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शनिवार, 21 जनवरी 2012

हमारे शहरों के रेल मार्ग सुन्दर क्यों नहीं हो सकते ?

अमेरिका की मशहूर टी वी होस्ट ओपरा विनफ्रे की आगरा यात्रा और इस शहर की साफ़ सफाई और रख रखाव पर उनकी प्रतिक्रिया ने आगरा शहर के अधिकारियों और ज़िम्मेदार संस्थाओं को चेताया हो या नहीं कम से कम मुझे तो बहुत विचलित किया है ! यहाँ की व्यवस्थाएं कुछ करें या ना करें लेकिन आगरा शहर के नागरिकों से मेरी ज़रूर इतनी अपील है कि वे अपने घर के आसपास और अपने मोहल्ले की साफ़ सफाई का ध्यान अवश्य रखें ! किसी बाहर से आये मेहमान को प्रभावित करने के लिये ऐसा करना आवश्यक नहीं है खुद उनके अपने स्वास्थ्य और सुरुचिपूर्ण जीवनयापन के लिये भी यह बहुत ज़रूरी है ! ओपरा विनफ़्रे सड़क मार्ग से आगरा आईं तो उनके उद्गारों से उनका रोष और असंतोष सबने महसूस किया ! ज़रा उन मेहमानों के बारे में भी सोचिये जो रेल मार्ग से सफर करते हैं ! उन्हें कैसे कैसे शर्मनाक दृश्यों का सामना करना पड़ता होगा क्या किसीने कभी इस पर विचार करने की ज़हमत उठाई है ? विदेशी मेहमान रेल मार्ग से भी बहुत यात्रा करते हैं ! दो वर्ष पूर्व मैंने इसी विषय पर एक आलेख लिखा था ! चाहती हूँ इसे आज आप भी पढ़ें ! मेरे इस अरण्यरोदन से इन दो वर्षों में कोई परिवर्तन नहीं आया ! अच्छी तरह से जानती हूँ कि आने वाले कई वर्षों तक इस स्थिति में सुधार आने की कोई संभावना नहीं है क्योंकि जिनके हाथों में सत्ता की बागडोर है वे कानों में तेल डाले और आँखों पर पट्टी बाँधे बैठे रहते हैं ! ऐसा नहीं है कि उन्हें इन हालातों की जानकारी नहीं है ! बस कुछ करने की इच्छाशक्ति ही नहीं है ! इसलिए आज से दस वर्ष बाद भी मेरा यह आलेख उतना ही सामयिक होगा जितना आज है और आज से दो वर्ष पूर्व था ! तो लीजिये आप भी उसे पढ़िये !
मुझे यात्रा करने का बड़ा शौक है, वह भी रेल से । रास्ते में मिलने वाले
जंगल, पहाड़, नदियाँ, तालाब, खेत, खलिहान सभी मुझे बहुत लुभाते हैं । लेकिन जैसे ही रेल किसी शहर या कस्बे के पास आने को होती है खिड़की के बाहर टँगी मेरी चिर सजग आँखे संकोच और शर्मिंदगी से खुद ब खुद बन्द हो जाती हैं ।
इसकी केवल एक ही वजह है कि जैसे ही रेल किसी भी रिहाइशी इलाके में प्रवेश करती है वहाँ की गन्दगी और नज़ारा देख वितृष्णा से मन कसैला हो जाता है । यह समस्या वैसे तो पूरे भारत में ही पसरी हुई है लेकिन विशेष रूप से पंजाब , हरियाणा, उत्तर प्रदेश व बिहार में अधिक विकट है । जिस तरह से हम अपने हवाई अड्डों को विश्वस्तरीय बनाने के लिये प्रयत्नशील हैं , अपने शहर के सड़क मार्गों को भी साफ सुथरा और आकर्षक बनाये रखने की कोशिश कर रहे हैं वैसे ही हम अपने रेल मार्ग को सुन्दर बनाने की कोशिश क्यों नहीं करते ? जबकि यथार्थ रूप में अधिकांश शहरों में सड़क मार्ग से आने वालों की तुलना में रेल मार्ग से आने वाले यात्रियों की संख्या कहीं अधिक होती है । फिर रेल मार्ग के प्रति इतनी उपेक्षा क्यों ? क्या उसके द्वारा आने वाले यात्री और अतिथि हमारे शहर के लिये कोई महत्व नहीं रखते या फिर हमारे शहर या गाँव के प्रति बनाई हुई उनकी धारणा कोई अर्थ नहीं रखती ? आगंतुकों के स्वागत सम्बन्धी बोर्ड्स और पोस्टर्स सड़क मार्ग पर तो कभी कभी दिखाई भी दे जाते हैं लेकिन रेल मार्ग से गुजरने वाले अतिथियों को यह सम्मान नसीब नहीं हो पाता । रेल के द्वारा शहर में प्रवेश करने वाले मेहमानों को स्टेशन पर पहुँचने से पहले किस प्रकार के अशोभनीय दृश्य और गन्दगी से दो चार होना पड़ता है इस ओर हमारा ध्यान कभी नहीं जाता । किसी भी आबादी वाले हिस्से के आने से पूर्व कम से कम डेढ़ दो किलो मीटर पहले से रेल यात्रियों को खुले में शौच जाने वाले लोगों के निर्लज्ज एवम अशोभनीय दृश्यों से न चाहते हुए भी दो चार होना पड़ता है । समूचा मार्ग गन्दगी और दुर्गन्ध से भरा होता है । हमारे शहरों के नागरिक और रेल प्रशासन इस नारकीय स्थिति को सुधारने की दिशा में कोई कदम नहीं उठाते ।

रेलवे स्टेशन के आस पास के रिहाइशी इलाकों में प्रयोग के लिये अनेक शौचालयों का निर्माण कराया जाना चाहिये जिनके नि:शुल्क प्रयोग के लिये आम जनता को प्रोत्साहित करने के लिये सभी सार्थक प्रयास किये जाने चाहिये । इसके लिये सुलभ इंटरनेशनल वालों के अनुभवों और ज्ञान का लाभ उठाया जा सकता है । घनी आबादी के बीच से जहाँ रेल मार्ग गुजरते हैं उसके दोनों तरफ छोटी बड़ी निजी सम्पत्तियों के जो मालिक इस अभियान में सहयोग करें उन्हें टैक्स आदि में रियायत देकर प्रोत्साहित किया जाना चाहिये ।
रेल मंत्रालय के पास ना तो संसाधनों की कमी है ना ही रेलवे फ्रण्ट के सौंदर्यीकरण के लिये अधिक खर्च की आवश्यक्ता है । थोड़ी सी सफाई और खूब सारी हरियाली ही तो चाहिये । क़्या ऐसा नहीं हो सकता कि जो शहर और कस्बे अपने रेलवे फ्रण्ट को सुन्दर रखें उन्हें प्रति माह रेलवे कुछ नगद पुरस्कार दे । इस पुरस्कार राशि में पर्यटन विभाग तथा केन्द्र व राज्य की सरकारें भी चाहें तो भागीदार बन सकती हैं । इस प्रयास को और अधिक व्यापक रूप से प्रचारित करने के लिये रेल मंत्रालय द्वारा अंतर्शहरी प्रतियोगितायें भी आयोजित कराई जा सकती हैं जिससे नागरिकों को एक अच्छे काम के लिये प्रोत्साहित किया जा सके । आशा है नई रेल मंत्री सुश्री ममताजी इस दिशा में भी विचार करेंगी और रेल मार्गों के सौंदर्यीकरण की दिशा में सार्थक कदम उठायेंगी ।
साधना वैद

17 टिप्पणियाँ:

आशा ने कहा…

सब कुछ संभव है यदि भृष्टाचार पर नियंत्रण हप पाए और किसी कार्य के लिए मिले धन का सही उपयोग हो पाए |
आशा

रश्मि प्रभा... ने कहा…

संभव है... बस सार्थक कदम उठाने की ज़रूरत है !

रचना दीक्षित ने कहा…

सही कहा है साधना जी आपने लेकिन हम लोग खुद भी सफाई या आसपास की सफाई पर कहाँ ध्यान दे रहे हैं.

चन्द्र भूषण मिश्र ‘ग़ाफ़िल’ ने कहा…

बढ़िया प्रस्तुति...
आपके इस सुन्दर प्रविष्टि की चर्चा कल दिनांक 23-01-2012 को सोमवारीय चर्चामंच पर भी होगी। सूचनार्थ

संगीता स्वरुप ( गीत ) ने कहा…

मात्र मुद्दा ही नहीं उठाया है निदान भी प्रस्तुत किया है ..ज़रूरत है तो प्रयास करने की .. सार्थक लेख

sangita ने कहा…

आदरणीय मौसीजी सादर वन्दे,आज की आपकी पोस्ट सही है | पर क्या अब भी हम यही सोचेंगे कि यह सब नहीं हो सकेगा मेरा ख्याल है कि स्थानीय स्टार पर पहल अब आवश्यक हो गई है | हमने अपने क्षेत्र में स्वयं ध्यान रखना शुरू किया और काफी सुधार हुआ |

DR. ANWER JAMAL ने कहा…

आशा है नई रेल मंत्री सुश्री ममताजी इस दिशा में भी विचार करेंगी और रेल मार्गों के सौंदर्यीकरण की दिशा में सार्थक कदम उठायेंगी ।

http://alrisalahindi.blogspot.com/

अनामिका की सदायें ...... ने कहा…

indians ke paas dimag ki koi kami nahi aur nakal karne k maamle me to vaise hi famous hai indian. pata nahi is maamle me in dono me se koi bhi option kyu nahi chunte indians. asal me shaitani dimag ko bhrashtaachaar ko follow karne se fursat nahi hai.

vicharneey prastuti.

rashmi ravija ने कहा…

समस्य तो सचमुच बहुत गंभीर है....ऐसे शर्मनाक दृश्यों से दो चार होना ही पड़ता है...
इसीलिए हर विदेशी फिल्म में भारत के इन दृश्यों का समावेश जरूर किया जता है....हम चाहे जितना विरोध कर लें...पर उन्हें यह बात सबसे ज्यादा चौंकाती है....इस से इनकार नहीं किया जा सकता.

कोई भी सरकार सचमुच विकास की सोचे तब तो कोई कार्यवाई करे...उन्हें सिर्फ अपने खजाने भरने होते हैं.

dheerendra ने कहा…
इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.
dheerendra ने कहा…

इसके लिए प्रथम द्रष्टी में प्रसासन जिम्मेदार है साथ ही वहाँ के स्थानीय लोगो को सोचना होगा,
बहुत सार्थक अभिव्यक्ति,बेहतरीन पोस्ट....
new post...वाह रे मंहगाई...

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक (उच्चारण) ने कहा…

मन सुन्दर होगा तो सुन्दर होगा यह परिवेश!

Naveen Mani Tripathi ने कहा…

apki baton se sahamat hoon .....prabhavshali post ke liye badhai Sadhana ji.

रेखा श्रीवास्तव ने कहा…

हम किसी और से कैसे कह सकते हें , अगर हम सिर्फ अपने आप को सुधारने की ठान लें और हर व्यक्ति ऐसा ही सोचे तो ये समस्या कोई बड़ी बात नहीं है. लेकिन हम सोचते हें की अगर हमने लीक से हट कर काम किया तो ये हमारे सामने वाले अपने को बहुत बड़ा समझाने लगेंगे.

सुबह कूड़ा उठाने वाले आते हें लेकिन अपने घर से निकाल कर उनकी गाड़ी में कूड़ा डालने के बjaay लोग उसके जाने के बाद बगल के खाली प्लाट में डालने में अधिक शान महसूस करते हें और अगर कभी समझाने की कोशिश भी की जाय तो उपदेश - आप अपने को ठीक रखें हम क्या करते हें इससे मतलब न ही रखें.

sangita ने कहा…

सार्थक कदम उठाने की ज़रूरत है !

संजय भास्कर ने कहा…

APNE APNE SHETRA ME AGAR PUBLIC BHI DHYAN DE TO...YAH SAMBHAV HAI.
....................
SANJAY BHASKAR

dheerendra ने कहा…

बहुत अच्छा लिखा आपने,हम लोगो को सार्थक करनी पडेगी ,..बढ़िया प्रस्तुति...

NEW POST.... बोतल का दूध...