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Tuesday, March 12, 2013

इक शमा रूहे रौशन जो जलती रही



 















इक शमा रूहे रौशन जो जलती रही ,
हर घड़ी याद तेरी पिघलती रही !

दर्द बढ़ता रहा, अश्क बहते रहे ,
हिज़्र की आँख से मोम ढलती रही !

हर एक फूल गुलशन का जलता रहा ,
हर कली शाख पर ही सुलगती रही !

न ख़्वाबों खयालों का था सिलसिला ,
मैं बिखरे पलों में सिमटती रही !

न था हमसफ़र ना कोई कारवां ,
यूँ ही बेनाम राहों पे चलती रही !

भूल से बाँध ली मुट्ठियों में खुशी
रेत सी उँगलियों से फिसलती रही !

तू दरिया की माफिक उमड़ता रहा ,
मैं लहरों से दामन को भरती रही !

तू फलक के नज़ारों में गुम था कहीं ,
मैं शब भर सितारों को गिनती रही ! 

कि ज़मीं से फलक तक का ये फासला ,
मैं सदियों से चढ़ती उतरती रही !


साधना वैद