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Thursday, December 13, 2012

मात्र एक शब्द










मात्र एक 'शब्द' की
घनघोर टंकार ने
उसकी समस्त चेतना को
संज्ञाशून्य कर दिया है !
उस एक शब्द का अंगार
सदियों से उसकी
अन्तरात्मा को
पल-पल झुलसा कर
राख कर रहा है !
चकित हूँ कि
बस एक शब्द 
कैसे किसी
प्रबुद्ध स्त्री के
चारों ओर
अदृश्य तीर से
हिमालय से भी ऊँची
और सागर से भी गहरी
अलंघ्य लक्षमण रेखाएं
खींच सकता है 
और कैसे किसी
शिक्षित, परिपक्व
नारी की सोच को
इस तरह से पंगु
बना सकता है कि
उसका स्वयं पर से
समस्त आत्मविश्वास,
पल भर में ही डगमगा
जाये और एक
आत्मबल से छलछलाती,
सबल, साहसी,
शिक्षित नारी की
सारी तार्किकता को
अनायास ही
पाला मार जाये !
आश्चर्य होता है की
कैसे वह स्त्री
एक निरीह बेजुबान
सधे हुए
पशु की तरह
खूँटे तक ले जाये
जाने के लिए
स्वयं ही
उस व्यक्ति के पास जा
खड़ी होती है
जिसका नाम ‘पति’ है
और जिसने
‘पति’ होने के नाते
केवल उस पर अपना
आधिपत्य और स्वामित्व
तो सदा जताया
लेकिन ना तो वह
उसके मन की भाषा
को कभी पढ़ पाया,
ना उसके नैनों में पलते   
सुकुमार सपने साकार
करने के लिए
चंद रातों की  
निश्चिन्त नींदे  
उसके लिये जुटा पाया
और ना ही उसके
सहमे ठिठके  
मन विहग की
स्वच्छंद उड़ान के लिए
आसमान का एक
छोटा सा टुकड़ा ही
उसे दे पाया !
बस उसकी एक यही
अदम्य अभिलाषा रही कि
चाहे सच हो या झूठ,
सही हो या गलत  
येन केन प्रकारेण
उसे संसार के
सबसे सबल,
सबसे समर्थ और
सबसे आदर्श ’पति’
होने का तमगा
ज़रूर मिल जाये
क्योंकि वह एक
सनातन ‘पति’ है !  

साधना वैद