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Friday, May 10, 2013

कितने कर्ज़ उतारूँ माँ..... ?













ओ माँ...
मैं तेरे कितने कर्ज़ उतारूँ ?
तूने जीने के जो लिये साँसें दीं
उसका कर्ज़ उतारूँ या फिर
तूने जो जीने का सलीका सिखाया
उसका क़र्ज़ उतारूँ !
तूने ताउम्र मेरे तन पर   
ना जाने कितने परिधान सजाये
कभी रंग कर, कभी सिल कर   
उसका क़र्ज़ उतारूँ
या फिर शर्म ओ हया की
धवल चूनर में
मर्यादा का गोटा टाँक  
जिस तरह से मेरी
अंतरात्मा को उसमें लपेट दिया   
उसका क़र्ज़ उतारूँ !
माँ तूने अपने हाथों से नित नये
जाने कितने सुस्वादिष्ट पकवान
बना-बना कर खिलाये कि
जिह्वा उसी स्वाद में गुम
आज तक अतृप्त ही है
उसका क़र्ज़ उतारूँ या फिर
जो मिला जितना मिला उसीमें
संतुष्ट रहने का जो पाठ  
तूने मुझे पढ़ाया
उसका क़र्ज़ उतारूँ !   
मासूम बचपन में जो तूने स्लेट
और तख्ती पर का ख ग घ और
एक दो तीन लिखना सिखाया
उसका क़र्ज़ उतारूँ या मेरे अंतरपट
पर अनुशासन की पैनी नोक से
जो सीख और संस्कार की
एक स्थायी इबारत तूने उकेर दी
उसका क़र्ज़ उतारूँ !
तूने माँ बन कर मुझे जिस
प्यार, सुरक्षा, और निर्भीकता के
वातावरण में जीने का अवसर दिया
उसका क़र्ज़ उतारूँ या फिर
जिस तरह से मेरे व्यक्तित्व में
माँ होने के सारे तत्वों को ही
समाहित कर मुझे एक अच्छी माँ
बनने के लिये तैयार कर दिया
उसका क़र्ज़ उतारूँ !
माँ... यह एक ध्रुव सत्य है कि
तेरे क़र्ज़ मुझ पर अपरम्पार हैं
जितना उन्हें उतारने का
प्रयास मैं करूँगी
मेरे पास बची अब थोड़ी सी
समय सीमा में
तेरे ऋण से उऋण होने का
मेरा यह उपक्रम
अधूरा ही रह जायेगा !
उस परम पिता परमेश्वर से
बस इतनी ही प्रार्थना है कि
अपने बच्चों की माँ होने के लिये
यदि वह मुझमें तेरे व्यक्तित्व का
हज़ारवाँ अंश भी डाल देगा
तो मेरा माँ होना सफल हो जायेगा
और शायद तुझे भी
वहाँ स्वर्ग में मुझ पर
अभिमान करने की कोई तो
वजह मिल ही जायेगी !
है ना माँ ... !

साधना वैद