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Saturday, March 29, 2014

तुझे देखा तो जाना



तुझे देखा तो जाना
कैसा होता है
एकाकीपन के दर्द को
चुपचाप झेलना,
कैसा होता है
चिलचिलाती धूप में
चुपचाप झुलसना,
कैसा होता है
सर्दी गर्मी बरसात में
बिना थके सदियों अहर्निश
चपचाप खड़े रहना,
कैसा होता है
नन्हे निर्मोही परिंदों को
आये दिन अपना कोटर छोड़
सुदूर गगन में उड़ कर
जाते हुए देखना,
कैसा होता है
झोंक देना अपना सारा जीवन
बिलकुल बेआस,
बेआवाज़   
एक बाँझ सी प्रतीक्षा में !

साधना वैद


Thursday, March 27, 2014

चुनावी क्षणिकायें

















मिली जुली सरकार नहीं है कर पाती कुछ

केवल लल्लो चप्पो से करती हमको खुश ,

मौके पर होता है यह नकली गठबंधन

वक्त पड़े तो शेर करे चूहे को वंदन !














मत आना झूठे वादों के झाँसे में तुम

नहीं हिलाना इनके आगे तुम अपनी दुम ,

फूट डाल कर लड़वाना इनकी है आदत ,

बिसराना मत प्रेम प्यार की शिक्षा को तुम !













बैठे हैं सीधे बन कर सब एक मंच पर

भरे ह्रदय में द्वेष, नहीं संदेह रंच भर ,

जल्दी ही उतरेगा तन से नकली चोला

मंत्री की कुर्सी होगी जब ‘एक’ लंच पर !












आ जायेंगे सब अपने असली बानों में

बोलेंगे गुर्रा कर सब बोली तानों में ,

होगा जम कर घमासान सत्ता की खातिर ,

बैठ जायेंगे सभी डाल उंगली कानों में !















देना होगा सोच समझ कर वोट भाइयों

हैं चुनाव का दौर सम्हल कर रहो भाइयों ,

भरमाने आयेंगे झूठे सच्चे नेता

चुनना है इनमें से असली रत्न भाइयों !
















कैसे मानें जो दिखता वह सच है भाई

क्यों कर ज़ालिम दिल में आई पीर पराई ,

वोट माँगने को हैं सब हथकंडे साथी

मत भूलो कि यह झूठा नाटक है भाई !














कैसे करें भरोसा इन पर बर्बर हैं ये

क्या सोचेंगे जनहित में जब निर्दय हैं ये

इन्हें फ़िक्र है तो केवल अपनी सत्ता की

जनता की चिंताओं से तो निस्पृह हैं ये !
















व्यर्थ लुटाते हो करुणा तुम भोले भाई

छलते हैं तुमको ये निर्मम नेता भाई

मत दे देना जबड़े में इनके तुम उंगली

मौक़ा पाकर खा जायेंगे तुमको भाई !

 









आँखें खोलो अबकी बार नहीं डरना है

जाँच परख कर सच्चे नेता को वरना है

पाँच साल के लिये बात फिर टल जायेगी

नादानी में वोट नहीं बोगस करना है !














मत सोचो अपने झगड़ों की छोटी बातें

जात धर्म और ऊँच नीच की ओछी घातें

सब धर्मों से बड़ा हमारा राष्ट्र धर्म है

इसे निभाना है मन से भूल सब बातें !



साधना वैद



Saturday, March 22, 2014

हारती संवेदना


क्या करोगे विश्व सारा जीत कर
हारती जब जा रही संवेदना ! 

शब्द सारे खोखले से हो गये ,
गीत मधुरिम मौन होकर सो गये ,
नैन सूखे ही रहे सुन कर व्यथा ,
शुष्क होती जा रही संवेदना ! 

ह्रदय का मरुथल सुलगता ही रहा ,
अहम् का जंगल पनपता ही रहा ,
दर्प के सागर में मृदुता खो गयी ,
तिक्त होती जा रही संवेदना ! 

आत्मगौरव की डगर पर चल पड़े ,
आत्मश्लाघा के शिखर पर जा चढ़े ,
आत्मचिन्तन से सदा बचते रहे ,
रिक्त होती जा रही संवेदना !

भाव कोमल कंठ में ही घुट गये ,
मधुर स्वर कड़वे स्वरों से लुट गये ,
है अचंभित सिहरती इंसानियत ,
क्षुब्ध होती जा रही संवेदना ! 

कौन सत् के रास्ते पर है चला ,
कौन समझे पीर दुखियों की भला ,
हैं सभी बस स्वार्थ सिद्धि में मगन ,
सुन्न होती जा रही संवेदना !

साधना वैद


Tuesday, March 18, 2014

पंछी बावरा





जानती हूँ
तेरी प्यास अनंत है  
लेकिन नन्हे नादान
क्या करेगा तू जब
अपनी विपुल प्यास को
बुझाने के लिये तुझे
बूँद भर पानी भी
नसीब न हो सके !

तृषित ह्रदय चातक की तरह
तू भी बड़ी आस लिये
अपनी चोंच खोल
नल के नीचे आ बैठा है !
लेकिन बावरे पंछी
ओस के चाटे क्या
प्यास बुझ सकती है ?
                                                                         
क्या करेगा तू जब   
स्त्रोत ही सूख गया हो !
इतनी ज़रा सी बूँद तो
तेरे विदग्ध ह्रदय की
आँच से वाष्पित हो
तेरे शुष्क कंठ तक
पहुँचने से पहले ही हवा में
विलीन हो जायेगी !



मासूम परिंदे  
मुझसे तेरी यह विकलता
देखी नहीं जाती !
बस इतना ही कह सकती हूँ
दुनिया का कदाचित
यही दस्तूर है
और समझौते के अलावा
कोई और उपाय नहीं है !



                       

लेकिन मात्र समझौता

करने से ही तो साँसे

मोल नहीं ली जा सकतीं !

है ना ?

नन्हे परिंदे

इन सूखे नलों से

अमृतधारा के बहने

की प्रत्याशा निर्मूल है !

तेरा जीवन अनमोल है पंछी !

जीवन रक्षा के लिये

तुझे कोई और ठिकाना

ढूँढना ही होगा !

जहाँ तू जी भर पानी पीकर

अपने शुष्क कंठ को

तर कर सके

और तृप्त भाव से

एक ऐसी मीठी तान भर सके

जिसे सुन कर

सारा संसार झूम उठे !



साधना वैद