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बृहस्पतिवार, 19 जनवरी 2012

कैसे हों हमारे विधायक और सांसद !

हम लोगों के सौभाग्य से चुनाव का सुअवसर आ गया है और यही सही वक़्त है जब हम अपनी कल्पना के अनुसार सर्वथा योग्य और सक्षम प्रत्याशी को जिता कर भारतीय लोकतंत्र के हितों की रक्षा करने की मुहिम में अपना सक्रिय योगदान कर सकते हैं । इस समय यह सुनिश्चित करना बहुत ज़रूरी है कि जिन लोगों को हम वोट देने जा रहे हैं उनका पिछला रिकॉर्ड कैसा है, क्या वे आपराधिक छवि वाले नेता हैं, सामाजिक सरोकारों के प्रति वे कितने प्रतिबद्ध हैं और अपनी बात को दम खम के साथ मनवाने की योग्यता रखते हैं या नहीं । मात्र सज्जन और शिक्षित होना ही वोट जीतने के लिये काफी नहीं है । प्रत्याशी का जुझारू होना परम आवश्यक है वरना वह विधान सभा या संसद में मिमियाता ही रह जायेगा और कोई उसकी बात को सुन ही नहीं सकेगा । सर्वोपरि यह भी सुनिश्चित करना बहुत ज़रूरी है कि सत्ता में आने के बाद उसका लक्ष्य जनता की सेवा करना होगा या उसके दायरे में सिर्फ उसका अपना परिवार और नाते रिश्तेदार ही होंगे ।
विधान सभा या संसद में केवल हल्ला गुल्ला करने वाले और मेज़ कुर्सी माइक फेंकने वाले लोगों के लिये कोई जगह नहीं होनी चाहिये जो विश्व बिरादरी में हम सब के लिये शर्मिंदगी का कारण बनते हैं । वहाँ ज़रूरत है ऐसे लोगों की जो बिल्कुल साफ और स्पष्ट दृष्टिकोण रखते हों और जिनकी आस्थायें और मूल्य दल बदल के साथ ही बदलने वाले ना हों । संसद में समाज के हर वर्ग का प्रतिनिधित्व होना बहुत ज़रूरी है ताकि वे अपने वर्ग के हितों की रक्षा कर सकें और उसकी हिमायत में भरपूर वज़न के साथ अपनी बात रख सकें । इसके लिये प्रखर बुद्धिजीवियों, समाजसेवियों और पैनी नज़र रखने वाले ईमानदार आलोचकों की आवश्यक्ता है जो विधान सभा या संसद में पास होने वाले ग़लत निर्णयों का डट कर विरोध कर सकें । इसीलिये हमारे खेतिहर किसान भाइयों की पैरवी के लिये ग्रामीण क्षेत्र से जुड़े प्रतिनिधियों, व्यापारियों के हितों की रक्षा के लिये उद्योग जगत से जुड़े उद्यमियों, बच्चों के हितों के लिये प्रतिबद्ध शिक्षाविदों और बुद्धिजीवियों, सैन्य गतिविधियों पर पैनी नज़र रखने के लिये सेना से जुड़े रिटायर्ड सैन्य अधिकारियों, जनता के हित में पास होने वाले कानूनों के कड़े विश्लेषण के लिये सुयोग्य कानूनविदों, जनता पर थोपे जाने वाले करों की उचित समीक्षा के लिये अनुभवी अर्थशास्त्रियों तथा कलाकारों से जुड़ी समस्याओं के निवारण के लिये सुयोग्य कलाकारों का प्रतिनिधित्व होना बहुत ज़रूरी है । सत्ता सुख को चखने के लिये आतुर पार्टीज़ के शीर्षस्थ नेताओं को चाहिये कि अपनी पार्टी के लिये प्रत्याशियों का चुनाव करते समय वे इन बातों का अवश्य ध्यान रखें और मतदाताओं से भी मेरा अनुरोध है कि अपना अनमोल वोट देने से पहले वे यह अवश्य सुनिश्चित कर लें कि वे जिस प्रत्याशी को वोट देने जा रहे हैं वह उपरोक्त वर्णित किसी भी कसौटी पर खरा उतर रहा है या नहीं । यह अवसर इस बार हाथ से निकल गया तो फिर अगले पाँच साल तक हाथ मलने के सिवा और कुछ बाकी नहीं रहेगा । वोट ना देने या खड़े हुए किसी भी प्रत्याशी के प्रति अपनी असहमति को व्यक्त करने का मतलब है कि आप अपने अधिकारों को व्यर्थ कर रहे हैं । आपके इस निर्णय से चुनाव प्रक्रिया पर कोई फर्क नहीं पड़ेगा । कोई न कोई तो चुन कर आ ही जायेगा फिर आपके पास अगले पाँच साल तक उसीको अपने सर माथे पर बिठाने के अलावा कोई चारा न होगा और फिर नैतिक रूप से अपने नेता की किसी भी तरह की आलोचना करने का अधिकार भी आपके पास नहीं होना चाहिये क्योंकि उसे जिताने मे आपकी भूमिका भी यथेष्ट रूप से महत्वपूर्ण ही होगी भले ही वह प्रत्यक्ष ना होकर परोक्ष ही हो ।

साधना वैद

11 टिप्पणियाँ:

संगीता स्वरुप ( गीत ) ने कहा…

मतदाता के दायित्वों को समझती सार्थक पोस्ट ... पर जब सांसद चुने जाते हैं तब कहाँ पता होता है की ये माईक उठा उठा कर संसद में फेंकेंगे ..

वैसे एक चुटकुला याद आ रहा है ...
एक नेता दो बार चुनाव जीतने के बाद तीसरी बार हार गया ...जनता ने कहा कि उसने जनता के लिए कोई काम नहीं किया ..नेता जी का जवाब था कि -- पहली बार जब चुनाव जीता तो घर परिवार का उद्धार किया .. दूसरी बार में अपने नाते रिश्तेदारों का ..इस बार जनता की बारी थी पर उसने मुझे हरवा ही दिया .. तो जनता के काम कैसे होंगे :):)

vidya ने कहा…

उमीदवार के भीतर झाँक पाना मतदाता के बस में कहाँ...
सार्थक रचना..
संगीता जी आपका चुटकुला भी सार्थक :-))

rashmi ravija ने कहा…

अपने कर्तव्यों पर नज़र डालने के लिए बाध्य करती है यह पोस्ट..
काश प्रत्याशियों का चुनाव करते वक़्त सबलोग इन बातों का ध्यान रखें
बाद में सरकार की आलोचना करने से कुछ भी हासिल नहीं होगा..अगर हम अपने प्रतिनिधियों का चुनाव ही ही सही ढंग से ना करें.

Kailash Sharma ने कहा…

बहुत सार्थक पोस्ट. मत देते समय अगर उम्मीदवार की योग्यता पर ध्यान नहीं देते तो हमें बाद में इन नेताओं की शिकायत करने का कोई हक़ नहीं है.

chirag ने कहा…

agar janta samjhdari se vote de to kafi cheeze badal sakti hain

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक (उच्चारण) ने कहा…

घूम-घूमकर देखिए, अपना चर्चा मंच
लिंक आपका है यहाँ, कोई नहीं प्रपंच।।
--
आपकी इस प्रविष्टी की चर्चा कल शुक्रवार (Friday) के चर्चा मंच पर भी होगी!
सूचनार्थ!

आशा ने कहा…

अच्छी पोस्ट |बिचारणीय मुद्दा उठाया है |
आशा

DR. ANWER JAMAL ने कहा…

nice.

ASHOK BIRLA ने कहा…

baat to sahi hai mem par kuch majburiya hoti hai ....inko chunte samay ...bahut hi accha sansaleshan ...!!

रेखा श्रीवास्तव ने कहा…

कैसे हों सांसद और विधायक ? आप देख रही हैं दलों के बीच अपने ही प्रत्याशियों के चुनाव को लेकर घमासान. अब क्या समझें हम कि जो टिकट पाने के लिए इस तरह से कुर्सियां चला रहे हैं वे संसद में जाकर नहीं चलाएंगे और अगर इन सबका बहिष्कार करें तो फिर वे चुनकर आ जायेंगे जो लोगों को अशिक्षा और मजबूरी को हथियार बनाकर साम दाम दंड भेद अपना कर मत ले जाते हैं. इस लिए खुद भी चुनाव में मत देते समय सजग रहिये और अपने आस पास भी जागरूकता बनाये रखिये.

Udan Tashtari ने कहा…

विचारणीय एवं सार्थक!!