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Wednesday, April 23, 2014

निर्णायक पल और मतदान




देश के सभी मतदाता इन दिनों अच्छी तरह से चुनाव के रंग में रंगे हुए हैं ! शिक्षित अशिक्षित, नये पुराने, बूढ़े जवान सभी अपनी-अपनी सोच, समझ एवं प्राथमिकताओं के अनुसार यह तय कर चुके हैं कि उन्हें किस पार्टी को और किस प्रत्याशी को वोट देना है ! लेकिन दो या तीन प्रतिशत मतदाता ऐसे भी होते हैं जो अपने मत का निर्धारण इस बात पर तय करते हैं कि हवा किसकी चल रही है ! इन्हीं लोगों को प्रभावित करने के लिये जुलूस, रैलियाँ, तरह-तरह के विज्ञापन, रोड शो आदि किये जाते हैं ! और यह ज़रूरी भी हैं क्योंकि जहाँ काँटे की टक्कर होती है वहाँ हार जीत का निर्णय इन दो या तीन प्रतिशत वोटों की गणना से ही तय होता है ! नेताओं की सभाओं में बड़ी भीड़ जमा करके अंतिम क्षण में निर्णय लेने वाले इन मतदाताओं को अपने पक्ष में मतदान करने के लिये प्रेरित करने के प्रयास किये जाते हैं ! लेकिन नेता गण चाहे जितने झुनझुने बजा लें, सभाएं कर लें या रोड शो और रैलियाँ कर लें ! मन बहलाने के लिये लोगों की भीड़ भी भले ही जुट जाये वोट उनका किसी एक प्रत्याशी को ही मिलेगा यह भी तय है ! आपने नोटिस किया है कभी अति उत्साही एवं फ़ुरसतिया लोगों के वही चहरे आपको हर पार्टी के नेता की सभा और रोड शो में नज़र आ जायेंगे !
इस बार मैं आपसे कुछ ऐसा करने के लिये कहने जा रही हूँ जो शायद आपके विचारों के प्रतिकूल हो ! पिछले कई वर्षों से देश में गठबंधन वाली मिली जुली सरकारें संसद में आ रही हैं ! जो ना तो एक समर्थ सशक्त सरकार दे पाती हैं ना ही एक सबल विपक्ष ! देश की जनता ने जाति, धर्म, पार्टी विशेष के लिये अपनी प्राथमिकता के आधार पर किसे और कैसे वोट करना है यह पहले से ही तय कर रखा है ! इसीका नतीजा है कि पिछले पच्चीस साल से देश में गठबंधन वाली सरकारें बनती चली आ रही हैं ! स्पष्ट बहुमत वाली आख़िरी सरकार ३० वर्ष पहले १९८४ में श्री राजीव गाँधी की बनी थी ! उसके बाद जितनी भी सरकारें बनीं वे सांसदों की खरीद फरोख्त के समीकरण साधने में और अपनी कुर्सी बचाने के जोड़ तोड़ में ही व्यस्त रहीं और देश और जनता के हित की बातें पिछड़ती चली गयीं ! इस बीच देश का कितना विकास हुआ, कितने घोटाले और घपले हुए, कितनी महँगाई बढ़ी, कितना भ्रष्टाचार बढ़ा, आम जनता के हित में कितने क़ानून बने और कितने निर्णय लिये गये आप सब देख ही रहे हैं ! इसका एकमात्र कारण यही है कि संसद में किसी भी पार्टी को स्पष्ट बहुमत नहीं मिल पाता है इसीलिये देशहित में ना तो कोई ठोस कदम उठाया जा सकता है ना ही कोई सकारात्मक प्रस्ताव पास हो पाता है ! जिस किसी पार्टी के हित आड़े आ जाते हैं उसीके सांसद समर्थन वापिस लेने की धमकी देकर ब्लैकमेल करने लगते हैं ! नतीजतन संसद का सारा वक्त व्यर्थ की छींटाकशी और अरोप प्रत्यारोपों के शोरगुल में ही व्यतीत होने लगता है ! इस सबसे बचने के लिये आवश्यक है कि संसद में एक स्पष्ट बहुमत वाली सरकार और एक दमदार सबल विपक्ष बनाने की दिशा में ठोस कदम उठाये जायें ! इसके लिये अपने पूर्वाग्रह छोड़ कर समझदारी से वोट करना होगा ! अपने क्षेत्र के उस प्रत्याशी के पक्ष में मतदान करें जिसकी जीत सुनिश्चित है ! या तो वह सरकार बनाने वाली पार्टी के हाथ मज़बूत करेगा या सशक्त विपक्ष को और मजबूती देगा ! सिद्धांतों के नाम पर निश्चित हारने वाले प्रत्याशी को वोट देकर आप ना तो उसका भला कर रहे हैं ना ही देश का और अपना कीमती वोट भी जाया कर रहे हैं ! यह प्रत्याशियों के लिये भी एक सबक होगा कि चुनाव में अपनी जीत सुनिश्चित करने के लिये पाँच साल तक अपनी ज़मीन तैयार करनी पड़ेगी ! जनता के बीच अपनी पहचान और लोकप्रियता अर्जित करनी होगी तब ही जीत संभव हो सकेगी ! राजनीति टू मिनिट्स नूडल्स जैसी रेसीपी नहीं है कि जुगाड़ करके रातों रात पार्टी से टिकिट हासिल कर लिया, चुनाव जीत लिया और सत्ता की कुर्सी पर काबिज होने के सपने सजा लिये !    
कल मतदान का छठा चरण है ! ११७ सत्रह सीट्स के लिये कल मतदान किया जायेगा ! आपसे अनुरोध है कि थोड़ा चिंतन करिये और देश को एक स्पष्ट बहुमत वाली सरकार या एक समर्थ सार्थक विपक्ष देने की दिशा में ठोस कदम उठाइये ! इस बार यदि अच्छी सरकार बन जाती है और उसको टक्कर देने के लिये एक दमदार विपक्ष का चुनाव हो जाता है तो उसके सुपरिणामों का लाभ हम भी तो उठायेंगे ! है ना ? क्या कहते हैं आप ?


साधना वैद  

Tuesday, April 1, 2014

कैसे चुनें एक योग्य प्रत्याशी .......





देश में लोक सभा के चुनाव होने जा रहे हैं ! कुछ माह पहले देश के पाँच प्रदेशों में विधान सभा के चुनाव हुए थे ! अलग-अलग समय पर नगर निगम व स्थानीय निकायों के चुनाव भी होते रहते हैं ! हम सबको यह समझना चाहिये कि तीनों तरह के चुनावों में विजयी तो सबसे लोकप्रिय प्रत्याशी ही होता है लेकिन हर चुनाव के विजेता की जिम्मेदारियाँ भिन्न प्रकार की होती हैं ! जहाँ लोकसभा के लिये चुना हुआ एम पी केन्द्र में सरकार बनाने का माध्यम बनता है और देश की आर्थिक नीति, रक्षा नीति, आतंरिक सुरक्षा, विदेश नीति, प्राकृतिक संसाधनों के उपयोग, पर्यावरण आदि महत्वपूर्ण मंत्रालयों का संचालन करता है व पूरे देश के विशाल बजट का निर्धारण करता है वहीं विधान सभा का विधायक चुने जाने के बाद अपने प्रदेश की समस्याओं, प्राकृतिक संसाधनों का उपयोग व अपने प्रदेश की आमदनी व केन्द्र से मिलने वाले अपने हिस्से की धन राशि को जनहित में समुचित रूप से खर्च करने का माध्यम बनता है ! इसका दायित्व अपने प्रांत की पुलिस, प्रशासन, शिक्षा, स्वास्थ्य, फसल, आदि के समुचित प्रबंधन को देखना होता है ! इसी तरह स्थानीय समस्याओं के निदान के लिये ज़िम्मेदार हमारे शहर के नगरनिगम का पार्षद होता है जो कि हमारे मोहल्ले की सड़क, पानी, बिजली, सफाई आदि की समस्याओं के समाधान के लिये जवाबदेह होता है ! कहने का तात्पर्य यह है कि तीनों चुनावों के लिये अलग-अलग योग्यताओं वाले प्रत्याशियों की आवश्यकता होती है और चुनाव के वक्त प्रत्याशियों को हमें इन कसौटी पर कस कर ज़रूर परख लेना चाहिये ! कार्यचक्र कुछ इस प्रकार चलता है कि पार्षद अपने मोहल्ले की समस्याओं के हल के लिये अपने क्षेत्र के विधायक से मिलेगा और राज्य सरकार से उस समस्या का समाधान करायेगा ! जो समस्याएं राज्य स्तर पर हल नहीं हो सकती हैं उनके लिये केन्द्रीय सहायता के वास्ते एम एल ए अपने शहर के एम पी से मिलेगा ! वह एम पी या तो स्वयं सत्ता में होगा या विपक्षी नेता के रूप में सरकार पर दबाव डालने के लिये सक्षम होगा ! अर्थात इस लोक सभा में हम जिस सांसद को चुनने जा रहे हैं वह प्रधान मंत्री, केन्द्र सरकार का मंत्री अथवा विपक्ष का कोई मजबूत नेता बनने जा रहा है ! वह इस महत्वपूर्ण दायित्व को उठाने के लिये पर्याप्त रूप से सुयोग्य अथवा सक्षम है या नहीं यह सुनिश्चित कर लेना भी अति आवश्यक है !
अब इस विषय पर भी ध्यान देने की ज़रूरत है कि प्रत्याशी की छवि साफ़ सुथरी हो और उसका कोई आपराधिक इतिहास ना हो ! यही सबसे टेढी खीर है ! चुनाव में भाग लेने वाली पार्टियों तथा चंद प्रशासनिक अधिकारियों के अलावा आम जनता का बहुत बड़ा प्रतिशत तो अपने क्षेत्र से खड़े होने वाले सारे प्रत्याशियों के नाम तक नहीं जानता उनके अच्छे बुरे क्रियाकलापों के बायोडाटा की जानकारी उन्हें होगी यह तो नितांत असंभव है ! यह विडम्बना ही है कि विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्र वाले हमारे देश में चुनाव प्रक्रिया केवल दाँव पेंच और षड्यंत्र वाली चौसर की बाज़ी बन कर रह गयी है ! यहाँ राजनैतिक पार्टियाँ प्रत्याशियों को टिकिट क्षेत्र विशेष की ज़मीनी समस्याओं के बारे में उनकी जानकारी और कटिबद्धता या वहाँ की आम जनता के साथ उनके जुड़ाव या आत्मीय संबंधों को ध्यान में रखते हुए नहीं देतीं वरन चुनाव को चटपटा और चटखारेदार बनाने के लिये विरोधी पार्टी के सामने ऐसे प्रत्याशी को खड़ा कर देती हैं जिसे भले ही आम जनता की समस्याओं की जानकारी ना हो किन्तु वह अपनी लोकप्रियता के बल पर दूसरे प्रत्याशी के वोट काटने में सफलता की गारंटी बन सके यह अधिक ज़रूरी है ! इस चुनावी पैंतरेबाज़ी में जनता किस कोने में सिमट कर रह जाती है इस ओर किसीका ध्यान नहीं जाता ! ऐसे में सुदूर प्रदेशों से खींच कर लाये गये अनजान अपरिचित प्रत्याशियों की आपराधिक गतिविधियों की जानकारी स्थानीय जनता को भला कैसे मिल सकती है ! चुनाव की वेब साईट पर सभी प्रत्याशियों के बारे में सारी जानकारी उपलब्ध होती है यह सच है लेकिन ज़रा सोचिये हमारे वोटर्स का कितना बड़ा प्रतिशत इतना शिक्षित है जो इंटरनेट की सुविधा का लाभ उठाना जानता है ! कितने लोगों के पास यह सुविधा उपलब्ध है और कितने लोगों के पास इतना वक्त और फालतू पैसा है कि अपने घर की रोजी रोटी की समस्याओं को दरकिनार कर साइबर कैफे में अपनी जेब से पैसे खर्च कर वे अपने प्रत्याशियों के बारे में जानकारी प्राप्त करने की आवश्यकता को अधिक महत्व दे सकें ! ये बातें सारी कपोल कल्पना से अधिक कुछ नहीं !  यदि इस सन्दर्भ में जनता को जागरूक करना है तो मीडिया को अपनी जिम्मेदारी समझदारी से उठानी पड़ेगी ! एक विशेष समय पर स्थानीय चैनलों पर क्षेत्र विशेष के हर प्रत्याशी की सम्पूर्ण जानकारी दर्शकों व श्रोताओं के लिये उपलब्ध करानी होगी ! जिसे सुन व देख कर वोटर्स अपने क्षेत्र के प्रत्याशी के बारे में सब कुछ जान सकें ! यही जानकारी स्थानीय अखबारों में प्रतिदिन छापी जानी चाहिए ताकि जो लोग टी वी पर समयाभाव के कारण उस विशेष विज्ञप्ति को देखने से वंचित रह गये वे समाचार पत्रों से जानकारी प्राप्त कर सकें !  
दरअसल चुनाव के लिये प्रत्याशियों के चयन की प्रक्रिया ही सर्वथा दोषपूर्ण है ! अभी तक योग्यता और अनुभव को पूरी तरह से दरकिनार कर ऐसे प्रत्याशियों को टिकिट दिया जाता रहा है जो या तो राजनैतिक रूप से सफल बड़े नेताओं के वंशज हैं या फिल्म जगत, टी वी या कला के क्षेत्र की जानी मानी हस्तियाँ हैं ! ये सारे लोग जो हमेशा पाँच सितारा सुख सुविधाओं में रहते आये हैं, जिन्हें हर समय वाई और जेड स्तर की सुरक्षा प्रदान की जाती रही है वे कैसे आम आदमी की ज़रूरतों के बारे में समझेंगे ! जाके पाँव न फटी बिवाई सो क्या जाने पीर पराई ! ऐसे लोग ईमानदार हों भी तो भी जनता के लिये किस काम के हैं ! यह क्षेत्र देश और देशवासियों के प्रति सेवाभाव व समर्पण के लिये है यहाँ कर्मठता, योग्यता व अनुभव की ज़रूरत होती है केवल लोकप्रियता से काम नहीं चल सकता !
मेरे विचार से नेताओं की योग्यता और जनता के प्रति उनके समर्पण के पैमानों में बदलाव की महती आवश्यकता है ! किसी भी पार्टी के प्रत्याशी को चुनाव लड़ने के लिये टिकिट तभी मिलना चाहिये जब उसने आम जनता की समस्याओं के समाधान के लिये अपने क्षेत्र में पाँच साल तक ज़मीनी स्तर पर डट कर काम किया हो और उस क्षेत्र का बच्चा-बच्चा तक उन्हें पहचानता हो ! उसके लिये हमें लोकप्रिय नामों की ज़रूरत नहीं है ! हमें ऐसे जुझारू नेताओं की ज़रूरत है जो हमारी बुनियादी आवश्यकताओं को हम तक पहुँचाने में हमारे लिये मददगार साबित हों ! जब कई पार्टियों के नेता प्रतिस्पर्धा के स्तर पर पाँच साल तक काम करके चुनाव के समय परीक्षा देंगे तो परिणाम निश्चित रूप से सुखद आयेंगे ! देश की तो कायापलट ही हो जायेगी ! दरअसल हमें ऐसे नेताओं की ज़रूरत है तो आम जनता की तकलीफों को समझें, उनकी ज़रूरतों को जानें और उनको दूर करने के लिये युद्ध स्तर पर खुद को झोंक दें ! सांसद या विधायक की पदवी कोई इनाम नहीं है कि इसे ट्रॉफी की तरह अलमारी में सजा कर रख दिया जाये या डिग्री की तरह फ्रेम करा कर दीवार पर टाँग दिया जाये ! यह तो काँटो भरा ताज है जिसे पहन कर आप चैन से नहीं बैठ सकते ! आपको जनहित के लिये लगातार काम में लगे ही रहना पड़ता है !



साधना वैद   

Thursday, March 27, 2014

चुनावी क्षणिकायें

















मिली जुली सरकार नहीं है कर पाती कुछ

केवल लल्लो चप्पो से करती हमको खुश ,

मौके पर होता है यह नकली गठबंधन

वक्त पड़े तो शेर करे चूहे को वंदन !














मत आना झूठे वादों के झाँसे में तुम

नहीं हिलाना इनके आगे तुम अपनी दुम ,

फूट डाल कर लड़वाना इनकी है आदत ,

बिसराना मत प्रेम प्यार की शिक्षा को तुम !













बैठे हैं सीधे बन कर सब एक मंच पर

भरे ह्रदय में द्वेष, नहीं संदेह रंच भर ,

जल्दी ही उतरेगा तन से नकली चोला

मंत्री की कुर्सी होगी जब ‘एक’ लंच पर !












आ जायेंगे सब अपने असली बानों में

बोलेंगे गुर्रा कर सब बोली तानों में ,

होगा जम कर घमासान सत्ता की खातिर ,

बैठ जायेंगे सभी डाल उंगली कानों में !















देना होगा सोच समझ कर वोट भाइयों

हैं चुनाव का दौर सम्हल कर रहो भाइयों ,

भरमाने आयेंगे झूठे सच्चे नेता

चुनना है इनमें से असली रत्न भाइयों !
















कैसे मानें जो दिखता वह सच है भाई

क्यों कर ज़ालिम दिल में आई पीर पराई ,

वोट माँगने को हैं सब हथकंडे साथी

मत भूलो कि यह झूठा नाटक है भाई !














कैसे करें भरोसा इन पर बर्बर हैं ये

क्या सोचेंगे जनहित में जब निर्दय हैं ये

इन्हें फ़िक्र है तो केवल अपनी सत्ता की

जनता की चिंताओं से तो निस्पृह हैं ये !
















व्यर्थ लुटाते हो करुणा तुम भोले भाई

छलते हैं तुमको ये निर्मम नेता भाई

मत दे देना जबड़े में इनके तुम उंगली

मौक़ा पाकर खा जायेंगे तुमको भाई !

 









आँखें खोलो अबकी बार नहीं डरना है

जाँच परख कर सच्चे नेता को वरना है

पाँच साल के लिये बात फिर टल जायेगी

नादानी में वोट नहीं बोगस करना है !














मत सोचो अपने झगड़ों की छोटी बातें

जात धर्म और ऊँच नीच की ओछी घातें

सब धर्मों से बड़ा हमारा राष्ट्र धर्म है

इसे निभाना है मन से भूल सब बातें !



साधना वैद



Thursday, January 19, 2012

कैसे हों हमारे विधायक और सांसद !

हम लोगों के सौभाग्य से चुनाव का सुअवसर आ गया है और यही सही वक़्त है जब हम अपनी कल्पना के अनुसार सर्वथा योग्य और सक्षम प्रत्याशी को जिता कर भारतीय लोकतंत्र के हितों की रक्षा करने की मुहिम में अपना सक्रिय योगदान कर सकते हैं । इस समय यह सुनिश्चित करना बहुत ज़रूरी है कि जिन लोगों को हम वोट देने जा रहे हैं उनका पिछला रिकॉर्ड कैसा है, क्या वे आपराधिक छवि वाले नेता हैं, सामाजिक सरोकारों के प्रति वे कितने प्रतिबद्ध हैं और अपनी बात को दम खम के साथ मनवाने की योग्यता रखते हैं या नहीं । मात्र सज्जन और शिक्षित होना ही वोट जीतने के लिये काफी नहीं है । प्रत्याशी का जुझारू होना परम आवश्यक है वरना वह विधान सभा या संसद में मिमियाता ही रह जायेगा और कोई उसकी बात को सुन ही नहीं सकेगा । सर्वोपरि यह भी सुनिश्चित करना बहुत ज़रूरी है कि सत्ता में आने के बाद उसका लक्ष्य जनता की सेवा करना होगा या उसके दायरे में सिर्फ उसका अपना परिवार और नाते रिश्तेदार ही होंगे ।
विधान सभा या संसद में केवल हल्ला गुल्ला करने वाले और मेज़ कुर्सी माइक फेंकने वाले लोगों के लिये कोई जगह नहीं होनी चाहिये जो विश्व बिरादरी में हम सब के लिये शर्मिंदगी का कारण बनते हैं । वहाँ ज़रूरत है ऐसे लोगों की जो बिल्कुल साफ और स्पष्ट दृष्टिकोण रखते हों और जिनकी आस्थायें और मूल्य दल बदल के साथ ही बदलने वाले ना हों । संसद में समाज के हर वर्ग का प्रतिनिधित्व होना बहुत ज़रूरी है ताकि वे अपने वर्ग के हितों की रक्षा कर सकें और उसकी हिमायत में भरपूर वज़न के साथ अपनी बात रख सकें । इसके लिये प्रखर बुद्धिजीवियों, समाजसेवियों और पैनी नज़र रखने वाले ईमानदार आलोचकों की आवश्यक्ता है जो विधान सभा या संसद में पास होने वाले ग़लत निर्णयों का डट कर विरोध कर सकें । इसीलिये हमारे खेतिहर किसान भाइयों की पैरवी के लिये ग्रामीण क्षेत्र से जुड़े प्रतिनिधियों, व्यापारियों के हितों की रक्षा के लिये उद्योग जगत से जुड़े उद्यमियों, बच्चों के हितों के लिये प्रतिबद्ध शिक्षाविदों और बुद्धिजीवियों, सैन्य गतिविधियों पर पैनी नज़र रखने के लिये सेना से जुड़े रिटायर्ड सैन्य अधिकारियों, जनता के हित में पास होने वाले कानूनों के कड़े विश्लेषण के लिये सुयोग्य कानूनविदों, जनता पर थोपे जाने वाले करों की उचित समीक्षा के लिये अनुभवी अर्थशास्त्रियों तथा कलाकारों से जुड़ी समस्याओं के निवारण के लिये सुयोग्य कलाकारों का प्रतिनिधित्व होना बहुत ज़रूरी है । सत्ता सुख को चखने के लिये आतुर पार्टीज़ के शीर्षस्थ नेताओं को चाहिये कि अपनी पार्टी के लिये प्रत्याशियों का चुनाव करते समय वे इन बातों का अवश्य ध्यान रखें और मतदाताओं से भी मेरा अनुरोध है कि अपना अनमोल वोट देने से पहले वे यह अवश्य सुनिश्चित कर लें कि वे जिस प्रत्याशी को वोट देने जा रहे हैं वह उपरोक्त वर्णित किसी भी कसौटी पर खरा उतर रहा है या नहीं । यह अवसर इस बार हाथ से निकल गया तो फिर अगले पाँच साल तक हाथ मलने के सिवा और कुछ बाकी नहीं रहेगा । वोट ना देने या खड़े हुए किसी भी प्रत्याशी के प्रति अपनी असहमति को व्यक्त करने का मतलब है कि आप अपने अधिकारों को व्यर्थ कर रहे हैं । आपके इस निर्णय से चुनाव प्रक्रिया पर कोई फर्क नहीं पड़ेगा । कोई न कोई तो चुन कर आ ही जायेगा फिर आपके पास अगले पाँच साल तक उसीको अपने सर माथे पर बिठाने के अलावा कोई चारा न होगा और फिर नैतिक रूप से अपने नेता की किसी भी तरह की आलोचना करने का अधिकार भी आपके पास नहीं होना चाहिये क्योंकि उसे जिताने मे आपकी भूमिका भी यथेष्ट रूप से महत्वपूर्ण ही होगी भले ही वह प्रत्यक्ष ना होकर परोक्ष ही हो ।

साधना वैद

Sunday, January 8, 2012

समाचार पत्र अपना दायित्व पहचानें

चुनाव आयोग के कुछ निर्णयों पर तो आश्चर्य होता है कि महात्मा गाँधी को छोड़ कर सभी नेताओं की मूर्तियों को ढक दिया जाये ! अब ज़रा सोचिये क्या मतदाताओं की याददाश्त भी खराब हो जायेगी ! कुछ नेताओं का मूर्तिप्रेम तो सर्वविदित है ! जिस शहर में किसी खास जगह पर किसी नेता विशिष्ट की मूर्ति लगी होगी तो क्या लोग रातों रात में भूल जायेंगे कि आज जो आदमकद मुजस्समा कपड़े से ढका हुआ है कल तक वहाँ किसकी मूर्ति थी ! अक्सर तो राहगीरों को रास्ता बताने के वास्ते ये मूर्तियों वाले चौराहे ही अधिक काम आते हैं ! बल्कि इसका तो प्रत्याशियों को फ़ायदा ही होगा कि उनके प्रति चुनाव आयोग असंवेदनशील हो रहा है ! हाँ इसका फ़ायदा कुछ मौक़ा परस्त अधिकारियों को भी ज़रूर मिल जायेगा जो थैले बनाने वाले कारीगरों को तो थोड़ा सा दाम देंगे और लंबे चौड़े बिल बना कर सरकारी धन, जो वास्तव में जनता से उगाहा हुआ धन है, से अपने बैंक बैलेंस को तगड़ा करेंगे ! खैर ! आयोग है तो कुछ तो नियम उसे बनाने ही होंगे फिर चाहे वो तर्कसंगत हों या नहीं !
चुनाव का मौसम है और प्रत्याशियों का प्रचार प्रसार पूरे ज़ोर पर है । सभी अपने बारे में झूठ सच बढ़ा चढ़ा कर बता रहे हैं । लेकिन वास्तविकता यह है कि आम जनता में से शायद किसी को भी अपने क्षेत्र के सभी प्रत्याशियों के नाम तक नहीं मालूम हैं उनके इतिहास की तो बात ही छोड़ दीजिये । यही कारण है कि जो उम्मीदवार अशिक्षित और ग़रीब मतदाताओं को जाति और धर्म का वास्ता देकर भरमा लेता है या भौतिक वस्तुओं का प्रलोभन देकर अपनी मुट्ठी में कर लेता है मतदाता उसीके पक्ष में वोट दे देते हैं चाहे फिर वह योग्य हो या ना हो । इंटरनेट पर सब के बारे में सूचना उपलब्ध है लेकिन भारत जैसे देश में कितने घरों में इंटरनेट की सुविधा सुलभ है और जीवन की आपाधापी में किसके पास इतना समय है कि वे साइबर कैफे में जाकर प्रत्याशियों के इतिहास भूगोल की जाँच पड़ताल अपनी जेब ढीली करके हासिल करें । आज के परिदृश्य में सूचना प्राप्त करने के लिये आम जनता के लिये जो सबसे सुलभ और स्थाई माध्यम है वह समाचार पत्र ही हैं । टी. वी. भी एक माध्यम है जिसकी पहुँच काफी विस्तृत है लेकिन उसकी भी सीमायें हैं कि वे समय विशेष पर ही सूचना प्रसारित कर सकते हैं और कोई आवश्यक नहीं कि उस समय सारे दर्शक अपना पसंदीदा कार्यक्रम छोड़ कर प्रत्याशियों की जानकारी जुटाने में दिलचस्पी लें । ऐसे में सभी समाचार पत्रों का दायित्व और बढ़ जाता है कि वे अपने पाठकों तक समस्त आवश्यक और अनिवार्य सूचनायें उपलब्ध करायें क्योंकि समाचार पत्रों में प्रतिदिन जो कुछ छपता है उस पर दिन भर में कभी न कभी तो नज़र पड़ ही जाती है ।
मेरे विचार से सभी प्रमुख समाचार पत्रों में प्रतिदिन नामांकित प्रत्याशियों के बारे में इस प्रकार की सूचनायें प्रकाशित करना अनिवार्य कर दिया जाना चाहिये -
नाम
आयु
शिक्षा आपराधिक मामलों का विवरण
राजनैतिक इतिहास
सम्पत्ति का विवरण
व्यावसायिक अनुभव
उपलब्धियाँ और विफलतायें
आपराधिक मामलों के विवरण के तहत उन पर कितने मुकदमें चल रहे हैं, उन अपराधों की प्रकृति क्या है, कितने विचाराधीन हैं और कितनों में वे बरी हो चुके हैं इन सबका उल्लेख होना आवश्यक है ।
राजनैतिक इतिहास के विवरण के तहत यह जानकारी होना नितांत आवश्यक है कि इससे पहले वे किस पार्टी के लिये काम कर चुके हैं, कितनी बार दल बदल की राजनीति कर चुके हैं, उनकी निष्ठायें किसी भी पार्टी के लिये कितनी अवधि तक समर्पित रहीं, वे राजनीति में पहले से ही सक्रिय किस परिवार से सम्बद्ध हैं और सार्वजनिक सेवा का उनका इतिहास कितना पुराना है ।
पारदर्शिता की मुहिम के चलते सम्पत्ति का व्यौरा देना तो अब चलन में आ ही चुका है लेकिन जन साधारण के लिये यदि इसको अनिवार्य रूप से व्यक्ति विशेष की समस्त जानकारियों के साथ जोड़ कर लिखा जायेगा तो लोगों को तुलनात्मक अध्ययन करने में आसानी होगी ।
व्यावसायिक अनुभव के उल्लेख से यह विचार करने में आसानी होगी कि संसद में वे किस वर्ग विशेष का प्रतिनिधित्व कर सकते हैं । जैसे एक वकील कानून के सम्बन्ध में, एक डॉक्टर चिकित्सा के सम्बन्ध में, एक शिक्षक शिक्षा के सम्बन्ध में, एक व्यवसायी उद्योग के सम्बन्ध में, एक कलाकार संस्कृति और कला के सम्बन्ध में, एक जन सेवक आम आदमी के सरोकारों के सम्बन्ध में, एक सैन्य अधिकारी रण कौशल से जुड़ी नीतियों के निर्धारण में महत्वपूर्ण योगदान कर सकते हैं।
उपलब्धियों और विफलताओं के बारे में यह लिखना आवश्यक है कि अब तक वे किन महत्वपूर्ण मुद्दों के लिये प्रयासरत रहे हैं और उनमें कितनी सफलता या असफलता उनके हिस्से में आयी है ।
समाचारपत्रों में जब प्रत्येक प्रत्याशी के बारे में यह जानकारी प्रतिदिन अनिवार्य रूप से छपेगी तो कोई कारण नहीं है कि मतदाता स्वविवेक का प्रयोग किये बिना भेड़चाल की तरह किसी ऐसे प्रत्याशी के पक्ष में अपना वोट डाल आयें जिसने उनको भाँति भाँति के प्रलोभन देकर प्रभावित कर लिया हो, या वह किसी जाति विशेष का प्रतिनिधि हो ।
यह भी आवश्यक है कि यह सारी सूचना पूर्णत: विशुद्ध सूचना ही हो उसमें किसी नेता या पार्टी की सोच, राय, धारणा या छवि का तड़का न लगा हो । मेरे विचार से यदि इस दिशा में ठोस कदम उठाये जायेंगे तो आम जनता को अपने विवेक का प्रयोग करने का सुअवसर अवश्य मिलेगा और तब ही शायद सर्वोत्तम प्रत्याशी की जीत सम्भव हो पायेगी जिसके लिये हम सब कृत संकल्प हैं । जय भारत !

साधना वैद