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Monday, December 10, 2012

कहाँ ढूँढूँ तुझे ?











कहाँ-कहाँ ढूँढूँ तुझे
कितने जतन करूँ,
किस रूप को ध्यान में धरूँ,
किस नाम से पुकारूँ,
मंदिर, मस्जिद,
गिरिजा, गुरुद्वारा
किस घर की कुण्डी खटखटाऊँ ?
किस पंडित, किस मौलवी,
किस गुरु के चरणों में
शीश झुकाऊँ
बता मेरे मौला
मैं कहाँ तुझे पाऊँ ? 

ना जाने कितने
जन्म जन्मांतरों के
पाप पुण्य के हिसाब-किताब में
पंडित जी ने उलझा दिया है
हज़ारों देवताओं में से
जाने कौन से देवता
और हज़ारों धर्म ग्रंथों में से
जाने कौन सा पुराण
मुझे सही राह दिखायेंगे
मैं आज तक भ्रमित हूँ ! 

मौलवी जी के मुश्किल मशवरे
और उनकी सख्त हिदायतें मुझे
समझ नहीं आतीं
और मैं एक कतरा
रोशनी की तलाश में
भटकते-भटकते
और गहरी तारीकियों में
डूबता जाता हूँ ! 

मेरे प्रभु,
किस गुरू की सलाह पर
अमल करूँ और
किसके चरण गहूँ ?
यहाँ तो सब
धर्म के ठेकेदार बने
अपनी-अपनी दुकानें खोले बैठे हैं !
सब लाभ हानि के
जोड़-बाकी, गुणा-भाग में
अपनी सुविधा के अनुसार
अपने इच्छित प्राप्तांक को
पाने की आशा में
खुद ही सांसारिकता के
दलदल में आकण्ठ डूबे बैठे हैं !
वो भला मुझे कैसे और कौन सी  
सच्ची राह दिखा पायेंगे !

क्या करूँ, कहाँ जाऊँ मेरे भगवन् !
अपने मन में झाँक कर
देखता हूँ तो पाता हूँ कि
तुम्हारा तो बस
एक नाम, एक रूप,
एक आकार और बस
केवल एक ही ठिकाना है
और वह है
मेरा अन्तस्तल !
जहाँ तुम्हारे दर्शन पाकर मेरी
सारी पीड़ा विलीन हो जाती है,
सारे भ्रम तिरोहित हो जाते हैं,
सारा अन्धकार मिट जाता है
और उस अलौकिक आलोक में
मेरी आँखों के सामने होती है
केवल तुम्हारी दिव्य छवि,
चहुँ ओर फैला होता है
अनुपम, अद्भुत, स्वर्गिक संगीत
और होती है अपार शान्ति,
परम संतोष एवं
हर शंका का समाधान करता
दिव्य ज्ञान का प्रकाश
जिससे मेरे मन का
हर कोना जगमगा उठता है ! 

मेरे देवता ,
यही है तम्हारा स्थायी देवालय
और मेरा मोक्षधाम ,
तुम्हारा चिरंतन शाश्वत कार्यालय
और मेरा परम धाम !


साधना वैद