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Friday, August 8, 2014

डकाऊ कंसंट्रेशन कैम्प





अपने ब्लॉग पर विविध रंग और मिजाज़ की अनेकों रचनाएं मैंने अपने पाठकों के सामने प्रस्तुत की हैं ! लेकिन आज जिस स्थान के बारे में मैं आपको बताने जा रही हूँ वह वर्षों बाद आज भी देखने वालों को गहरी उदासी में डुबो जाता है और उस गुज़रे वक्त की लोमहर्षक दास्तानें आज भी सुनने वालों के रोंगटे खड़े कर जाती हैं ! जी हाँ,  यह स्थान है ‘डकाऊ 
कंसंट्रेशन कैम्प’ जो जर्मनी में म्यूनिख से लगभग सोलह किलोमीटर की दूरी पर स्थित है और हिटलर के शासन काल में लगभग 12 वर्षों तक असंख्य यहूदियों और राजनैतिक कैदियों को अमानवीय यंत्रणाएं देने के लिये तथा गैस चैंबर में उनकी निर्मम रूप से ह्त्या कर देने के प्रयोजन के लिये प्रमुख केन्द्र रहा है !

 सन् 2006 के नये वर्ष का पहला दिन था ! हमें डकाऊ कंसंट्रेशन कैम्प देखने के लिये ट्रेन से जाना था ! सुबह जल्दी तैयार होकर हम हौपबन्हौफ़ मेट्रो स्टेशन पहुँचे ! साफ़ सुथरा प्लेटफार्म देख कर मन प्रसन्न हो गया ! एस-बैन ट्रेन पकड़ कर हम 10-15 मिनिट्स में ही कन्संट्रेशन कैम्प साईट के स्टेशन पर पहुँच गये ! उस अति आधुनिक और खूबसूरत ट्रेन में बैठना भी एक सुखद अनुभव था ! कैम्प साइट पर हर तरफ़ बर्फ ही बर्फ़ का साम्राज्य था ! आसपास के पेड़ जड़ से शिखर तक बर्फ से ढके थे ! बाहर सडकों पर हाड़ कँपा देने वाली ठण्ड पड़ रही थी लेकिन यह तो सभी को विदित है कि वहाँ बस, ट्रेन तथा सारी इमारतें वातानुकूलित होती हैं ! तापमान ज़ीरो डिग्री से भी कई अंक नीचे था ! स्टेशन से 726 नंबर की बस पकड़ कर हम कैम्प साईट पर पहुँच गये !  

                                                                                            


डकाऊ नाम के एक छोटे से गाँव के पास प्रथम विश्व युद्ध के समय गोला बारूद एवं अन्य युद्ध सामग्री तैयार करने वाली वीरान पड़ी एक फैक्ट्री के 300 x 600 मीटर्स के विशाल भू भाग पर 22 मार्च सन् 1933 में हिटलर के कहने पर म्यूनिख के पुलिस चीफ हेनरिक हिमलर ने इस कन्संट्रेशन कैम्प को तैयार किया ! जर्मनी में राजनैतिक कैदियों के लिए खोला जाने वाला यह पहला नाज़ी कंसंट्रेशन कैम्प था ! इसके बड़े से लोहे के गेट पर लिखा हुआ है “ Arbeit macht frei “ जिसका अर्थ है ‘श्रम आपको स्वतन्त्रता दिलाएगा’ ! ज़ाहिर है कि प्रत्यक्ष रूप से कैदी यहाँ पर कैम्प साईट को और विस्तार देने के लिए मजदूर की तरह काम कराने के उद्देश्य से लाये जाते थे लेकिन परोक्ष रूप से यह कैम्प उन्हें अमानवीय यंत्रणायें देने तथा निर्ममता से उनकी ह्त्या कर देने के काम में आता था ! यह वाक्य उन बेबस कैदियों के लिये, जिनको यहाँ से जीवित वापिस भेजा जाना ही नहीं था, एक बहुत ही घिनौने मज़ाक की तरह था ! मरणोन्मुख व्यक्ति को यह उम्मीद दिलाना कि अगर वह जी तोड़ मेहनत करेगा तो शायद उसकी जान बच जायेगी, जर्मन अधिकारियों की क्रूरता और शातिर सोच को उजागर करता है ! ज़रा सोचिये किस तरह छल करके वे निर्दोष कैदियों को अकाल मृत्यु के द्वार तक ढकेलने से पहले पूरी तरह से निचोड़ लिया करते थे ! 
  

इस कैम्प में पहली बार 200 कैदी लाये गये थे ! लेकिन यहाँ पर 5000 कैदियों के रहने की व्यवस्था थी ! पहले यहाँ केवल राजनैतिक कैदी तथा हिटलर की दुर्भावना के शिकार यहूदियों को ही लाया जाता था लेकिन बाद में अन्य कई अपराधों के लिए दंडित किये जाने वाले कैदियों को भी यहीं भेजा जाने लगा ! अपराध के अनुसार उनकी पहचान सुनिश्चित करने के लिये उन्हें अलग-अलग रंगों की पट्टियाँ अपनी बाँह पर पहननी होती थीं ! ज्यूज़ पीले रंग की पट्टी पहनते थे ! कोई कैदी भागने की कोशिश ना करे इसके लिये बहुत ही कड़े सुरक्षा प्रबंध थे ! कैम्प के चारों ओर बहुत ऊँचाई तक बिजली संचरित काँटे के तार ( barbed wires ) लगे हुए थे ! ऊँची-ऊँची सात टॉवर्स थीं जहाँ से सुरक्षा गार्ड्स के द्वारा हर वक्त उन पर कड़ी नज़र रखी जाती थी और ज़रा सा भी संदेह होने पर उन्हें तुरंत ही गोली मार दी जाती थी !                 

                            
कैदियों को यंत्रणाएं देने के लिये यहाँ अनेकों टॉर्चर सेंटर्स थे जिन्हें पर्यटक आज भी जैसे का तैसा देख सकते हैं ! इनके अलावा कैदियों को प्रताडित करने के लिये और भी कई अनोखे तरीके काम में लाये जाते थे ! जेल के रूप में इस्तेमाल होने वाले छोटी-छोटी कोठरियों वाले लंबे गलियारे आज भी यहाँ मौजूद हैं जिनमें उस वक्त के कई नामचीन लोग हिटलर की दुर्भावनापूर्ण नीतियों का शिकार होकर यातनापूर्ण जीवन बिताने के लिये विवश हुए थे ! बर्फ से ढके खुले मैदानों में लकड़ी के तीन मंजिला बैरेक्स की ३२ कतारें उन दिनों हुआ करती थीं जिनमें कैदी भेड़ बकरियों की तरह ठूँस दिये जाते थे और वे जानवरों से भी बदतर हालात में रहने के लिये मजबूर कर दिये जाते थे !
 


कैदी यहाँ पर हर वक्त भयभीत और आतंकित रहते थे ! दस्तावेज़ बताते हैं कि यहाँ एक बार में 15000 कैदी तक रहे हैं ! यहाँ पर कई स्टैंडिंग सेल थे जो इतने छोटे होते थे कि उसमें बंद किया जाने वाला व्यक्ति बैठ भी नहीं सकता था ! कई दिनों के लिये उन्हें बतौर सज़ा इन सेल्स में खड़ा कर दिया जाता था और तीन दिन में ब्रेड का मात्र एक पीस उन्हें खाने के लिये दिया जाता था ! कैदियों को बेरहमी से चाबुक से धुना जाता था ! उन्हें कड़ी ठण्ड में निर्वस्त्र कर दिया जाता था और घंटों के लिये अटेंशन की मुद्रा में खड़े रहने के लिये मजबूर किया जाता था ! खम्भे या पेड़ से उन्हें लटका दिया जाता था और पैरों में भारी पत्थर या ईंटें बाँध दी जाती थीं ! और सर्वोपरि स्नान के बहाने उन्हें सामूहिक रूप से गैस चैम्बर्स में ले जाकर छत में लगे शॉवर्स से पानी की जगह ज़हरीली गैस छोड़ कर जान से ही मार दिया जाता था ! 


डकाऊ के दस्तावेज़ 32000 मौतों की पुष्टि करते हैं लेकिन वास्तविक संख्या इससे भी कहीं ज्यादह है ! कहते हैं कि 1942 में लगभग बत्तीस हज़ार कैदियों को अशक्त और बीमार होने की वजह से हर्थेम कासिल में एक ही दिन में ज़हरीली गैस देकर मार दिया गया था ! कई कैदी बीमारी, भूख, कमज़ोरी और ठण्ड से वैसे ही मर जाते थे ! कई जो यंत्रणा नहीं झेल पाते थे स्वयं आत्महत्या कर लेते थे ! ऐसे कई किस्से हैं जो कैम्प की खामोश दीवारें संवेदनशील कानों को सुनाने के लिये आतुर दिखाई देती हैं ! कैम्प में ही विद्युत शवदाह गृह बने हुए थे जिनमें मृत कैदियों को जलाया जाता था ! एक ही दिन में सैकड़ों मृत शरीरों को यहाँ पर बनी हुई बिजली से चलने वाली दो भट्टियों में राख में तब्दील कर देने के साक्ष्य यहाँ के दस्तावेजों में आज भी उपलब्ध हैं ! इस स्थान को मेमोरियल बनाने के बाद क्रीमेटोरियम की दीवार पर यहाँ मारे जाने वाले यहूदियों के सम्मान में एक शिलालेख लगा दिया गया है जिस पर जर्मन भाषा में लिखा है, “सोचो, हम यहाँ किस तरह से मरे हैं !“ 

                            
      

कंसंट्रेशन कैम्प के रूप में यह स्थान सन् 1945 तक ही काम में लाया गया ! द्वितीय विश्व युद्ध के समाप्त हो जाने के बाद अमेरिकन्स ने इसे छुड़ा लिया और इस पर अपना कब्जा कर लिया ! कुछ समय तक यहाँ अमेरिका ने अपना मिलिट्री बेस बनाया ! यहाँ पर उन जर्मंस अधिकारियों और सोल्जर्स को भी रखा गया जिन्हें द्वितीय विश्व युद्ध की समाप्ति के बाद कई देशों से निष्कासित कर दिया गया था तथा जिन पर मुकदमे चल रहे थे ! सन् 1960 में इसे फाइनली बंद कर दिया गया और अंतत: यह स्थान एक स्मारक के रूप में एक पर्यटन स्थल बना दिया गया ! कई कलाकारों ने यहाँ मिले टूटे फूटे सामान से अद्भुत कलाकृतियों का निर्माण किया जो इन दिनों पर्यटकों के आकर्षण का केन्द्र बनी हुई हैं !  


                             

अमानवीय व्यवहार की पराकाष्ठा क्या हो सकती है और आम इंसान की यंत्रणा सहने की क्षमता कितनी असीम हो सकती है इसका अनुभव यहाँ आने के बाद ही मुझे हुआ ! भारी मन एवं सजल नयनों से उन सभी भुक्तभोगियों को नमन कर हम वहाँ से लौट तो आये लेकिन कितने दिनों तक उस जगह की दारुण स्मृतियाँ दिल दिमाग पर अधिकार जमाये रहीं और कितने दिनों तक मन असम्पृक्त और विचलित रहा यह बता पाना मेरे लिये नितांत असंभव है ! 

                        

साधना वैद