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Monday, April 20, 2015

अंतहीन सफर




अस्तप्राय चाँद की उँगली थामे
और कब तक, कितनी दूर तक
सागर की इन उत्ताल तरंगों पर
मुझे बहते रहना होगा ?
यह सफर तो खत्म होने का
नाम ही नहीं लेता
भोर होने को है
रात भर चाँदनी की
ज्योत्सना से जगमगाते
मेरे आँसू सितारे बन
तुम तक पहुँचाने वाली
हर रहगुज़र को जी जान से
आलोकित करते रहे
लेकिन न तुम आये
न तुम्हारा पता ही मिला !
तुम तो मुँह फेर कर
मुझसे विदा लिये बिना ही
चल दिये और मैं
झंझा के साथ बहते-बहते
इस अनंत अथाह सागर में
कितनी दूर आ गयी
तुम्हें तो पता ही नहीं !  
यहाँ से ना तो अब
तुम दिखाई देते हो
ना ही किनारे की भीड़,
ना सुबहो शाम की रंगीनियाँ, 
ना भागती दौड़ती ज़िंदगी
ना पेड़ पौधे नदी पहाड़
जो तुम्हारे आस पास होने का
अहसास कराते रहते थे 
ना आसमान में उड़ते पंछी 
जो मेरी कल्पना में ही सही
तुम तक मेरा सन्देश 
पहुँचाने वाले 
मेरे सर्वाधिक प्रिय 
दूत हुआ करते थे !
धीरे-धीरे हर मंज़र
नज़र से ओझल हो चुका है !
अब ना कोई आहट है
ना कोई आवाज़
ना कोई कूल ना किनारा
ना कोई आस ना विश्वास
ना कोई उमंग ना इंतज़ार
अब बाकी रह गयी है बस
एक उबाऊ तटस्थता
और हवा के वेग से
चाँद को छूने की कोशिश में
आसमान तक उठने की
कोशिश करतीं
सागर की उद्दाम तरंगें 
जिन पर अपने बीते दिनों की
यादों के सूत्रों को थाम
मुझे इस अंतहीन सफर पर
तब तक बहते रहना है
जब तक इन
श्वासों का आवागमन
विधाता रोक नहीं देता !

साधना वैद