दन तक यह प्रतिमा ४०% शुद्ध सोने की बनी हुई है, ठोढ़ी से लेकर माथे तक प्रतिमा में ८०% शुद्ध सोना है और शीर्ष के बाल तथा ऊपर की चोटी ९९% शुद्ध सोने से निर्मित हैं जिनका वज़न ४५ किलोग्राम है ! यह इतनी भव्य एवं सुन्दर प्रतिमा है कि आँखें वहाँ ठहर नहीं पाती हैं और वहाँ से हटना भी नहीं चाहती हैं ! बहुत ही कलात्मक पच्चीकारी और रंगबिरंगे काँच तथा कीमती पत्थरों से सजे मंदिर के विशाल द्वार तथा अन्य सरो सामान भी हैं जो मंदिर के सौन्दर्य में कई गुना वृद्धि करते प्रतीत होते हैं !
इस प्रतिमा से जुड़ा इतिहास भी उतना ही दिलचस्प है ! माना जाता है कि यह प्रतिमा सुखोथाई शैली में बनाई गयी है ! प्रतिमा का सिर अण्डाकार है जो कि सुखोथाई शैली की विशेषता की ओर संकेत करता है ! सम्राट अशोक के बाद भारत में जब बौद्ध धर्म अपने चरम पर था तब तेरहवीं या चौदहवीं शताब्दी में इस प्रतिमा का निर्माण भारत में किया गया था ! यह भारत का स्वर्ण युग कहलाता है ! उन दिनों गौतम बुद्ध की अनेकों प्रतिमाएं बौद्ध धर्म के प्रचार प्रसार के लिए यहाँ से बनवा कर विदेशों में भेजी जा रही थीं ! ऐसी अवधारणा है कि बाद में जब अयुत्थया वंश का राज्य अपने शिखर पर आया यह मूर्ति सन् १४०३ के आस पास सुखोथाई से अयुत्थया ले जाई गयी ! कुछ इतिहासकारों का यह मानना है कि आक्रमणकारियों की गिद्ध दृष्टि से इसे बचाने के लिए किसी समय में इस पर प्लास्टर की पर्त चढ़ा दी गयी थी जिस पर विभिन्न प्रकार के सुन्दर काँच व कीमती पत्थरों से कलात्मक जड़ाई का काम कर दिया गया था ! यह कार्य सन् १७६७ में अयुत्थया वंश के अवसान से पूर्व ही कर दिया गया था तभी यह बर्मीज़ आक्रमणकारियों की नज़रों से बच गयी और अयुत्थया के खंडहर हुए मंदिरों में वर्षों तक उपेक्षित पड़ी रही ! सन १८०१ में जब थाईलैंड में राजा बुद्ध योद्फा चलुलोक ( रामा १ ) का राज्य स्थापित हुआ तब उन्होंने बैंकॉक को अपने साम्राज्य की राजधानी बनाया और यहाँ अनेकों बौद्ध मंदिर बनवाये ! अयुत्थया के खण्डहरों में उपेक्षित पड़ी बुद्ध प्रतिमाओं को बैकॉक के नव निर्मित मंदिरों में श्रद्धापूर्वक स्थापित किया गया ! उन्हीं दिनों लगभग सन् १८२४ से सन् १८५१ के बीच प्लास्टर से ढकी यह प्रतिमा भी बैंकॉक के वाट चोतनारम के मुख्य मंदिर में अयुत्थया से लाकर स्थापित की गयी !
उचित रखरखाव के अभाव में जब वाट चोतनारम का मंदिर जर्जर हो गया तो सन् १९३५ में इस प्रतिमा को वहाँ से हटा कर वाट त्रैमित के पैगोडा में लाकर रख दिया गया जहाँ वह अगले बीस वर्ष एक टिन शेड में रखी रही क्योंकि इतनी विशाल मूर्ति के लिए उपयुक्त तब कोई मंदिर नहीं था !
सन् १९५४ में जब नये विहार का निर्माण संपन्न हुआ तब यह निर्णय लिया गया कि मूर्ति को इस नये मंदिर में स्थापित कर दिया जाये ! २५ मई १९५५ को जब रस्सियों के सहारे इस विशाल मूर्ति को टिन शेड से उठा कर नये गंतव्य तक ले जाने का प्रयास किया जा रहा था मूर्ति के इतने भारी वज़न से रस्सी टूट गयी और मूर्ति नीचे गिर गयी ! नीचे गिर जाने से प्लास्टर की पर्त भी टूट गयी और अन्दर की मूर्ति की स्वर्णिम छटा अपनी पूरी भव्यता के साथ दिखाई देने लगी ! तुरंत ही काम को रुकवा दिया गया और प्लास्टर की सारी कोटिंग को धीरे-धीरे हटाया गया ! प्लास्टर हटाने की इस प्रक्रिया के दौरान पता चला की यह मूर्ति नौ हिस्सों में बनाई गयी है ! और उन हिस्सों को आपस में कसने वाली चाबी भी मूर्ति के बेस में सुरक्षित रखी हुई थी ! यह उस समय की तकनीकी दक्षता और कलात्मकता से भी हमारा परिचय करवाता है ! इस तरह से मूर्ति का अनायास अवतरित होना बौद्ध धर्म के अनुयायी दैवीय चमत्कार ही मानते हैं !
तो कहिये गोल्डन बुद्धा की कहानी है ना दिलचस्प ! आज की कथा यहीं तक ! अगली कड़ी में आपको मैं बैकॉक के एक और प्रसिद्द स्थल की सैर करवाउंगी ! बस थोड़ा सा इंतज़ार कीजिये !

साधना वैद